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अखिलेश के अनुभव का पहला साल
कल्लोल चक्रवर्ती, फ़ीचर एडीटर, अमर उजाला
Updated Fri, 15 Mar 2013 03:57 PM IST
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पिछले साल जब मुलायम सिंह ने ख़ुद मुख्यमंत्री बनने की बजाय अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की थी तो बहुत से लोगों को आश्चर्य हुआ था। कुछ भृकुटियां भी तनीं थीं। लेकिन ज़्यादातर लोग खुश हुए कि एक युवा को मौक़ा मिला है।
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उनसे बहुत उम्मीदें बंधीं थीं। तो कैसा रहा उनका एक साल? पढ़िए एक आकलन।
छोटी उम्र में बड़ा काम
देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्य में एक साल के आधार पर किसी मुख्यमंत्री के कामकाज का आकलन करना कठिन है। वह भी तब, जब उम्र और अनुभव उसके साथ न हो। हालांकि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को सत्ता में लाने का श्रेय अखिलेश यादव को ही जाता है।
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पार्टी को अभिनेताओं और तड़क-भड़क वाली शख्सियत से मुक्त कराकर, अमर सिंह जैसे विवादास्पद व्यक्ति को बाहर कर, और दबावों के बावजूद डीपी यादव जैसे अपराधियों को टिकट देने से मना कर अखिलेश यादव ने सपा की छवि बदली थी।
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अंग्रेजी और कंप्यूटर के पक्ष में माहौल बनाकर उन्होंने सपा में सुखद पीढ़ीगत बदलाव का भी संदेश दिया, जिसने खासकर युवाओं को आकर्षित किया।
शिक्षित बेरोजगारों की नई पीढ़ी 'भैया' के साथ तो हुई ही, सपा की जीत के साथ उसकी छवि बदलने में भी इसकी बड़ी भूमिका रही। लेकिन एक साल बाद अखिलेश यादव कई मोर्चे पर निराश करते दिख रहे हैं।
नहीं बदली नौकरशाही
किसी राज्य की बेहतरी उसकी नौकरशाही पर निर्भर करती है। उत्तर प्रदेश की नौकरशाही देश की सबसे भ्रष्ट नौकरशाही में से मानी जाती है। यही वह राज्य है, जहां एक पूर्व मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव का संयुक्त बैंक खाता सामने आया था।
यही वह सूबा है, जहां एक पुलिस अधिकारी को मुख्यमंत्री के जूते की धूल झाड़ते देखा गया था! इसकी वजह यह भी है कि सपा और बसपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों ने इसे अपनी दलीय निष्ठा से बांध रखा है।
यही कारण है कि सत्ता परिवर्तन होने पर कुछ नौकरशाहों पर गाज गिरती है, तो कुछ का भाग्य पलटता है। अखिलेश एक साल में नौकरशाही का चरित्र नहीं बदल पाए। बल्कि कई मोर्चों पर उनकी विफलता की वजह यही बताई जाती है कि नौकरशाह का एक बड़ा हिस्सा उनके बजाय मुलायम सिंह के प्रति निष्ठावान है।
बढ़ गए अपराध
सपा के सत्ता में आने के बाद से ही पुलिस-प्रशासन में एक समुदाय बहुल का वर्चस्व बन गया है। नतीजतन कानून-व्यवस्था की बेहतरी की ओर ध्यान नहीं है।
सपा का चरित्र ही ऐसा है कि वह जब भी सत्ता में होती है, ऊपर से नीचे तक उसके लोगों की बन आती है। इस मामले में बसपा थोड़ी बेहतर इसलिए है कि उसमें मायावती का निर्देश सर्वोच्च होता है और उनसे प्रशासनिक अमला डरता है।
सपा में शीर्ष स्तर पर मुलायम सिंह, शिवपाल सिंह यादव, अखिलेश जैसे कई लोगों का निर्देश सर्वोच्च होता है, तो क्षेत्रीय स्तर पर भी असंख्य दबंग चेहरे हैं, जो अपने-अपने इलाकों में जोर-जबर्दस्ती करते हैं।
नए मुख्यमंत्री से उम्मीद थी कि वह सपा के इस चरित्र को बदलेंगे, लेकिन अब तक तो वह इसमें विफल ही रहे हैं। अखिलेश के एक साल में ही अपराध अगर मायावती के शासन की तुलना में पांच फीसदी अधिक है, तो इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।
अल्पसंख्यकों का डिगता विश्वास
सपा को अल्पसंख्यकों की हिमायती पार्टी माना जाता है। मुलायम सिंह हमेशा अल्पसंख्यकों के खैरख्वाह बनकर सामने आए हैं। उन्हीं के बेटे के राज में पिछले एक साल में ग्यारह सांप्रदायिक दंगे हुए हैं! कुछ दंगे ऐसी जगहों पर हुए, जहां पहले सांप्रदायिक विद्वेष का इतिहास नहीं था।
यानी कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर अखिलेश सरकार फेल हुई है। पिछड़ों को नौकरी में आरक्षण का विरोध कर सपा पहले ही अपना कुछ जनाधार खो चुकी है। इन दंगों के बाद अल्पसंख्यक समुदाय का सपा से भरोसा जिस तरह टूट रहा है, उसके बाद अगले लोकसभा चुनाव में राज्य से पचास सीटें जीतने का सपा का लक्ष्य बहुत कठिन हो जाएगा। उलटे ये दंगे भाजपा और कांग्रेस की ही मदद करेंगे। कुंडा ते डीएसपी जिया उल हक की हत्या से भी अल्पसंख्यक वर्ग नाराज है।
कुछ अच्छे काम भी
पिछले एक साल में अखिलेश ने कुछ अच्छे काम भी किए हैं। चूंकि सड़कों की दशा सुधारे बगैर राज्य की तस्वीर नहीं बदली जा सकती, इसलिए अनेक जगह सड़कों की मरम्मत का काम चल रहा है। गड्ढे भरे जा रहे हैं।
जिला मुख्यालयों को चार लेन वाली सड़कों से जोड़ने का लक्ष्य बढ़िया है। हर जिले में मरीजों को अस्पतालों तक ले जाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था की गई है, जिसका लाभ मिल रहा है। बेरोजगारी भत्ता, कन्या विद्याधन और छात्रों को लैपटॉप बांटने जैसे कदम बेशक नए नहीं हैं। लेकिन इनका संदेश यह है कि सरकार को राज्य की युवाशक्ति की पहचान है।
जो सपा कंप्यूटर का विरोध करती थी, वह छात्रों को लैपटॉप देकर बुरा नहीं कर रही। लेकिन लैपटॉप पर मुलायम सिंह और अखिलेश की तस्वीर से कोई अच्छा संदेश नहीं जाता। फिर जिस राज्य में शहरों में भी बिजली बमुश्किल आठ घंटे रहती है, वहां लैपटॉप देना समस्या का समाधान नहीं है।
उद्योग पर है उम्मीदें
उत्तर प्रदेश को आर्थिक रूप से एक पिछड़ा राज्य मान लिया जाता है। जबकि ऐसा है नहीं। मायावती के दौर में राज्य की आर्थिक विकास दर सात फीसदी थी। इसी आधार पर अंकलेश्वर अय्यर जैसे आर्थिक विशेषज्ञों ने मान लिया था कि विधानसभा चुनाव में मायावती की सत्ता नहीं जाएगी।
उत्तर प्रदेश उन पांच राज्यों में से है, जिसकी आर्थिक विकास दर ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य से अधिक रही। पिछले एक साल में अखिलेश के दो कदम उद्योगों के मामले में उम्मीद जगाते हैं। पहला, उनके मुख्यमंत्रीकाल में पहली बार राज्य में पार्टनरशिप समिट हुई, जिसका व्यावहारिक धरातल पर बेशक कोई लाभ अभी तक नहीं दिखा है, लेकिन कई देशों की इस राज्य में रुचि जगी है, जो कम बात नहीं। फिर हाल ही में विश्व बैंक के अध्यक्ष ने अखिलेश से न सिर्फ मुलाकात की, बल्कि आर्थिक तस्वीर बदलने का आश्वासन भी दिया।
खुद मुख्यमंत्री अमेरिकी निवेशकों को उत्तर प्रदेश में निवेश का आमंत्रण दे चुके हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर, खाद्य प्रसंस्करण, सौर ऊर्जा, टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों पर जिस तरह जोर दिया गया है, वह भी उम्मीद जगाता है। निवेश की दृष्टि से उत्तर प्रदेश एक बेहद संभावनाशील राज्य है।
अगर नए मुख्यमंत्री इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करें, सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काम करें और कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधारें, तो कई क्षेत्रों में रोजगार के अवसर खुल सकते हैं। साड़ी, कंबल और लैपटॉप जैसे प्रतीकात्मक कदम के बजाय उद्योग के क्षेत्र में युवाओं को रोजगार देकर और विदेशी निवेश आमंत्रित करके ही राज्य की तस्वीर बदली जा सकती है।