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अखिलेश सरकार का दुर्भाग्यपूर्ण फैसला!

Thu, 13 Nov 2014 12:15 PM IST
हरवीर सिंह, नितिन यादव/अमर उजाला, मेरठ, बिजनौर
हरवीर सिंह, नितिन यादव/अमर उजाला, मेरठ, बिजनौर Updated Thu, 13 Nov 2014 12:15 PM IST
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akhilesh govt decision not in favor of sugar can farmers.

आखिरकार कई महीने चल रही खींचतान के माहौल में शुगर मिलें यूपी सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब रहीं और किसान इस बार भी ठगे गए। ऐसा पहली बार हुआ जब लगातार दो वर्ष में गन्ना मूल्य वृद्धि शून्य रही हो। पिछले दो वर्षों में मिलों पर रहमतों की खूब बौछार हुई, लेकिन किसानों को फूटी कौड़ी की भी राहत नहीं मिली है। गन्ना मूल्य में 40 रुपया प्रति क्विंटल बाद में भुगतान की छूट देकर मिलों को अप्रत्याशित रूप से और भी राहत दे दी गई है।

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प्रदेश सरकार ने एसएपी (राज्य परामर्शित गन्ना मूल्य) गत वर्ष के बराबर यानी 280 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है। पिछली बार 260 रुपया प्रति क्विंटल के हिसाब से चौदह दिन में भुगतान की शर्त रखी गई थी और 20 रुपया पेराई सत्र खत्म होने के बाद। हालांकि 260 रुपया भी 14 दिन में भुगतान नहीं हुआ। जिले की शुगर मिलों पर अभी भी सौ करोड़ से अधिक बकाया। शुगर मिलें इस बार शुरू से ही सरकार पर दबाव बनाए हुए थीं। लिंकेज फार्मूले से (220) भुगतान की मांग कर रही थीं। इस बाबत मालिकों ने शुगर मिलों में ताले डलवा दिए थे। काफी समय तक मिलों में मरम्मतीय कार्य बंद रहा। वर्तमान पेराई सत्र में 280 रुपये के दाम पर मिल चलाने से भी हाथ खड़े कर दिए थे।
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किसान भी मान रहे थे कि इस बार दाम बढ़ने मुश्किल हैं, लेकिन उम्मीद नहीं थी कि 40 रुपया बाद में भुगतान करने की राहत मिलों को मिलेगी। खास बात ये है कि पिछले दो वर्षों में मिल व किसान दोनों ही समानांतर रूप से राहत के लिए आंदोलन कर रहे हैं। किसान खाली हाथ है और मिलों को हर बार राहत मिल रही है। पिछले दो वर्ष में मिलों को दो रुपये प्रति क्विंटल पर्चेज टैक्स छूट, 85 रुपये प्रति क्विंटल एंट्री टैक्स छूट, समितियों के कमीशन में 6.10 रुपये प्रति क्विंटल की छूट, चीनी निर्यात पर 320 रुपया प्रति क्विंटल का प्रोत्साहन, आधे दाम पर ली जाने वाली 20 प्रतिशत लेवी चीनी खत्म की, छह रुपये प्रति क्विंटल की डायरेक्ट सब्सिडी प्रदेश सरकार द्वारा दी गई।
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आयात शुल्क में दस प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई, जिसका असर चीनी के दाम पर दिख रहा है। पिछले साल इन दिनों 3000 रुपये प्रति क्विंटल चीनी थी, इस बार चीनी के दाम 3100 से 3200  रुपये प्रति क्विंटल हैं। पेट्रोल में दस प्रतिशत एथेनॉल अनिवार्य किया। इससे शीरे के दाम जहां 120 से 160 रुपया प्रति क्विंटल रहते थे, अब 550 रुपये से अधिक हैं। एथेनॉल के दाम भी बढ़े हैं। खास बात ये है कि आर्थिक तंगी झेल रहीं मिलों को बचाने के लिए तरह तरह की सब्सिडी मिली है, लेकिन आर्थिक तंगी से मौत को गले लगा रहे किसानों को कोई राहत नहीं मिली है। जिले में दो किसान आर्थिक तंगी के चलते दम तोड़ चुके हैं। बहरहाल शुगर मिलों को बचाना भी जरूरी है, लेकिन अब देखना यह है कि 240 रुपये चौदह दिन के अंदर और अवशेष 40 रुपये प्रति क्विंटल गन्ना भुगतान समय पर हो पाता है या नहीं। समय पर भुगताना हुआ तो वह भी किसानों के लिए राहत ही मानी जाएगी। 

भाजपा जिलाध्यक्ष सुमन त्यागी ने गन्ना मूल्य को नाकाफी बताया। कहा कि हरियाणा में गन्ना मूल्य में दस रुपये की वृद्धि भाजपा सरकार ने की है। हरियाणा में 311 रुपया गन्ने का दाम है। केंद्र ने भी गन्ने के एफआरपी में दस रुपये की वृद्धि की है। यूपी में कम दाम घोषित करके सपा सरकार ने किसानों का उत्पीड़न किया। रालोद के पूर्व जिलाध्यक्ष प्रवीण देशवाल ने कहा पिछला भुगतान नहीं मिला। इस बार भी सरकार ने 40 रुपया बाद में देने की राहत मिलों को दी गई। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

गन्ना मूल्य के लिए आंदोलन होगा
रालोद जिलाध्यक्ष ब्रजवीर चौधरी ने गन्ना मूल्य 350 रुपये प्रति क्विंटल किये जाने की मांग की। कहा कि प्रदेश सरकार ने गन्ना मूल्य वृद्धि नहीं करके किसानों का शोषण किया। रालोद 14 नवंबर को ग्यारह बजे प्रदर्शन करेगी। डीएम को ज्ञापन सौंपा जाएगा। किसान जागृति मंच के जिलाध्यक्ष शूरवीर सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद ने पिछले साल गन्ना उत्पादन लागत 244 रुपये व इस बार 254 रुपये घोषित की थी। यानी गन्ने की उत्पादन लागत बढ़ी है। गन्ना मूल्य 300 रुपये होना चाहिए था। किसानों की अनदेखी हुई है।

किसान मोर्चे के जिलाध्यक्ष धीर सिंह का कहना है कि गन्ने की लागत बढ़ रही है और गन्ना मूल्य नहीं। प्रदेश सरकार किसानों को उत्पीड़न कर रही है। 14 में संगठन प्रदर्शन करेगा।

गन्ना किसानों को साधने से चूकी सपा

akhilesh govt decision not in favor of sugar can farmers.

पश्चिम की राजनीति में गन्ना और किसान का महत्वपूर्ण स्थान है। इस साल गन्ना मूल्य न बढ़ाकर सपा गन्ना किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने से चूक गई। पिछले दिनों उप चुनाव में पश्चिम में सपा को सफलता मिलने के बाद माना जा रहा था कि किसानों को लाभ हो सकता है। सपा भुगतान न मिलने से परेशान किसानों को बढ़ा गन्ना मूल्य देकर साध सकती थी। बसपा जहां अपने समय में बढ़े दामों की बात उठाएगी तो रालोद इसे मुद्दा बनाकर पश्चिम में फिर से अपनी ताकत बढ़ाने का काम कर सकता है। भाजपा नेता भी प्रदेश सरकार पर इस मुद्दे पर हमलावर होने की तैयारी कर रहे हैं।

 पश्चिम के सभी मंडलों में गन्ना हमेशा से ही राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। चौ. चरण सिंह और बाबा महेंद्र सिंह टिकैत गन्ने के मामले को बड़े मंचों तक उठा चुके हैं। अपने चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गन्ना किसानों का कई बार जिक्र किया था। पिछले बकाया गुन्ना भुगतान को लेकर किसान संगठन और दूसरे दल प्रदेश सरकार पर लगातार प्रहार करते रहे हैं। मेरठ और सहारनपुर मंडल की मिलों पर अभी लगभग 1000 करोड़ रुपये बकाया है। किसान नेताओं का कहना है कि मालभाड़े के मामले में भी चीनी मिलों को ही लाभ हुआ है। पिछले कुछ सालों में गन्ने की उपज पर लगभग 20 प्रतिशत लागत बढ़ी है। इसीलिए किसान संगठन 350 रुपये का रेट मांग रहे थे।

सभी को उम्मीद थी कि गन्ना भुगतान के मामले में ढिलाई बरतने के बाद सरकार अधिक गन्ना मूल्य की सौगात देगी। मेरठ में बंद मोहिउद्दीनपुर मिल को चलवाकर पिछले साल मुख्यमंत्री ने बेहतर संदेश देने की कोशिश की थी, लेकिन गन्ना भुगतान ने मामला बिगाड़ दिया। उप चुनावों में किसान वर्ग ने पश्चिम में कुछ क्षेत्रों में सपा को अच्छा खासा वोट दिया था। सपा ने किसान पृष्ठभूमि के नेताओं को प्रचार में इसी मंशा से लगाया था। उप चुनाव में सफलता के बाद अब गन्ना मूल्य की सौगात न देना जहां किसानों को अखर रहा है, वहीं दूसरे दल इसे मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोडेंगे।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वीएम सिंह का कहना है कि सरकार मिल मालिकों के हाथों में खेल रही है। तीन महीने की मोहलत देकर किसानों के साथ धोखा किया गया है। पिछले साल तो 20 रुपये के लिए किसान तरस गया था और अब बात 40 रुपये पर आ गई है। किसानों की संगठित ताकत न होने के कारण भी उसके साथ राजनीतिक तौर पर छल किया जा रहा है।

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