क्या रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने शपथ का उल्लंघन किया?
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रक्षा मंत्री को एक बड़ी छड़ी रखनी चाहिए, लेकिन बोलना उन्हें नरमी से चाहिए। लेकिन मनोहर पार्रिकर के रूप में भारत को इससे उलट रक्षा मंत्री मिला है; यानी छड़ी तो छोटी है लेकिन बातें बड़ी बड़ी हैं। बीती 21 मई को उन्होंने सरकारी नीति के रूप में ‘आतंकवादियों’ के इस्तेमाल की बात कही थी।
बकौल परार्रिकर, “कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में यहां पर बातचीत नहीं की जा सकती।” हालांकि इसके बाद उन्होंने इन चीजों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा, “यदि कोई देश, चाहे वो पाकिस्तान ही क्यों न हो, हमारे देश के ख़िलाफ़ कुछ साज़िश रच रहा है तो हम निश्चित रूप से कुछ आक्रामक क़दम उठाएंगे।”
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उन्होंने एक हिंदी कहावत का इस्तेमाल करते हुए कहा, “कांटे से कांटा निकालना। हम आतंकवादियों से केवल आतंकवादियों के मार्फत ही निपट सकते हैं। हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते? हमें ये करना चाहिए।”
भारत, ‘आतंकियों के ख़िलाफ़ आतंकियों के इस्तेमाल’ की रणनीति अपना चुका है और उसमें असफल भी हो चुका है। यह रणनीति कश्मीर में भी असफल हो चुकी है, जहां 1960 के दशक में कांग्रेस सरकार ने सेना और जमात ए इस्लामी व अन्य इस्लामी गुटों के हथियारबंद विरोधियों को खुली छूट देने का फैसला किया था।
यह प्रयोग जल्द ही ख़त्म हो गया है और इसके नेता कुक्का पारे को बाद में चरमपंथियों ने मार डाला। ऐसा ही एक प्रयोग मध्य भारत में भी असफल हो गया है, जहां सरकार ने माओवादियों के ख़िलाफ़ हथियारबंद गुटों को मैदान में उतारा, जो असहाय आबादी के ख़िलाफ़ ही खड़े हो गए।
रक्षा मंत्री का यह सबसे ख़ौफ़नाक बयान
गौर करने की बात है कि इन अनुभवों को ध्यान में रखते हुए एक मंत्री को सोच समझकर वो बात बोलनी चाहिए जो पार्रिकर ने बोला। ज़ाहिर तौर पर विपक्ष इस पर हैरान है। पूर्व गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने कहा, “रक्षा मंत्री का यह सबसे ख़ौफ़नाक बयान है। मैं उम्मीद करता हूं कि अपने बयान की गंभीरता का उन्हें एहसास है और वो जल्द ही इसे वापस ले लेंगे।”
उन्होंने कहा, “यूपीए के दस सालों के शासन के दौरान पाकिस्तान के किसी भी हिस्से में भारत ने कोई भी आतंकवादी या अपराधिक तत्व नहीं भेजे और मुझे विश्वास है कि एनडीए सरकार ने भी ऐसा नहीं किया और ना ही करेगी...उनका बयान सच्चाई से पूरी तरह अलग है और उन्हें तत्काल इसे वापस लेना चाहिए।”
लेकिन पार्रिकर ने जो कुछ कहा था उस पर एक और दांव चला। उन्होंने 26 मई को कहा कि वो ‘भारत की रक्षा करने के लिए किसी भी स्तर तक’ जाएंगे और ‘जो हमला करेंगे उन्हें उसी अंदाज़ में’ जवाब दिया जाएगा।
शेखी और मुसीबत
पाकिस्तान में इस बयान को उसके दावे की पुष्टि की तरह देखा गया कि भारत पाकिस्तान में बलूचिस्तान और अन्य जगहों पर हस्तक्षेप कर रहा है और देश के ख़िलाफ़ हिंसा को मदद कर रहा है। ऐसा बयान कुछ सेकेंड के लिए तालियां बटोर सकता है लेकिन लंबे समय के लिए नुकसानदायक होता है।
कुछ महीने पहले एक कोस्ट गार्ड अधिकारी ने एक पाकिस्तानी नौका को डुबाने की शेखी बघार कर ऐसी ही ग़लती की थी और मुसीबत में फंस गया था। मेरे ख्याल से, पार्रिकर ने एक मंत्री के रूप में शपथग्रहण के दौरान ली गई दो शपथों का उल्लंघन किया है।
शपथ के शब्द थे, “संविधान और क़ानून के अनुसार वो काम करेंगे”, लेकिन ‘आतंकवादियों के इस्तेमाल’ वाला उनका बयान इस शपथ का उल्लंघन है। दूसरी शपथ थी गोपनीयता बनाए रखने की। सभी सरकारें छूट लेती हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क़ानून अस्पष्ट है, लेकिन कुछ मंत्री इसके बारे में डींग मारने लगते हैं।
शपथ का उल्लंघन?
पार्रिकर की गोपनीयता शपथ उन्हें इस बात के लिए बाध्य करती है कि ‘वो अपना कर्तव्य निभाने के लिए ज़रूरी चीजों के अलावा, सीधे या अप्रत्यक्ष तरीक़े से किसी व्यक्ति या व्यक्तियों से ऐसे किसी मामले में चर्चा नहीं करें जो उनके संज्ञान में लाई जाएगी।’ लेकिन अगर वो वाकई सरकारी नीति का खुलासा कर रहे थे तो उनकी यह बयानबाजी उनके कर्तव्य निभाने कि लिए ज़रूरी नहीं थी।
पार्रिकर स्वीकार करते हैं कि भारत एक ग़रीब देश है जिसके पास बहुत सीमित संसाधन हैं। एक रैंक एक पेंशन की मांग कर रहे सेवानिवृत्त कर्मचारियों से पार्रिकर ने कहा, “लोग इसकी वित्तीय जटिलताओं के बारे में नहीं जानते हैं।”और इस तरह वो इसमें हो रही देरी को सही ठहराते हैं।
कितना काम हुआ?
उनके मंत्री बनने के बाद से भारतीय वायु सेना 36 नए रफ़ाएल लड़ाकू विमान हासिल करेगी। जबकि क़रार 126 विमानों का था। यह कई कारणों से हो सकता है लेकिन निश्चित रूप से बजट इसमें एक अहम कारण रहा होगा। पार्रिकर ने माउंटेन वॉरफ़ेयर टुकड़ी बनाने की योजना में भी कटौती कर दी और अब 80 हज़ार की जगह 35 हज़ार जवानों की भर्ती होगी।
वो कहते हैं कि इन बड़ी बड़ी स्कीमों के लिए “पैसा कहां है?” वो ये सही ही कह रहे हैं। उन्हें अपनी ऊर्जा और समय को, अपनी ‘छड़ी’ को बड़ी करने मे लगाना चाहिए न कि शेखी बघारने में।
(ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)