फिर बिछने लगी तीसरे मोर्चे की बिसात
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शुरुआती ना नुकुर के बाद एक बार फिर तीसरे मोर्चे की नींव सजाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। इसके लिए आगामी पांच फरवरी को होने वाले गैरकांग्रेस-गैरभाजपा दलों के सम्मेलन से पहले ही अन्नाद्रमुक ने भाकपा से चुनावी तालमेल कर इस नए मोर्चे की सियासत को जमीन पर उतारने की पहल शुरू कर दी है।
चुनावी तालमेल के एक दिन बाद ही अन्नाद्रमुक की मुखिया जयललिता ने माकपा महासचिव प्रकाश करात से मुलाकात की और नए मोर्चे के गठन का समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री पद पर फैसला चुनाव के बाद करने पर भी सहमति दी।
अगुवाई का जिम्मा वाम दलों के कंधों पर
मोर्चे के गठन से पहले विवाद को टालने के लिए सभी दल चुनाव बाद पीएम उम्मीदवार तय करने पर सहमति दे चुके हैं।
आगामी पांच फरवरी को भाजपा की कथित सांप्रदायिकता और कांग्रेस की कथित जनविरोधी आर्थिक नीतियों के विरोध के बहाने 14 दल चुनावी तालमेल पर विचार विमर्श करेंगे।
हालांकि इस बार इस जमावड़े को तीसरे मोर्चे की जगह गैरकांग्रेस-गैरभाजपा मोर्चा नाम दिया जा रहा है। हमेशा की तरह इस बार भी मोर्चे की अगुवाई का जिम्मा फिर से वाम दलों के कंधों पर है क्योंकि उनका लगभग सभी राज्यों में आधार है।
मोदी को रोकने की कोशिशों पर होगी चर्चा
सम्मेलन से पहले ही तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक और भाकपा के बीच हुए समझौते, सोमवार को तेलुगुदेशम के मुखिया चंद्रबाबू नायडू की हुई जदयू अध्यक्ष शरद यादव से मुलाकात और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राज्य में भाकपा के साथ चुनावी गठबंधन के संकेत से अब इस नए मोर्चे की औपचारिक घोषणा ही बाकी रह गई है।
माकपा सूत्रों का कहना है कि फिलहाल पांच फरवरी के सम्मेलन में सारा जोर गैरभाजपा-गैरकांग्रेस दलों की संख्या बढ़ाने पर है। सम्मेलन में मुख्य रूप से भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को रोकने की कोशिशों पर चर्चा होगी।
एक बार सारी स्थिति स्पष्ट होने के बाद इन दलों के नेता चुनाव पूर्व गठबंधन की स्थिति पर भी विस्तार से विमर्श करेंगे। चूंकि इस सम्मेलन में भाग ले रहे ज्यादातर दलों का प्रभाव क्षेत्र अलग-अलग है। इसलिए सीटों के बंटवारे का सवाल कोई बड़ी समस्या नहीं है।
ममता को रोकने की कोशिश में वाम दल
लगातार तीसरे मोर्चे के गठन की संभावना से साफ इनकार करने वाले वाम दल अपनी धुर विरोधी तृणमूल कांग्रेस को अलग-थलग करने के लिए मोर्चे के गठन पर हामी भरने पर मजबूर हुए।
दरअसल तृणमूल की मुखिया ममता बनर्जी बीते एक साल से वाम दलों को हाशिये पर लाने के लिए फेडरल फ्रंट बनाने के लिए जोरशोर से जुटी थी।
सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव खुद को पीएम पद की दौड़ में शामिल रखने के लिए ऐसे किसी मोर्चे के गठन की बीते एक साल से कोशिश कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस से गठबंधन की सारी उम्मीदें लगभग ध्वस्त हो जाने के बाद जदयू अचानक इस मोर्चे के लिए सक्रिय हुई।