मोदी के साथ खाने में पटेल को क्यों लगी मिर्च?
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स्कूल की प्राथमिक कक्षाओं में यह बताया जाता था कि महाराणा प्रताप के साथ में भोजन न करने के कारण मानसिह ने इसे अपना अपमान समझा था। वह खाना छोड़ कर चले गए थे। सियासत में भोजन करने या न करने के अपने महत्व पुराने समय से चले आ रहे हैं।
नरेंद्र मोदी ने अगर यह कहा कि अहमद पटेल से उनकी निजी दोस्ती रही है और उन्होंने साथ में बैठकर खाना खाया है, तो यह सियासत से बाहर बहुत सामान्य सी बात होती। यही कहा जाता कि दो गुजराती थालियां लग गई कौन सी बड़ी बातें। गुजराती थाली लगी तो मीठी दाल भी परोसी गई होगी।
आठ दस कटोरो वाली गुजराती थाली पर बिना वजह इतनी बात क्यों। पर अगर इतना ही होता तो अहमद पटेल एकदम बिफर कर क्यों कहते कि नहीं नहीं मैंने मोदीजी के साथ कभी खाना नहीं खाया। बस एक दो बार उनसे जरूर मिला हूं।
सफाई देते रहे अहमद पटेल
नरेंद्र मोदी कह रहे हैं वो मेरे दोस्त हैं। और अहमद पटेल पल्ला छुड़ाकर भाग रहे हैं कि हम कोई दोस्त नहीं। सक्रिय राजनीति में दो लोग हैं तो खाना पीना चलता ही है। लेकिन गहरी सियासत में अहमद पटेल यह कभी नहीं चाहेंगे कि कांग्रेस में उनका जो रसूख हैं उस पर आंच आए।
आला हाईकमान की नजरों में उनकी जो अहमियत है, वह कई कांग्रेसियों को मन ही मन खटकता भी है। खासकर राहुल गांधी ब्रिगेड के लोग भी कुछ ऩए की चाह में जमे जमाए नेताओं की चूल हिलाने में दिलचस्पी तो दिखा ही रहे हैं। तब ऐसे मौके बड़े काम के होते हैं।
वह कह सकते हैं कि जिन लोगों पर विश्वास किया जाता है, वो चुपके चुपके नरेंद्र मोदी जैसे घोर कांग्रेसी विरोधी से मिलते रहते हैं। यहां दिलचस्प बात यह है कि अगर दोस्ती और साथ में भोजन करने की बात लाल कृष्ण आडवाणी या राजनाथ सिंह ने कही होती, तो शायद ही अहमद पटेल कोई सफाई देते। लेकिन नरेंद्र मोदी का मामला अलग है।
अहमद पटेल कोस रहे होंगे कि खाना अगर साथ में खा भी लिया था, तो उसे सबको बताना जरूरी था। पर यही तो सियासत है। आखिर मोदी भी यह सोच रहे होंगे जब दोस्ती थी तो प्रचार के लिए क्या गुजरात सरकार को ही कोसना जरूरी था। लगे हाथ मोदी ने उफनते झील के पानी में एक छोटी कंकड़ तो डाल ही दी।
भक्तों के कल्याण के लिए सांसद बनना जरूरी!
आखिर पगलानंद जी क्यों चुनाव न लड़ते। कब तक प्रवचन ही देते रहेंगे। पगलानंदजी ने पार्टी चुनी अपना दल और बदायूं से उम्मीदवार बन गए। अब तक भक्तों ने उन्हें प्रवचन देते ही सुना था, लेकिन इस बार उनके भक्तों के लिए कुछ और सुनने के लिए था।
देश की दशा दुदर्शा की चिंता उन्हें चुनाव तक ले आईँ। लिहाजा वह अपने भक्तों से कहते हैं कि किसी लोभ माया के लिए चुनाव में नहीं आए। बल्कि ऊपर वाले का आशीर्वाद से वह लोगों के कल्याण के लिए चुनाव लड रहे हैं। अपनी बातों में पगलानंदजी लोगों को पौराणिक कहानियां भी सुना देते हैं।
उनके निशाने पर क्या सपा क्या बसपा सभी दल रहते हैं। न जाने उनका असली नाम क्या था। वह कहते हैं कि उन्हें भी अब याद नहीं, बस यही सुनते आ रहे हैं कि लोग उन्हें पगलानंद कहते हैं। उनके भक्तो की संख्या ठीक ठीक पता नहीं।
पर जहां भी उनकी सभा होती है कुछ भक्त इंतजाम करते दिखते हैं। चिमटे की खनखन और ढोलक की थाप के बीच पगलानंद की जयजयकार भी होती रहती है। उनके भक्तों का भी मानना है कि उनके गुरु सांसद बनकर लोगों का कल्याण करेंगे।
अखिलेश की बुआ जी
सपाई और बसपा वाले एक दूसरे को जब भी देखे आंख तरेर कर ही देखे। कोई कह नहीं सकता कि कभी सपाई नेता मुलायम सिंह और बसपा के नेता कांशीराम ने एक साथ मंच साझा किए होंगे और उप्र में मिली जुली सरकार बनाई होगी। यह अतीत की बात हो गई है।
अब तो आप या सपा के पंडाल में हो सकते हैं या बसपा के। लेकिन किसी तरह का घालमेल नहीं चलता। दोनों तरफ से वाणी पर भी अकुंश नहीं रहता। दोनों पार्टियों के उच्च नेताओं से लेकर लोकल इकाई में सक्रिय कार्यकर्ता भी संबोधन पार्टी के अनुरूप ही करते हैं।
किसी के लिए अखिलेश भईया हैं तो मुलायम नेताजी। किसी के लिए मायावती के नाम से पहले बहन लगाना बिल्कुल जरूरी हो जाता है। आप उनके समक्ष केवल मायावती नहीं कह सकते हैं। वो टोक भी सकते हैं कि मायावतीजी नहीं बहन मायावतीजी कहिए। यह तो अलग लेकिन इन्हीं संबोधनों पर चुटकी भी ली जाती है।
मुख्यमंत्री अखिलेश इसके माहिर हो चुके हैं। अपने पिता मुलायम सिंह के विपरीत वह विरोधियों पर सीधा तंज नहीं करते बल्कि बीच बीच में चुटकी लेते हैं। अवध क्षेत्र में एक सभा में वह यह आभास कराना नहीं भूले कि अगर बड़े बुजुर्गु मायावतीजी को बहनजी कहते हैं तो फिर वह उऩ जैसे नौजवान को तो उन्हें बुआ ही कहना चाहिए।
बुआ कहने में क्या ऐतराज हो सकता है। बुआ शब्द में वैसे भी गरिमा और पर्याप्त आदर का भाव समाहित है। अब यह श्रोताओं पर है कि जब अखिलेश, मायावती को बुआ कह रहे हों तो वह किस रूप में लेते हैं। सपा बसपा के रिश्तों की तलखी को सबने समझा है।
बद्रीकेदार से पहले काशी
बद्री केदार के कपाट खुल रहे हैं। अपेक्षा की जाती है कि इन अवसरों पर साधू संन्यासी समाज इन धामों की छवि को मन में अंकित करते होंगे। ऐसे ही समय शंकराचार्यों से भी अपेक्षा की जाती है कि वह जहां भी होंगे पूरे मन योग वाणी से ईश्वर आराधना में लीन होंगे। धामों के खुलने से उनके शरीर का रोम रोम पुलकित होगा।
धामों में जाने वाले तीर्थयात्रियों को वह अपनी सलाह मार्गदर्शन दे रहे होंगे। मगर ऐसे समय कुछ शंकराचार्यों की रुचि राजनीति के परिणामों को प्रभावित करने की भी है। पुरी के धर्मगुरु स्वामी अधोक्षानंद देवतीर्थ और द्वारका के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने सरस्वती की चिंता चुनाव को लेकर ज्यादा है।
ये दोनों संत कह चुके हैं कि वे एक प्रत्याशी को हराने के लिए वहां जाएंगे। पिछले अऩुभव यही बताते हैं कि स्वामी स्वरूपानंद का नरेंद्र मोदी से मेल नहीं बैठता। मोदी ने स्वामी स्वरूपनंद सरस्वती की टिप्पणी पर कभी कोई बयान नहीं दिया। लेकिन स्वरूपानंज सरस्वती का भी वही बयान होते हैं जो अक्सर गुजरात के बारे में कांग्रेसी दिया करते हैं।
अब यह कहना मुश्किल है कि इन दोनों शंकराचार्यों के बनारस पहुंचने पर वहां की जनता इनके प्रचार को कितनी अहमियत देती है। लेकिन मोदी के खिलाफ कुछ संतों का खास रणनीति के तहत एक गैर राजनीतिक मोर्चा बनना तय दिखता है।
दिक्कत यही है कि अगर शंकराचार्य जैसी पदवी, बड़ा नाम, रसूख के बाद लोगों ने इन संतों की वाणी को नहीं स्वीकारा, इनकी बात को अहमियत नहीं दी तो नुकसान किसका है। वैसे भी शंकराचार्य शब्द से खिलवाड़ राजनेता पहले से करते रहे हैं।
एक समय उप्र के मुलायम सिंह यादव ने अपनी इच्छा से दो पीठों पर कुछ अलग साधुओं को शंकरार्चाय कहना शुरू कर दिया था। तब विवाद यही चला था कि वास्तव में असली शंकराचार्य कौन है। विधिवत पूजा प्रतिष्ठा करके शंकराचार्य बने संत या मुलायम सिंह के जरिए थोपे गए संत। संतों पर अपनी प्रतिष्ठा, जगह, स्तर को बनाए रखने की अहम जिम्मेदारी होती है। राजनेता तो उनका हर स्तर पर इस्तेमाल ही करना चाहेगी।
सिद्धू का यूपी में विरोध
अमृतसर की नवजोत सिंह ने वोट डाला या नहीं लेकिन वहां इतना हर कोई जानता है कि उनके पति नवजोत सिंह ने वोट नहीं डाला। यही नहीं वह अमृतसर भी मतदान होने के एक दिन बाद पहुंचे। अरुण जेटली के कारण नवजोत सिद्धू का टिकट क्या कटा वह प्रचार में भी नहीं आए।
नाराजगी कई कोण पर चलती है। कहा जा रहा है कि भाजपा नहीं, अकाली मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल नहीं चाहते थे कि नवजोत सिंह सिद्धू को टिकट दिया जाए। भाजपा उनकी बात को टाल नहीं सकती थी। मगर यह भी चर्चा चली कि प्रकाश सिंह बादल की धारणा अपनी जगह पर नवजोत सिद्धू पश्चिम दिल्ली के लिए तैयार नहीं थे।
वह केवल और केवल अमृतसर से ही लड़ना चाहते थे। नवजोत सिद्धू ने अपनी नाराजगी तो जताई पर पार्टी नहीं छोड़ी। पार्टी के लिए कुछ खास किया भी नहीं। उप्र में एक दो जगह वोट मांगने गए तो न जाने किस वजह खुला विरोध हो गया। एक जगह भाषण भी नहीं करने दिया गया।
अब सिद्धू कह रहे हैं कि उनके घर का एक मत जेटली सर को पड़ा है। अमृतसर में राजनीति का खेल कुछ और भी चला। कहा गया कि लोकसभा चुनाव लड़ने में थोड़ा रुझान और थोड़ा हिचकिचाहट दिखा रहे अरुण जेटली को जब अकाली नेताओं ने कह दिया कि केवल नामांकन करें, सीट जिताना हमारी जिम्मेदारी तो उनका संकोच दूर हो गया।
पर उस समय जेटली को क्या पता था कि कांग्रेस समर में किसे लाकर उनके लिए चुनौती कठिन बना रही है। अब नवजोत सिद्धू अपना खेल खेल रहे हैं। अरुण जेटली जीते तो कहेंगे कि चुनाव में नुकसान से बचने के लिए गुरु नगरी से दूर चला गया था। अगर वह हारते हैं कि कहेंगे टिकट देते तो जीत कर दिखाता।