'हमारी आंखों के सामने उड़ा दी यात्रियों से भरी बस'
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इराक में गोलियों की आवाजें गूंज रही हैं। सेना और आईसिस (विद्रोही संगठन) के बीच चल रही लड़ाई में पूरा मुल्क जल रहा है। ऐसे हालातों से आगरा का एक परिवार बचकर लौटा। हाल ही में इराक से खानकाहों की जियारत करके लौटे उस परिवार के सदस्यों से अमर उजाला ने बातचीत की तो उनके मुंह से सिर्फ यही निकला, ‘या खुदा तेरा शुक्र है कि हम बखैरियत वतन वापस आ गए’।
ताजगंज फेस-2 के पुष्पांजलि एंक्लेव-4 निवासी नफीस हुसैन नकवी अपनी पत्नी हाशमी नकवी और बेटा आसिफ नकवी के साथ 11 मई को इराक गए। यहां पर उन्हें करबला के साथ ही कई मजारों की जियारत करनी थी। इन लोगों ने नजफ, करबला, सामरा और बगदाद का दौरा किया।
11 से 31 मई तक हालत पूरी तरह से सामान्य थे, लेकिन एक जून को नजफ में उनकी आंखों के सामने ही यात्रियों से भरी बस को उड़ा दिया गया। चंद मिनट में ही दर्जनों जिंदगियां खत्म हो गई। इस खौफनाक मंजर को देखकर दिल दहल गया। हिंदुस्तान चले आने का फैसला लिया।
इतना खौफनाक मंजर पहले कभी न देखा
नफीस हुसैन नकवी ने बताया कि पूरी दुनिया का आदमी इराक में करबला और मजारों की जियारत करने को जाता है। इस तरह की कोई परेशानी नहीं आई, लेकिन इस बार कुछ हालात ही अलग थे। वहां पर विदेशी सैलानियों का रोका जा रहा था। इतना खौफनाक मंजर कभी नहीं देखा।
हाशमी नकवी ने अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए कहा कि हम सही सलामत अपने घर आ गए। हमारे परिवार वाले बड़ी चिंता में थे, लेकिन मौला ने हमें खैरियत से भेज दिया। हमने अपने देश का फ्लैग पहन लिया, जिसकी वजह से वहां की आर्मी और लोगों ने सपोर्ट किया।
डॉ. नसीम जैदी ने बताया कि इराक में जंग चल रही है, तो देश में कुछ लोगों ने ठगी भी शुरू कर दी है। लोगों से कहा जा रहा है कि करबला खतरे में है। इसे बचाने के लिए लोगों को वहां जाना चाहिए। इसके लिए रजिस्ट्रेशन और बीजा दिलाने की बात कह रहे हैं। कुछ लोगों ने इन दलालों को पैसा दिया, लेकिन जब संपर्क किया तो लोग पैसा लेकर फरार हो गए हैं।
इराक से लौटा काशी का छात्र
इराक के हिंसाग्रस्त इलाकों में कत्लेआम के बीच जनता घरों से निकल कर आतंकियों से मुकाबले को खड़ी हो चुकी है। कुछ शहरों में सेना के कमजोर पड़ने के बाद धर्म गुरुओं की अपील पर इराक की खातिर वहां के लोग अब जान की परवाह किए बिना सड़कों पर उतर आए हैं। इनसे विद्रोहियों को कड़ी टक्कर मिल रही है। आतंकी मोसुल से आगे नहीं बढ़ सके हैं। यह खुलासा आतंकियों के कब्जे वाले मोसुल से महज ढाई सौ किमी दूर नजफ से काशी आए शोध छात्र वसीम रिजवी ने गुरुवार को अमर उजाला से बातचीत में किया।
महज पांच महीने पहले इराक गए प्रह्लाद घाट निवासी वसीम नजफ के हौज-ए-इल्मिया विश्वविद्यालय से ‘कुरान और इतिहास’ विषय पर शोध कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इराकी शहरों, तेल भंडारों पर कब्जा करने वाले किसी समुदाय विशेष के लोग नहीं, बल्कि प्रशिक्षित आतंकवादी हैं। वे नहीं चाहते कि इराक में शांति स्थापित हो और दूसरे मुल्कों के नागरिक वहां व्यापार, रोजगार और शिक्षा के लिए प्रवास कर सकें।
सैकड़ों भारतीय हिंसाग्रस्त इलाकों में फंसे
ये आतंकी इराक के ही हैं या कहीं और से उन्हें भेजा गया है? इस सवाल पर वसीम का कहना था कि हथियारबंद होकर कब्जे की कार्रवाई करने वाले घुसपैठिए हैं। पाकिस्तान आतंकवादियों की सबसे बड़ी पनाहगाह बन गया है। ऐसे आतंकवादियों के पैर उखाड़ने के लिए अमेरिका ही नहीं, पूरे विश्व समुदाय को मिलकर आगे आना चाहिए।
वसीम ने बताया कि मोसुल से जिन भारतीयों को आतंकियों ने अगवा किया गया है, उनके अलावा भी सैकड़ों भारतीय उन हिंसाग्रस्त इलाकों में फंसे हुए हैं। ऐसे भारतीयों की सकुशल रिहाई और वतन वापसी के लिए केंद्र सरकार को ठोस कदम उठाना चाहिए। मोसुल में जिस दिन भारतीयों को आतंकियों ने अगवा किया था, उसी दिन वसीम नजफ एयरपोर्ट से वतन के लिए रवानगी की थी। नजफ से बहरीन और फिर वहां से वे दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे।
दिल्ली से शिवगंगा एक्सप्रेस से वह घर आए तो मदरसा जव्वादिया अरबी कॉलेज के प्रिंसिपल और उनके पिता सैयद शमसुल हसन रिजवी की खुशी की ठिकाना नहीं रहा। वसीम ने बताया कि नजफ के विश्वविद्यालय में भदोही के मुजत्तम, जलालपुर (संत कबीरनगर) के फिरोज अली, सीवान (बिहार) के जीशान हैदर, गोपालपुर के कामरान हैदर, सरैया (तिलौथू) के मुदस्सिर हुसैन समेत 35 से अधिक छात्र सलामत हैं।