मोदी सरकार को फिर भाया यूपीए का काम
एक बार फिर मोदी सरकार को पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की सोच पसंद आई है। यूपीए सरकार की तर्ज पर एनडीए सरकार भी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-66 ए की वैधता के पक्ष में है। यह धारा पुलिस को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करने वालों को गिरफ्तार करने का अधिकार प्रदान करती है।
एनडीए सरकार ने कहा कि साइबर वर्ल्ड का आयाम बहुत बड़ा है, लिहाजा खतरे भी हैं। सरकार ने कहा है कि धारा-66 ए सूचना प्रौद्योगिकी के युग में होने वाले खतरों को लगाम लगाने का एक जरिया है। धारा-66 ए की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली चार जनहित याचिकाओं के जवाब में एनडीए सरकार ने कहा कि यह प्रावधान अभिव्यक्ति के मूल अधिकार पर यथोचित पाबंदी लगाने के लिए है।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में सरकार ने कहा है कि यूपीए सरकार द्वारा मई 2013 को जारी परामर्श (एडवाइजरी) सही है क्योंकि इसमें पर्याप्त सुरक्षा उपाय हैं। इस परामर्श के तहत व्यक्ति को गिरफ्तार करने से पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से इजाजत लेना जरूरी बताया गया था।
कई देशों में हैं ऐसे प्रावधान
एनडीए सरकार का कहना है कि 2013 की एडवाइजरी में यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल ईमानदारी और कानूनी तरीके से हो न कि इसके जरिए कोई प्रताड़ित हो।
मालूम हो कि एक महीने पहले केंद्र सरकार के विधि अधिकारी ने अदालत को बताया था कि इस मसले को लेकर सरकार के ऊपरी स्तर पर बातचीत चल रही है। संभवत: उनका इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर था। सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में भी इसी तरह के प्रावधान हैं।
मालूम हो कि अदालत सूचना प्रौद्योगिकी की धारा-66 ए के दुरुपयोग के संबंध में दाखिल चार जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। याचिकाओं में कहा गया है कि यह धारा पुलिस को अतिरिक्त अधिकार देता है। पुलिस को सोशल वेबसाइटों पर आपत्तिजनक बयान या सामग्री जारी या प्रसारित करने वाले गिरफ्तार करने की खुली छूट मिली हुई है। पुलिस द्वारा इसका बेहद दुरुपयोग किया जा रहा है। याचिकाओं में धारा-66 ए की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है।