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अफजल को फांसीः सरकार ने साधे एक साथ कई निशाने

नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Sat, 09 Feb 2013 11:43 PM IST
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संसद हमले के दोषी आतंकी अफजल गुरू को फंदे पर लटकाने के फैसले को यूपीए सरकार-कांग्रेस ‘अराजनीतिक’ साबित करने की चाहे तमाम कोशिशें करे, लेकिन उसने एक तीर से कई निशाने साध दिए हैं। अफजल की फांसी के लंबे अर्से से लटके मुद्दे पर अचानक फैसला सरकार की अगले आम चुनाव की तैयारी का पुख्ता संकेत माना जा रहा है।
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इस फैसले से सरकार ने खुद पर से आतंकवाद के प्रति नरम होने का दाग धोया है तो साथ ही 2014 में नरेंद्र मोदी के केंद्र की ओर बढ़ते सियासी उफान को मंद करने की बड़ी कोशिश भी की है। देशभर में अचानक चली राहुल बनाम मोदी की बहस को रोकने में सरकार का यह कदम कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हो सकता है।


हिंदू आतंकवाद के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के विवादित बयान पर सियासी हमलों का मोर्चा खोल चुकी भाजपा की आक्रामकता पर ब्रेक लगाने के लिहाज से भी अफजल की फांसी सरकार के बचाव का हथियार बनेगी।

अफजल और कसाब की फांसी के साथ तमाम आर्थिक और लोक-लुभावने फैसलों के इन सिलसिलों को देखते हुए ही समय से पहले आम चुनाव कराने की संप्रग सरकार-कांग्रेस की तैयारियों की संभावनाओं को बल मिलने लगा है।

भाजपा यूपीए सरकार पर आतंकवाद के प्रति नरम रवैया अपनाने का आरोप लगाती रही है। मगर पहले कसाब और अब अफजल को फांसी पर चढ़ा कर सरकार ने भाजपा से आतंकवाद पर नरम होने का मुद्दा ही छीन लिया है। संसद के बजट सत्र से ठीक पहले अफजल के बहाने शिंदे और सरकार पर हमला बोलने का ऐलान कर चुकी भाजपा को अपनी रणनीति में नए पैंतरे आजमाने होंगे।

यह हकीकत है कि नरेंद्र मोदी के भाजपा के भीतर प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार के रूप में उभरने से कांग्रेस की सियासी परेशानी भी बढ़ रही है। राहुल गांधी को अगले चुनाव में अपना चेहरा बना चुकी कांग्रेस मीडिया की सुर्खियों में मोदी के बढ़ते उफान से चिंतित है।

वैसे सरकार के इस फैसले में राजनीति पढ़ने के विपक्ष के नजरिए पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा है कि भाजपा को अब इस मसले पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। यह जनता की मांग पर लिया गया फैसला है। वहीं सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि यह एक न्यायिक फैसला है और इसे राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

सरकार के हालिया फैसलों से समय से पहले चुनाव होने की संभावना को बल मिल रहा है। राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि 2014 तक सरकार सत्ता विरोधी लहरों को थामने में सक्षम महसूस नहीं कर रही है। इसलिए समय से पहले चुनाव कराकर सरकार इन फैसलों का चुनावी फायदा उठाने की फिराक में है।

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