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फांसी का नाम सुनते ही उड़ गई थी अफजल की नींद

नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Sun, 10 Feb 2013 08:10 PM IST
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afzal guru hanged convicted in parliament attack

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देश की सर्वोच्च संस्था संसद पर हमले की दुस्साहसपूर्ण साजिश रचने के गुनहगार अफजल गुरू को आखिरकार फांसी पर लटका दिया गया। भले ही उसे उसके अंजाम तक पहुंचाने में 12 साल लग गए, लेकिन अंत में न्याय की जीत हुई। इससे आतंक के खिलाफ जंग में अपनी गंभीरता का संदेश भी भारत ने दुनिया को एक बार फिर दे दिया है।
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आखिरी रात नहीं सोया
तिहाड़ में बंद अफजल को शुक्रवार रात दस बजे बताया गया कि उसे शनिवार सुबह फांसी दी जाएगी। इससे पहले शाम करीब सात बजे डॉक्टरों की एक टीम ने उसकी मेडिकल जांच की। बिना खाना खाए वह रात को अपनी बैरक में चला गया। इसके बाद वह पूरी रात सो नहीं पाया। सूत्रों की मानें तो उसने पढ़ने के लिए धार्मिक पुस्तक मांगी।


नहीं बताई अंतिम इच्छा

सुबह नहाने से पहले फिर अफजल की मेडिकल जांच की गई। नहाने के बाद उसे पहनने के लिए नए सफेद वस्त्र दिए गए। अफजल ने सुबह की नमाज अदा की। अंतिम इच्छा पूछने पर उसने किसी भी तरह की इच्छा से इंकार कर दिया।

फांसी से पहले
फांसी देते समय जेल नंबर 3 में अफजल के अलावा सिर्फ 6 लोग मौजूद थे। इनमें जल्लाद, मजिस्ट्रेट, डॉक्टर और जेल के तीन अधिकारी शामिल थे। जिस रस्सी से फांसी का फंदा बनाया गया, उस पर पहले ही अफजल के बराबर वजन लटका कर देख लिया गया था।

ऐसे दबा लीवर
फांसी से पहले जल्लाद ने अफजल के पैरों को हाथ लगाया और कहा कि वह उसे मार नहीं रहा है, बल्कि संविधान का पालन कर रहा है। 8 बजे मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया और जल्लाद ने लीवर दबा दिया। करीब दस मिनट फंदे पर झूलने के बाद दो बार उसकी जांच की गई और तब डॉक्टर ने अफजल को मृत घोषित कर दिया।

जेल में ही दफन
जेल में तैनात एक कर्मचारी ने ही मौलवी की भूमिका निभाते हुए जनाजे की नमाज पढ़वाई। जेल के ही चंद लोग जनाजे की नमाज में शामिल हुए। अफजल के शव पर किसी ने दावा नहीं किया, लिहाजा उसे जेल मैन्युअल के मुताबिक तिहाड़ परिसर में जेल नंबर 3 के पास दफना दिया गया। उसके लिए एक कब्र खोदी गई, जहां किसी तरह का कोई निशान नहीं छोड़ा जाएगा। ताकि किसी को पता नहीं चल सके कि उसे किस जगह दफन किया गया है।

यूं तय हुई फांसी
21 जनवरी को गृह मंत्री ने राष्ट्रपति से अफजल की दया याचिका खारिज करने की सिफारिश की।
3 फरवरी को राष्ट्रपति ने दया याचिका खारिज की।
4 फरवरी को गृह मंत्री शिंदे ने इस पर दस्तखत किए।

ऐसे हुआ अंत
8 फरवरी की रात अफजल को बताया गया कि सुबह उसे फांसी दी जाएगी।
7:30 बजे सुबह फांसी के तख्ते की तरफ ले जाया गया।
8:00 बजे फांसी दी गई।
9:00 बजे करीब जेल में दफनाया।

कसाब की तरह गोपनीय रहा अभियान
सरकार ने अफजल गुरू को फांसी देने का ऑपरेशन भी बिलकुल उसी तरह गोपनीय रखा, जिस तरह मुंबई हमलों के गुनहगार पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को फंदे पर लटकाने को रखा गया था। मुंबई की ऑर्थर रोड जेल में बंद कसाब को बेहद गोपनीय ऑपरेशन में पुणे की येरवडा जेल ले जाकर फांसी दी गई थी।

13 दिसंबर का वह काला दिन
संसद का सत्र चल रहा था। तभी आधुनिक हथियारों से लैस पांच आतंकियों ने 13 दिसंबर, 2001 को दोपहर डेढ़ बजे करीब देश की सर्वोच्च संस्था और लोकतंत्र के मंदिर संसद पर हमला बोला था। एंबेसडर कार में सवार होकर ये आतंकी संसद परिसर में अंदर घुस गए थे।

इन आतंकियों की अंधाधुंध फायरिंग में आठ सुरक्षाकर्मियों समेत नौ लोगों की जान चली गई थी। करीब आधे घंटे तक चली मुठभेड़ में सुरक्षाकर्मियों ने पांचों आतंकियों को मार गिराया। इस हमले में घायल एक पत्रकार ने भी बाद में दम तोड़ दिया।

कौन था अफजल गुरू
उत्तरी कश्मीर के सोपोर का रहने वाला अफजल गुरू मेडिकल का स्टूडेंट भी रहा था, लेकिन उसका कोर्स बीच में ही छूट गया। बाद में उसने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस से बीए किया। फिर वह फलों का कारोबार करने लगा। इस बीच वह आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ गया। वह 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हमले की साजिश में ही शामिल नहीं था, बल्कि उसने हमला करने वाले इन आतंकियों को पनाह भी दी।

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