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हार और बगावती तेवरों से परेशान कांग्रेस

Wed, 23 Jul 2014 10:32 PM IST
ज़ुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
ज़ुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Wed, 23 Jul 2014 10:32 PM IST
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after defeat congress rebels creats tension

लोकसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए सुनामी साबित हुआ। अब तक इसका असर बाक़ी है, जो छोटे-छोटे विद्रोहों की शक्ल में नजर आ रहा है। आखिर यह बगावत किस करवट बैठेगी।

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साल 2050, स्कूल में आधुनिक इतिहास की एक किताब के चैप्टर की सुर्ख़ी है “एक थी कांग्रेस”। साल 2014 में यह कल्पनात्मक मंजर 129 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के दुश्मनों का एक हसीन सपना मालूम होता है, जो शायद कभी साकार न हो।
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मगर इस साल आम चुनाव में शर्मनाक हार के बाद जिस तरह पार्टी के अंदर और इसकी राज्य सरकारों में बगावत छिड़ी है, कोई ताज्जुब नहीं इसके विरोधियों का यह सपना सच साबित हो जाए।
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एक के बाद एक बगावत

after defeat congress rebels creats tension

सोमवार को कांग्रेस हाईकमान को पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारों के राज्यों से एक के बाद एक कई झटके लगे।

असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के ख़िलाफ़ विधायकों के एक गुट ने बगावत कर दी। स्वास्थ्य मंत्री हेमंतो बिसवा सर्मा के नेतृत्व में दर्जनों विधायकों ने राज्यपाल को इस्तीफा सौंप दिया।

सर्मा ने सफाई दी कि उनकी बगावत पार्टी नेता राहुल गांधी के खिलाफ नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के खिलाफ है। मगर गोगोई को गांधी परिवार का समर्थन हासिल है। इसलिए उनके खिलाफ बगावत का मतलब पार्टी हाईकमान के खिलाफ बगावत माना जाएगा।

कई राज्यों में विरोध के सुर

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हरियाणा में पार्टी के वरिष्ठ नेता बिरेन्द्र सिंह ने मुख्यमंत्री और राहुल गांधी के क़रीबी समझे जाने वाले भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। राज्य में अक्तूबर में चुनाव होने हैं।

महाराष्ट्र में भी चुनाव की तैयारी शुरू होने वाली है पर उद्योग मंत्री नारायण राणे ने इस्तीफा देकर पार्टी को संकट में डाल दिया है।

जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस से पांच साल पुराना रिश्ता तोड़ लिया है। वहां कुछ महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं, जो कांग्रेस को परेशानी में डाल सकते हैं।

इतिहास

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1885 में स्थापना के बाद कांग्रेस को लंबे इतिहास में इस चुनाव से पहले केवल तीन बार सत्ता से अलग रहना पड़ा है।

1977 के चुनाव में उसे करारी हार झेलनी पड़ी थी, पर साल 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पार्टी दोबारा सत्ता में लौटी। इसी तरह 1989 से 1991 तक पार्टी को सत्ता से बाहर रहना पड़ा।

केवल 1996 से 2004 तक ही ऐसा काल है, जब पार्टी को विपक्ष में रहना पड़ा। विशेषज्ञ कहते हैं कि गांधी परिवार के कारण ही पार्टी में अधिकतर संकट आए और गांधी परिवार के कारण ही पार्टी दोबारा सत्ता में लौटी।

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के समय एक छोटे से अरसे के लिए पार्टी की कमान सीताराम केसरी को सौंपी गई लेकिन पार्टी की मांग पर सोनिया गांधी ने पार्टी की अध्यक्षता कुबूल की और 2004 में पार्टी को सत्ता में दोबारा लाने में सफल हुईं।

दो सूरतें

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इस चुनाव में सोनिया गांधी ने तबियत ख़राब रहने के कारण अपना सारा काम अपने बेटे और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को सौंपा था। पार्टी के अंदर के लोग कहते हैं कि उन्होंने शिकस्त उसी समय मान ली थी।

हमें वो दबे शब्दों में कहते भी थे कि पार्टी के लिए बेहतर होगा कि वो कुछ समय विपक्ष का रोल अदा करें और इस दौरान पार्टी में नई जान फूंकी जाए।

मगर इस शर्मनाक हार की उन्हें भी उम्मीद नहीं थी। इससे राहुल गांधी की छवि और नेतृत्व पर प्रश्नचिह्न लगे और अब उनके खिलाफ अंदर ही अंदर आवाजें उठ रही हैं।

अब अंदर के लोग कहते हैं कि दो सूरत में पार्टी की प्रतिष्ठा बहाल हो सकती है– एक यह कि राहुल की बहन प्रियंका पार्टी की कमान संभालें, दूसरे, मोदी सरकार गलतियां पर गलतियां करे।

दोनों फ़िलहाल संभव नहीं दिखते। पार्टी का भविष्य अंधकार में भले न हो, उसे अपने वजूद को लेकर पहली बार ख़तरे का सामना करना पड़ रहा है।

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