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द्रौपदी को 40 साल बाद मिला इंसाफ का आश्वासन

Wed, 09 Jan 2013 09:45 PM IST
नई दिल्ली/पीयूष पांडेय
नई दिल्ली/पीयूष पांडेय Updated Wed, 09 Jan 2013 09:45 PM IST
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after 40 years draupadi got assurance of justice

न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है। सुप्रीम कोर्ट ने यह बात तब कही जब उसे पता लगा कि करीब 40 साल के लंबे अरसे तक इंसाफ के लिए अदालतों में भटकने वाले क्लर्क की मौत हो गई और अब उसकी पत्नी ने पति को इंसाफ दिलाने के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है। द्रौपदी देवी की इस हकीकत को जानने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को कड़ी फटकार लगाने के साथ उन्हें जल्द न्याय दिलाने का आश्वासन दिया है।

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जस्टिस डीके जैन की अध्यक्षता वाली पीठ ने सहकारी कंपनी में कार्यरत रहे क्लर्क दिवंगत राम अवतार गुप्ता की पत्नी की विशेष अनुमति याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार, को-ऑपरेटिव कंपनी लिमिटेड के महानिदेशक को नोटिस जारी किया। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि लेबर कोर्ट में इस मामले के दस्तावेज का रिकॉर्ड न मिलने की वजह से पीड़िता की याचिका खारिज किए जाने का कोई औचित्य नहीं था।
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एक भला व्यक्ति इंसाफ के लिए अदालतों के चक्कर काटते हुए मर गया और निचली अदालतें उसके दस्तावेज को भी संभालकर नहीं रख सकीं। चार दशक बीत गए और उसे एक छोटे से मामले में इंसाफ नहीं मिल पाया। वास्तव में न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर ही है। मगर अब उसकी पत्नी की ओर से दायर याचिका का निपटारा जल्द किया जाएगा।
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पीठ ने यह टिप्पणी अधिवक्ता अभिषेक गर्ग की ओर से दी गई उस दलील पर की, जिसमें बताया गया कि अप्रैल, 1971 में राम अवतार को झूठे आरोप में सहकारी कंपनी ने नौकरी से निकाल दिया था। इसके खिलाफ उसने फरवरी, 1972 में क्षेत्रीय समझौता अधिकारी के समक्ष आवेदन दाखिल किया था। जहां से उसके मामले को पहले औद्योगिक निपटारे और फिर लेबर कोर्ट में भेजा गया। लेबर कोर्ट ने नोटिस जारी किया पर इसके बाद मामला फिर कानपुर की लेबर कोर्ट में भेज दिया गया।

इसके बाद मामला मेरठ पहुंचा, जहां मई 1982 में उसकी याचिका बिना सुने ही खारिज कर दी गई। अगस्त, 1983 में उसने फिर से मेरठ लेबर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि उसके आवेदन की योग्यता पर विचार किया जाए। मगर तब कोर्ट ने कहा कि उसका मामला खारिज ही नहीं हुआ था, ऐसे में मामला लंबित होने के कारण नया आवेदन सुनवाई योग्य नहीं। इस आदेश के खिलाफ कंपनी ने 1996 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट में सुनवाई पर रोक लगा दी।


इस दौरान राम अवतार की मौत हो गई और फिर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आवेदन को लेबर कोर्ट खारिज कर चुकी है। इसके बाद क्लर्क की पत्नी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, तब मामले से संबंधित रिकॉर्ड लेबर कोर्ट से गायब हो गए और एक बार फिर हाईकोर्ट ने गत वर्ष फरवरी में द्रौपदी की याचिका खारिज कर दी। शीर्षस्थ अदालत ने अधिवक्ता के तर्क से सहमति जताते हुए चार सप्ताह में राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।

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