क्या वाकई आडवाणी लड़ रहे हैं वजूद की आखिरी लड़ाई
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लोकसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बावजूद पार्टी के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है। लालकृष्ण आडवाणी ने इस जीत पर अपनी टिप्पणी से यह साफ कर दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा को यह जीत भ्रष्टाचार और महंगाई को काबू करने में यूपीए-2 की नाकामी और उसके कुशासन की बदौलत मिली है।
आडवाणी ने कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की जीत में मोदी की भूमिका की पड़ताल करने की जरूरत है। इस जीत में कांग्रेस और इसकी सरकार के भ्रष्टाचार और वशंवादी राजनीति के खिलाफ दिए गए वोट की भूमिका है।
भाजपा के इस दिग्गज का यह बयान मोदी के साथ उनके असहज रिश्तों का सुबूत है। पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान आडवाणी ने जिस तरह का रुख जाहिर किया है इसे पार्टी में उनकी खोई जमीन फिर से हासिल करने की कोशिश माना जा रहा है।
आडवाणी के दिल की टीस
आडवाणी के दिल में प्रधानमंत्री पद के रेस में अपने ही शिष्य मोदी से पिछड़ जाने की खलिस लाजिमी है। इसके अलावा उन्हें अपने पसंदीदा जगह से चुनाव भी लड़ने नहीं दिया गया और न ही टिकट बंटवारे में कोई भूमिका दी गई।
शायद इसी उपेक्षा की वजह से उन्होंने जीत के बाद कहा, ‘इस चीज का विश्लेषण होना चाहिए कि नरेंद्र भाई को इस जीत का कितना श्रेय दिया जाए। हमें इस जीत में आरएसएस और भाजपा से जुड़े संगठनों की निभाई गई भूमिका का भी विश्लेषण करना होगा। दरअसल भाजपा की जीत से ज्यादा कांग्रेस की हार है।’
आडवाणी ने भी नहीं दिया जीत का श्रेय
मीडिया से अपनी बातचीत के दौरान आडवाणी ने एक बार भी नरेंद्र मोदी को इस जीत का श्रेय नहीं दिया और न उनका नाम लिया। इसके बजाय वह इस बात पर जोर देते रहे कि कांग्रेस देश का मूड भांपने में नाकाम रही। दरअसल लहर की वजह से ही भाजपा उन जगहों पर भी जीतने में कामयाब रही, जहां इसके पहले वह नहीं जीती थी।
आडवाणी का यह रुख पार्टी में मोदी के समर्थकों को नागवार गुजरा है। उनका मानना है कि नरेंद्र मोदी की बदौलत ही पार्टी को इतनी बड़ी जीत मिली है। आडवाणी की ओर से आरएसएस की भूमिका और कांग्रेस की हार पर जोर देना मोदी समर्थकों को रास नहीं आया है। गौरतलब है कि आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज मोदी को भाजपा का पीएम उम्मीदवार बनाए जाने के बिल्कुल खिलाफ थे।
आडवाणी के लिए पार्टी में नई भूमिका पर चर्चा हो रही है। लेकिन वह मोदी सरकार का हिस्सा नहीं बनना चाहते हैं। यही वजह है कि उन्होंने आक्रामक रुख अपनाया है। मोदी को जीत का श्रेय न देने से उन्हें जो भूमिका मिलनी थी उस पर भी अब ग्रहण लगता हुआ दिख रहा है। बहरहाल आडवाणी ने इस बयान के जरिये यह दिखाने की कोशिश की उनकी हस्ती अभी खत्म नहीं हुई है। पार्टी में उनका असर बरकरार है। लेकिन इस ऐतिहासिक जीत पर उनके ऐसे बयान उन्हें पार्टी और इसके बाहर अलग-थलग ही करेंगे।