हर्षवर्धन के नाम पर साथ आए आडवाणी और मोदी

विनोद अग्निहोत्री/दिल्ली Updated Thu, 24 Oct 2013 12:38 AM IST
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advani and modi came up with the name of harshvardhan

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भारतीय जनता पार्टी के भीतर दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित करने में जो कवायद और खींचतान हुई, उसमें पार्टी के शिखर नेता लाल कृष्ण आडवाणी और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी एक साथ खड़े नजर आए।
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वहीं भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और संगठन महासचिव रामलाल पर अरुण जेटली और सुषमा स्वराज भारी पड़े। जबकि भाजपा की डोर थामने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व भी इस मुद्दे पर बंटा था, लेकिन उसका ज्यादा झुकाव हर्षवर्धन के पक्ष में था।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष पद संभालने के बाद राजनाथ सिंह ने अपने विश्वस्त पार्टी रणनीतिकार सुधांशु मित्तल की सलाह पर उनके पुराने साथी रहे विजय गोयल को प्रदेश संगठन की कमान देकर उन्हें भरोसा दिया कि विधानसभा का चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा और वही पार्टी का चुनावी चेहरा होंगे।
जगजाहिर है सुधांशु मित्तल, अरुण जेटली की लड़ाई
इस भरोसे के बाद विजय गोयल पूरी ताकत से दिल्ली में पार्टी संगठन को मजबूत करने में जुट गए, लेकिन सुधांशु मित्तल की अरुण जेटली से लड़ाई जगजाहिर है।

अपने पिछले कार्यकाल में जब राजनाथ सिंह ने मित्तल को पूर्वोत्तर का चुनाव प्रभारी बनाया था तो नाराज जेटली कई दिनों तक पार्टी कार्यालय नहीं आए थे। इसलिए मित्तल के दोस्त विजय गोयल जेटली को कतई बर्दाश्त नहीं थे।

वैसे भी एनडीए सरकार के दिनों में प्रमोद महाजन, विजय गोयल और सुधांशु मित्तल की तिकड़ी वाजपेयी सरकार में सत्ता का प्रमुख केंद्र थी।

जेटली खेमा था विजय गोयल के खिलाफ
सूत्रों के मुताबिक शुरु से जेटली खेमे की ओर से विजय गोयल की छवि को लेकर मीडिया और पार्टी के भीतर प्रचार होने लगा और चुनाव आते आते यह माहौल बन गया कि भाजपा गोयल की छवि के सहारे दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली कांग्रेस का मुकाबला नहीं कर पाएगी।

दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी लगातार विजय गोयल की छवि को लेकर सवाल उठा रही थी। इससे भी भाजपा पर दबाव बढ़ गया, इसलिए पार्टी को चुनाव में स्वच्छ और ईमानदार छवि वाला चेहरा बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार पेश करना था।

काम आई हर्षवर्धन की स्वच्छ छवि
दिल्ली में भाजपा की मदनलाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा की सरकारों में मंत्री रह चुके हर्षवर्धन के कामकाज और स्वच्छ छवि को चुनावों में भुनाने के लिए जेटली खेमे ने उनका नाम आगे किया।

बताया जाता है कि जेटली ने ही आडवाणी, मोदी और सुषमा को भी इसके लिए राजी कर लिया, जबकि संगठन महासचिव रामलाल की सहानुभूति गोयल के साथ थी। लेकिन संघ नेतृत्व का भी एक बड़ा तबका हर्षवर्धन के पक्ष में था।

राजनाथ सिंह ने खुद को किया तटस्थ
ऐसे में राजनाथ सिंह ने खुद को तटस्थ कर लिया और गोयल का पक्ष कमजोर हो गया। शुरु में गोयल को भाजपा के दिल्ली प्रभारी नितिन गडकरी का समर्थन मिला, लेकिन बाद में गडकरी भी पीछे हट गए। आखिरकार विजय गोयल को अपना दावा छोडऩा पड़ा।
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