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बचपन में मांगी भीख, आज अमेरिका में आईटी विशेषज्ञ
नई दिल्ली/एजेंसी
Updated Thu, 11 Apr 2013 01:43 AM IST
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चार साल की उम्र में चाय की दुकान पर काम कर और भीख मांगने से शुरू हुआ जिंदगी का सफर अमेरिका तक पहुंचना बेहद रोमांचक है। ये कोई फिल्मी कहानी नहीं, ब्लकि अमेरिका के एक दिग्गज आईटी विशेषज्ञ किशन उपाध्याय की जीवन की सच्चाई है।
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उनके जीवन का सबसे भयावह पल था जब महज चार साल की उम्र में उनकी मां घर छोड़कर चली गई। उसके बाद से उनकी जिंदगी ही बदल गई।
आज किशन अमेरिका में आईटी विशेषज्ञ हैं और नॉर्थ केरोलिना स्थित ड्यूक युनिवर्सटी के चार इंस्टीट्यूट को टेकिनकल मदद देते हैं। करीब 40 साल बाद अपनी मां और बहन से मिलकर वह बहुत खुश हैं।
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यह वाकया वर्ष 1969 का है जब गुवाहाटी में गर्मियों के मौसम में एक दिन में चार वर्षीय किशन से उसकी मां किचन में जाकर संतरे खाने के लिए कहा।
किशन संतरा खाने के लिए गया और जब वापस लौटा तो उसकी मां कमरे में नहीं थी। वह घर छोड़कर जा चुकी थी। किशन और उसकी आठ साल की बहन माया, मां के चले जाने के सदमे से उबर ही नहीं पाए थे कि उनके पिता उन्हें नेपाल में मौजूद एक रिश्तेदार के घर रहने के लिए रवाना कर देते हैं।
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बच्चों के पिता गुवाहाटी में चौथी असम बटालियन में पोस्टेड थे। किस्मत ने उन दोनों के साथ यहां भी खिलवाड़ किया और दोनों रास्ता भटक गए।
रिश्तेदार के यहां पहुंचने की बजाए काठमांडू की सड़कों पर भटकते रहे। दोनों ही हताश हो चुके थे। जैसे तैसे उस उस बालक को पहली नौकरी मिली और वह चाय की दुकान पर काम करने लगा।
उसकी बहन एक मंदिर के बाहर फूलों की माला बेचने लगी, लेकिन मुश्किलों ने यहां भी उनका साथ नहीं छोड़ा।
वहां काम करते हुए कई तरह की आलोचनाएं और प्रताड़नाएं झेलने की वजह से किशन की सेहत बुरी तरह से प्रभावित हुई। किशन को बुखार आ गया और इसी वजह से उसे नौकरी से निकाल दिया गया।
जिंदा रहने के लिए पैसे तो जरूरी होते हैं ऐसे में किशन ने भीख मांगना शुरू किया। लेकिन धीरे-धीरे किशन को निमोनिया ने ऐसा जकड़ा कि उसकी जिंदगी पर ही बन आई।
माया घबरा गई और वह जल्दी से अपने भाई को क्रिश्चन मिशनरीस के अस्पताल में दाखिल करा आई। किशन वहां करीब छह माह तक भर्ती रहा। किशन जब स्वस्थ होकर निकला तो उसकी बहन का कोई अता-पता नही था।
लेकिन यहां से किशन की जिंदगी बदली और उसकी मुलाकात एक अमेरिकन डॉक्टर से हुई। डॉक्टर ने एक स्कॉलरशिप की पेशकश कर किशन को अमेरिका में पढ़ने की सलाह दी।
किशन इस तरह अमेरिका पहुंचा। पढ़ाई से लेकर आईटी विशेषज्ञ बनने तक वह हमेशा अपने परिवार को खोजता रहा। जैसे तैसे फेसबुक के माध्यम से किशन ने असम पुलिस के दो अधिकारियों से संपर्क किया।
उन दोनों अधिकारियों ने किशन की मदद की और एक अन्य हवलदार होम बहादुर थापा से किशन के पिता के बारे में पता चला। थापा ने किशन को बताया कि उसके पिता का 1988 में निधन हो गया था।
वह अपनी दूसरी पत्नी और उसके बच्चों के साथ यहां रहते थे। जैसे-तैसे किशन अपने परिवार से मिला और उसे उसकी सबसे लाड़ली बहन माया भी मिल गई।
‘मां मुझे संतरा खाना है’
परिवार के मिलने के बाद किशन ने अपनी मां और बहन के साथ दस दिन बिताए। एक दिन कार में सफर के दौरान किशन ने मां से कहा कि ‘मां मुझे संतरा खाना है’।
किशन ने इस बात को तीन बार दोहराया ताकि उसकी मां उसे बता सकी कि आखिर वह घर छोड़कर क्यों चली गई थी, लेकिन वह चुप रही। लेकिन यह सुनकर उसकी बहन माया फफक पड़ी।
किशन ने हाल ही में अपने जीवन की इस कहानी पर पुस्तक लिखने के लिए अमेरिकी पब्लिशर को अधिकार बेचे हैं जिसका नाम है ‘द लास्ट ऑरेंज टू बाया’।