हाथी की सूंड में घुसी चींटी
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मध्यपूर्व यानी पश्चिमी एशियाई देशों की एक किंवदंती कथा है डेविड और गोलियाथ की। कहते हैं कि गोलियाथ एक विशालकाय, शक्तिशाली और हथियारों से लैस योद्धा था और डेविड एक चरवाहा जो छोटे क़द का दुबला पतला था। उसके पास हथियार के नाम पर सिर्फ़ एक गुलेल थी। और दोनों के बीच जब युद्ध हुआ तो डेविड ने गोलियाथ को धराशाई कर दिया।
मैल्कम ग्लैडवेल ने अपनी किताब 'डेविड एंड गोलियाथ' में इस युद्ध का अद्भुत चित्रण किया है। इस किताब की ख़ासियत इस युद्ध का चित्रण नहीं है। इस युद्ध का विश्लेषण है। ग्लैडवेल ने इस एक युद्ध के बहाने से दुनिया भर में हुए युद्धों और संघर्षों का विश्लेषण किया है। उनका आकलन है कि यदि आकार में छोटे और कमज़ोर लोग अगर अपनी रणनीति बदल लें तो वे महायोद्धाओं और विशालकाय प्रतिद्वंद्वियों को भी पछाड़ सकते हैं। उन्होंने लिखा है कि दुनिया भर में हुए युद्धों में से 63.6 प्रतिशत लड़ाइयां उन छोटे देशों ने जीत ली हैं जिन्होंने ग़ैर-पारंपरिक रणनीति अपनाई।
ग्लैडवेल का कहना है कि जब कमज़ोर और शक्तिशाली या सर्वशक्तिमान और साधनविहीन के बीच लड़ाई होती है तो जीत ग़ैर-पारंपरिक रणनीति की होने की संभावना बढ़ जाती है। अक्सर लोग चपलता, स्फुर्ति और तेज़ी की ताक़त का आकलन करना भूल जाते हैं।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की लड़ाई दरअसल डेविड और गोलियाथ की कहानी की तरह ही है। डेविड ने एक बार फिर गोलियाथ को पछाड़ दिया है।
2014 के लोकसभा चुनावों में भारी भरकम जीत के बाद नरेंद्र मोदी को अगर यह भ्रम हो गया था कि वे सर्वशक्तिमान हैं, तो ग़लत भी नहीं था। उन्होंने निश्चित तौर पर इतिहास रचा। अगर इस जीत के बाद वे अमित शाह के साथ पार्टी से बड़े दिखने लगे थे, तो ये भी स्वाभाविक था। उन्होंने कांग्रेस को जिस तरह से 44 सीटों तक समेट दिया, उसमें यह भ्रम भी ग़ैर-वाजिब नहीं था कि अब उनके सामने कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है।
लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह कुछ संकेतों को समझने में चूक कर गए। लोकसभा चुनाव के बाद जिन चार राज्यों में चुनाव हुए उनके परिणामों को अगर वे थोड़ी सावधानी से देखते तो शायद वे समझ जाते कि वे सर्वशक्तिमान नहीं हैं। जिस समय ये दोनों नेता और उनकी पार्टी हरियाणा और झारखंड के चुनावों में जीत के जश्न में मगन थे, वे महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों का आकलन करने से चूक गए। या फिर उसे जानबूझकर अनदेखा किया। महाराष्ट्र के चुनाव के नतीजे बता रहे थे कि नरेंद्र मोदी का जादू लोकसभा चुनावों जैसा असरदार नहीं रह गया है। इसलिए वे ये ग़लती भी कर बैठे कि एक छोटे राज्य के चुनाव को भी उन्होंने अपने सर पर ले लिया। वे इसे राज्य इकाई पर छोड़कर भी काम चला सकते थे। ये चुनाव मोदी और केजरीवाल के बीच नहीं था लेकिन उन्होंने ख़ुद इसे ऐसा बना लिया।
आत्ममुग्धता से भरे नरेंद्र मोदी भूल गए कि जनता ने उन्हें ताक़तवर सरकार चलाने के लिए दी है। काम करने के लिए दी है। देश को कांग्रेस या विपक्ष से मुक्त करने के लिए नहीं। अगर केंद्र सरकार के पिछले नौ महीनों के कार्यकाल को देखें तो पता चलेगा कि दरअसल इस सरकार ने अब तक कोई ऐसा ठोस क़दम नहीं उठाया है जिसे जनता काम की तरह देख सके। अब तक तो वे यूपीए के फ़ैसलों को ही अमलीजामा पहना रहे हैं। योजना आयोग को नीति आयोग बनाने जैसे निर्णयों से जनता को सीधे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। हो सकता है कि उनकी जीत हिंदुत्व की जीत रही हो, लेकिन वह मुसलमानों और ईसाइयों को देश से भगाने के लिए नहीं थी। न हिंदू महिलाओं को चार-पांच बच्चे पैदा करने की नसीहत देने के लिए। अब शायद उन्हें ये आकलन करने का मौक़ा मिलेगा।
दूसरी तरफ़ अरविंद केजरीवाल हैं। अगर हम भारत की पारंपरिक राजनीति को देखें, तो वे एक तरह से ग़ैर-राजनीतिक व्यक्ति हैं। वे दरअसल भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक सामाजिक आंदोलन की उपज हैं। अन्ना हज़ारे की इच्छा के ख़िलाफ़ जो राजनीतिक दल उन्होंने बनाया वह भी ग़ैर-पारंपरिक तरीक़े से ही काम करता है। दिल्ली में उनकी पार्टी की पिछली जीत भी अप्रत्याशित थी। हालांकि वे सरकार चला नहीं सके क्योंकि वे सरकार भी ग़ैर-पारंपरिक तरीक़े से चलाना चाहते थे। दरअसल उनकी रणनीति हमेशा ग़ैर-पारंपरिक रही है। जब नरेंद्र मोदी जैसा ताक़तवर व्यक्ति भी दो सीटों से चुनाव लड़ रहा था, तब अरविंद केजरीवाल ने वाराणसी जाकर मोदी को चुनौती देने जैसा क़दम उठाया। अपने साथियों को भी उन्होंने दूसरे बड़े दिग्गजों के ख़िलाफ़ खड़ा किया।
जब आपके पास गंवाने को कुछ नहीं होता तो आप ख़तरे उठा सकते हैं और नियम क़ायदों को तोड़ सकते हैं। अरविंद केजरीवाल ने यही किया। जब उन पर चौतरफ़े व्यक्तिगत हमले हो रहे थे, तब वे मुस्कुराकर जवाब देते रहे। न सिर्फ़ वे बल्कि उनकी पूरी पार्टी शांत बनी रही। तो यह एक तरह से निरीह, दुर्बल और अपरिपक्व राजनीतिक दिखने की रणनीति का परिणाम है।
लेकिन सबक सीखने के लिए अरविंद केजरीवाल के पास भी बहुत कुछ है। उन्हें इस संसदीय प्रणाली में अपनी राजनीतिक सीमाएं समझनी होंगी। इस सच्चाई से रूबरू होना होगा कि दिल्ली में उनके पास पुलिस नहीं होगी और गाहे-ब-गाहे उन्हें उसी केंद्र सरकार के पास जाना होगा जिसकी आंख में वे कांटे की तरह धंस गए हैं। उन पर भी अराजक होने का आरोप है। उनके नेताओं के व्यवहार पर कई सवाल हैं। पिछली बार दिल्ली के नतीजों से वे जिस तरह से उत्साहित हो गए थे, वह भी राजनीतिक उतावलेपन की तरह दिखा। देखना होगा कि वे अपनी नई ज़िम्मेदारियों के बीच इन चुनौतियों से कैसे निपटेंगे।
इस चुनाव से मोदी सरकार के भविष्य पर कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है। अमित मोदी की अध्यक्षता पर शायद आंच न आए। लेकिन जिस तरह से इन दोनों नेताओं ने दिल्ली में ख़ुद को केजरीवाल के ख़िलाफ़ खड़ा कर लिया उसने उनकी साख़ पर सवाल तो खड़े कर दिए हैं। किरण बेदी बीच में आईं, लेकिन उनकी उपस्थिति गौण सी थी। इन दोनों नेताओं को लगा था कि हाथी की लड़ाई एक चींटी के ख़िलाफ़ है। लेकिन ऐसा लगता है कि इस बार चींटी हाथी की सूंड में घुस गई है।