जब सियासत के गीत गुनगुनाने लगा मोहब्बत का शायर
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'कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है...।' कभी-कभी किसी कवि की सिर्फ एक लाइन उसके पूरे करियर को बयान करने के लिए काफी साबित होती है। कुमार विश्वास के साथ शायद ऐसा ही है। सरल हिंदी-उर्दू के धागों में पिरोई अपनी आसान कविताओं के बूते नौजवान पीढ़ी तक पहुंचा एक कवि पहले आंदोलनकारी बना और फिर नेता में तब्दील हो गया।
वही कौम, जिसे आड़े हाथों लेने में कवियों को खूब मजा आता है। जब पाले बदले, तो मिजाज भी बदल गए। 2002 में एक वक्त था जब वरिष्ठ कवियों ने उन कार्यक्रमों से कन्नी काट ली, जहां कुमार विश्वास मौजूद रहते थे। इससे निपटने के लिए मेरठ यूनिवर्सिटी के टॉपर विश्वास ने देश के शीर्ष संस्थानों के इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट छात्रों के रूप में नया दांव खेला।
जोरदार पीआर और आक्रामक मार्केटिंग के बूते उन्होंने इन संस्थानों में अपनी कविताओं के लिए पैठ बना ली। लेकिन अब यह कवि, एक नेता बन चुका है। आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सबसे करीबी नेताओं में शुमार कुमार विश्वास ने इस बार निशाना ऐसी जगह साधा है, जहां तक पहुंचने की हिम्मत कई पुराने दिग्गज नहीं दिखा पाए। उन्हें हिम्मती कह लीजिए या दुस्साहसी, वो राहुल गांधी से टक्कर ले रहे हैं और नरेंद्र मोदी को भी ललकार चुके हैं।
कैमरों से पुरानी दोस्ती रही कुमार की
कुमार विश्वास की वेबसाइट उनकी तारीफ में कोई कसर नहीं छोड़ रही। इसमें कवि और मोटिवेटर बताते हुए यह कहा गया, "डॉ. कुमार विश्वास युवाओं की प्रेरणा हैं, जिनके व्यक्तित्व के कई पहलू हैं। जाने-माने हिंदी कवि के रूप में उन्हें दुनिया भर में जाना जाता है। उन्हें हिंदी कविताओं को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का श्रेय दिया जाता है।" यह और बात है कि हिंदी कविताओं के इस योद्धा की यह चमचमाती वेबसाइट अंग्रेजी में है।
बतौर कवि हो या नेता, कुमार को मीडिया के कैमरे हमेशा से पसंद रहे हैं। यह और बात है कि जब उन्होंने सियासत में कदम रखा और कांग्रेस-भाजपा के मंझे नेताओं पर हमले बोलने शुरू किए, तो विरोधियों ने यूट्यूब खंगालकर कुछ ऐसे वीडियो निकाल लिए, जिस पर जवाब देना उनके बूते से बाहर हो गया। सिवाय माफी मांगने के कोई विकल्प न बचा। राजनीति निगोड़ी चीज ही ऐसी है।
अमेठी से खम ठोक रहे कुमार की सक्रियता देख कांग्रेस ने तैयारियां तेज कर दी थीं और ऐलान कर दिया कि जो राहुल गांधी के खिलाफ हारना चाहता है, अमेठी में उसका स्वागत है। हालांकि, यह अभी साफ नहीं है कि राहुल अपनी पुरानी सीट से ही लड़ेंगे या नए लोकसभा क्षेत्र की ओर प्रस्थान करेंगे।
कुछ लोगों को घमंडी लगते हैं AAP के नेता
कुमार विश्वास को कुछ लोग बड़बोला कहते हैं, कुछ उन्हें घमंडी कहकर पुकारते हैं। उनके पिता तक कह चुके हैं कि अगर वो राहुल गांधी को हराने में कामयाब साबित होते हैं, तो यह चमत्कार से कम नहीं होगा। उनके मुताबिक यह कवि शुरुआत से जिद्दी रहा है।
चंद्रपाल शर्मा ने एक इंटरव्यू में कहा था, "मैंने कुमार को दिल्ली की किसी सीट से लड़ने को कहा था, लेकिन वो जिद्दी है। वह गांधी के खिलाफ लड़ना चाहते हैं। मेरे बेटे ने कभी मेरी बात नहीं सुनी।"
बहरहाल, धार्मिक भावनाएं भड़काने वाली आपत्तिजनक टिप्पणियां हो या फिर केरल की नर्सों को 'काली-पीली' कहना, कुमार कई बार बोलते वक्त लगाम भी खो चुके हैं। वह स्कूली दिनों से पढ़ने में तेज थे, सो उनके पिता चाहते थे कि वह इंजीनियर बने। लेकिन उन्होंने आर्ट्स में दाखिला लिया। हापुड़ के कॉलेज से हिंदी स्नातकोत्तर में टॉप किया और कविताओं की दुनिया में उतर गए। शादी भी दूसरी जाति में की।
फिलहाल स्टडी लीव लेकर अमेठी की सियासी जमीन टटोल रहे विश्वास ने साहिबाबाद के जिस लाला लाजपत राय कॉलेज में पढ़ाया, वहां के शिक्षकों का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में वो भले कितनी नैतिकता और मूल्यों की बात करें, हकीकत यह है कि उन्होंने क्लास लेने में कभी खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। कुमार के केजरीवाल तक पहुंचने की कहानी भी दिलचस्प है।
प्रदर्शनों के दौरान जुड़े केजरीवाल से
जब कुमार विश्वास के बायोडाटा में स्टेज परफॉर्मेंस, लेखन और सामाजिक कार्यकर्ता जैसे लफ्ज लिखे जा रहे थे, वह अरविंद केजरीवाल के संपर्क में आए। यह 2006 था और उन्होंने विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होना शुरू किया। खुद को कभी हिंदी फिल्मों का लेखक बताने वाले इस कवि ने रोमांटिक लाइन लिखना छोड़ देशभक्ति की लाइन पकड़ी और उनके गीत अन्ना हजारे के अनशन और केजरीवाल के धरनों में गूंजने लगे।
कुमार विश्वास का कहना है कि भारतीय राजनीति की मौजूदा स्थिति खराब इसलिए है, क्योंकि अच्छे लोगों ने अब तक इससे दूरी बनाए रखी थी। जाहिर है, उनका इशारा खुद की तरफ है। वह कहते हैं, "लेकिन अब राजनीति मुख्यधारा का एजेंडा बन गई है और चीजों में बदलाव आने लगा है।" कुमार विश्वास की बोलने की शैली को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं, पर उनके पास इसके लिए तर्क मौजूद हैं। उनका कहना है, "मैंने कांग्रेस के नेताओं को सिर्फ धोखेबाज कहा है, जो सच है।
वे अरसे लोगों को छल रहे हैं।" जब केजरीवाल के मकान को लेकर बवाल मचा था, तो ट्विटर पर बेहद सक्रिय कुमार ने अपने मकान की तस्वीर डाली और साथ में लिखा, "7 कमरों का मेरा मकान, जो मैंने अपने पैसे और बैंक लोन से खरीदा। क्या अब मुझे भी खास आदमी कहा जाएगा?"
पहले से काफी महंगा हुआ कुमार को बुलाना
90 के दशक में हापुड़ में एक कंसर्ट में कुमार विश्वास ने 100 रुपए में कविता पाठ किया था, लेकिन अब वह डेढ़ से चार लाख रुपए वसूलते हैं। और उन्होंने केवल पैसे कमाने के मामले में ग्रोथ नहीं दिखाई है। मंचों पर वो अब भी दिखते हैं, लेकिन प्रोफाइल पहले से कहीं ज्यादा बड़ा हो चुका है। उम्मीद की जा रही थी कि वह दिल्ली विधानसभा चुनावों में उतर सकते हैं, लेकिन उन्होंने तब 'जोखिम' नहीं उठाया।
लेकिन दिल्ली की जीत ने आम आदमी पार्टी और कुमार, दोनों को नई ऊर्जा-नया आत्मविश्वास दिया। पुराने कुछ गुनाहों को बचपना और दिल्लगी में कही गई बात बताकर कुमार विश्वास माफी मांगते हुए आगे बढ़ रहे हैं। आम आदमी पार्टी भी उनके पीछे मजबूती से डटी खड़ी है। और उन्हें राहुल गांधी के खिलाफ मजबूत दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है। कवि का सफर वाकई दिलचस्प रहा है, लेकिन आने वाला कल कैसा होगा, यह उनकी राजनीतिक पारी का पहला चैप्टर बताएगा।
सियासत का नौसिखिया होने के बावजूद कुमार विश्वास को इस बात का इल्म जरूर होगा कि कॉलेजों में मोहब्बत वाली शायरी से नौजवानों का दिल जरूर लूटा जा सकता है, लेकिन धूल भरी सड़कों पर अपने दावों-वादों के दम पर वोट बटोरना कहीं मुश्किल जुगत है। देखते हैं यह दीवाना, कामयाब नेता बनेगा या फिर शायरी की ओर लौट जाएगा।