क्या साकार हो पाएगा मोदी का 'स्वच्छ भारत' का सपना?
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मीतू कुमारी बिहार में मुजफ्फरपुर में एक सरकारी स्कूल में प्रभारी हैं। लेकिन उनके मन में नरेंद्र मोदी की 'स्वच्छ भारत' योजना की घोषणा को लेकर बेहद सीमित खुशी है।
उनके लिए 146 बच्चों और तीन शिक्षिकाओं के स्कूल में शौचालय न होना एक न झेल पा सकने वाली समस्या है। फिर भी जब उनसे पूछा गया कि मोदी की 'स्वच्छ भारत' योजना के बारे में उनका क्या ख्याल है तो उनका कहना था, 'देखते हैं क्या होता है।'
मीतू का कहना है कि उन्होंने स्कूल के हालात को लेकर सभी को लिखा। गांव के मुखिया से लेकर अधिकारियों तक को पत्र लिखे लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। इसलिए किसी भी सरकारी योजना को लेकर उनमें कोई खास उत्साह नहीं है।
फिलहाल 'स्वच्छ भारत' के नाम पर मोदी ने एक ऐसा मुद्दा उठाया है जिसे लेकर स्कूल में खासकर लड़कियों में खासी उम्मीद जगी है। उन्हें लग रहा है कि अब स्कूल पहुंचने पर शायद उन्हें शौचालय न होने कि जिल्लत नहीं झेलनी पड़ेगी। या सिर्फ इसलिए स्कूल नहीं छोड़ना पड़ेगा कि उनके स्कूल में शौचायल नहीं है।
मोदी के इस मुद्दे पर फंड की भी कोई समस्या आती नहीं दिख रही। ये एक ऐसी दुर्लभ सी स्थिति है जब ऐसा लग रहा है कि शायद चीजें वहां पहुंच रही हैं जिसकी उम्मीद आम जनता को है। लोग खुश हैं।
लेकिन जब इस मामले को गहराई से थोड़ा खंगाला जाए तो समझ आता है कि इस योजना की तस्वीर अभी काफी धुंधली है। और जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
अभाव में व्यवस्था
मोदी की 'स्वच्छ भारत' योजना के मुताबिक पहली से 8वीं तक के 11 लाख सरकारी स्कूलों को शामिल किया जा रहा है। लेकिन इनमें 3.2 लाख प्राइवेट स्कूल अब भी शामिल नहीं है। जबकि उनकी हालत भी लगभग उतनी ही खराब है जैसी सरकारी स्कूलों की। इसके अलावा ये योजना हाई स्कूलों को शामिल ही नहीं करती। इसका मतलब है कि उन स्कूलों को हाल जस के तस ही बने रहेंगे।
इसके अलावा दो ऐसे बड़े मुद्दे हैं जिनपर इस योजना में कोई चर्चा नहीं हुई है। पहला है पानी और दूसरा सफाई। सवाल यह है शौचायल बना देने के बाद भी यदि स्कूलों में पानी और सफाई के बारे में नहीं सोचा जाएगा तो किस आधार पर यह उम्मीद की जा रही है कि देश में प्राथमिक स्कूलों की हालत में सुधार आएगा।
डीआईएसई की 2013-2014 की रिपोर्ट के अनुसार इस वक्त भी तो देश में 1.9 लाख स्कूल ऐसे हैं जहां या तो लड़कियों के लिए शौचायल है नहीं या फिर वे काम ही नहीं करते हैं। देश के 17 प्रतिशत स्कूलों के शौचालय पानी और सफाई की कमी से इस हालत में हैं कि वहां शौचालय न होने जैसी ही स्थिति है।
लड़कियों के मामले में तो बात गंभीर और संवेदनशील है ही लेकिन अगर लड़कों से जुड़े आंकड़े देखें जाएं तो देश में 1.7 लाख स्कूलों में लड़कों के लिए भी शौचालय नहीं है। या फिर वे इस लायक ही नहीं है कि उन्हें इस्तेमाल किया जा सके।
सिर्फ आकंड़ो में सिमटी योजना
टीओआई में छपी इस खबर के अनुसार डीआईएसई के जिन आंकड़ों पर इस योजना को बनाया गया है वे धरातली सच्चाई से बेहद दूर हैं।
एएसईआर की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों के 14 हजार स्कूलों में किए गए सर्वे के बाद पता चला कि 47 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए इस्तेमाल करने लायक शौचालय नहीं हैं। ये सर्वे 550 जिलों में किया गया था। इस सर्वे में स्कूलों में जाकर यह देखा गया था कि वहां शौचालय बने हैं कि नहीं और वहां पानी की कैसी व्यववस्था है।
इसके अलावा एक अन्य एनजीओ CRY के किए गए सर्वे के आंकड़े तो और भी बुरे थे। ये सर्वे 747 स्कूलों में किया गया था जिसमें 71 जिले शामिल थे। इसके आंकड़ों के मुताबिक केवल 18 प्रतिशत स्कूलों में ही लड़कियों के लिए अलग शौचालय थे। इसके अलावा 34 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय थे भी तो उनकी स्थिति बेहद खराब थी।
इसके अलावा अलग-अलग सर्वे के मुताबिक मिडिल और हाई स्कूलों की हालत भी इतनी ही खराब है।
एनयूईपीए की प्रोफेसर विमला रामचंद्र के मुताबिक सिर्फ शौचालय बना देना ही काफी नहीं होगा। पानी और रखरखाव नहीं होगा तो यह सब किसी मतलब का नहीं होगा। कई स्कूलों की हालत ऐसी है कि यहां हैंडपंप स्कूल के बीचो-बीच के हिस्से में है। और शौचालय तक पानी किसी तरह लेकर जाना होता है।
इसके अलावा स्कूलों और शौचालयों में पानी को लेकर भी कोई डाटा नहीं है। 55 प्रतिशत प्राइमरी स्कूलों में शौचालयों में हाथ धोने की कोई व्यवस्था नहीं है।
इसलिए जब तक साफ सफाई और पानी की समस्याओं को लेकर जब तक कोई योजना नहीं बनती। तब तक सारी समस्या ऐसी ही बनी रहनी हैं।