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अजित डोभाल के नाम पाकिस्तान के पत्रकार का खत

Mon, 05 Jan 2015 08:55 AM IST
वुसतुल्लाह खान/बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
वुसतुल्लाह खान/बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान Updated Mon, 05 Jan 2015 08:55 AM IST
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a letter to NSA ajit dobhal from pakistan.

(वुसतुल्लाह खान का ब्लॉग)

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आज मेरे पास तो कहने को कुछ खास नहीं इसलिए एक मित्र का खत सुनाए देता हूं, जो उन्होंने मुझे ना जाने क्यों भेजा?

शायद बीबीसी में काम करने की सजा देने के लिए! तो लीजिए सुनिए...

आदरणीय अजित डोभाल जी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, भारत सरकार

नमस्कार

मैं आपके ब्लॉग और लेख बहुत ही शौक से पढ़ता हूं। मुझे चीन और अफगानिस्तान के संदर्भ में आपका विश्लेषण बहुत पसंद आया। कल फेसबुक पर एक वीडियो भी देखा जिसमें आप पाकिस्तान एवं भारत के संबंधों और चरमपंथ से निपटने के तरीकों पर लेक्चर दे रहे थे।

आपकी ये बात ठीक है कि हम विरोधियों से तीन तरीकों से निपटते हैं। पहला तरीका तो ये है कि हम किसी भी आक्रमण के खिलाफ अपनी रक्षा करते हैं।

दूसरा तरीका है आक्रामक सुरक्षा का है। हम दुश्मन के इलाके में जाकर पहल की सोचने वाले आक्रमणकारियों को निशाना बनाते हैं।

किराए के लोग हैं चरमपंथी!

a letter to NSA ajit dobhal from pakistan.

तीसरा तरीका ये है कि हम खुलकर जंग करते हैं। आपकी ये बात भी ठीक है कि जब दो देशों के पास परमाणु शक्ति हो तो खुली जंग नहीं हो सकती, मगर आक्रामक सुरक्षा का तरीका बरता जा सकता है।

यानी अगर भारत, पाकिस्तान की आर्थिक और आंतरिक सुरक्षा को निशाना बनाए, उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक्सपोज करे और ये जतला दे कि अगर तुम मुंबई करोगे तो हम बलूचिस्तान करेंगे तो शायद पाकिस्तान इतनी भारी कीमत के डर से अपनी हरकतों से बाज आ जाए।

आपने अपने लेक्चर में ये भी कहा है कि चरमपंथियों पर नियंत्रण करना मुश्किल नहीं। अगर कोई किसी चरमपंथी गुट को 1200 करोड़ रुपए दे रहा है और हम उन्हें 1800 करोड़ रुपए दे दें तो वही चरमपंथी हमारे लिए काम करेंगे क्योंकि चरमपंथियों का कोई नज़रिया नहीं होता, वो किराए के लोग हैं।

आदरणीय अजित डोभाल जी, पाकिस्तान में ऐसे बहुत से लोग सरकार में भी हैं और सरकार से बाहर भी जो बिल्कुल आप ही की तरह सोचते हैं। जैसे आप आंख के बदले आंख की बात करते हैं, वो भी यही करते हैं। किराए के चरमपंथियों की बात यहां भी होती है और आप भी कर रहे हैं।

इससे और भले कुछ हो न हो, चरमपंथियों का दोनों तरफ से भाड़ा बढ़ता रहेगा, तो फायदे में फिर कौन रहा?

मगर गुंडे जमा करने का काम कोई सड़कछाप पहलवान भी कर सकता है तो फिर उसमें और करोड़ों की रखवाली सरकारों में क्या फर्क हुआ?

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पाकिस्तान में अंधराष्ट्रवाद को बढ़ावा

a letter to NSA ajit dobhal from pakistan.

अगर सरकारें भी एक आम नागरिक की तरह जज़्बाती होकर कच्चे कानों से सोचें और अपनी सच्चाई खुद गढ़ने की आदी हों, और एक खास तरह का वैचारिक एजेंडा लेकर चल पड़ें, भले ही करोड़ों लोगों की ज‌िंदगियां बर्बाद हो जाएं, तो सोचिए क्या होगा...

आप लोगों को तो जनता इसलिए सम्मान देती है कि कोई ऐसा रास्ता निकालें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे!

क्या देश सिर्फ लाशों का पुल पारकर ही भविष्य में छलांग लगा सकते हैं? क्या एक-दूसरे को आंखे दिखाकर ही अपना आत्मविश्वास और कद बढ़ाया जा सकता है?

अगर यही एक तरीका है तो फिर आधुनिक राज्यों और सरकारों की क्या जरूरत है? क्या जंगल हम लोगों के रहने के लिए बुरा था?

आप की ओर से इस तरह की बातें, दरअसल पाकिस्तान में अंधराष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वालों के कानों के लिए रस हैं। लेकिन, अगर आप उनकी इसी तरह मदद करना चाहते हैं तो फिर ऐसे ही सही...

-आपका मुखलिस
इरफान कबीर

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