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'कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए बने कमेटी'

Sat, 20 Oct 2012 12:54 AM IST
नई दिल्ली/एजेंसी
नई दिल्ली/एजेंसी Updated Sat, 20 Oct 2012 12:54 AM IST
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a committee must be form to prevent sexual harassment at the workplace
सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में विशाखा मामले में दी गई व्यवस्था का दायरा बढ़ाते हुए बार काउसिंल ऑफ इंडिया (बीसीआई) और भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) जैसी सभी नियामक संस्थाओं को निर्देश दिया है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों से निपटने के लिए वह अपने यहां समितियां गठित करें।
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जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पीठ ने मेधा कोटवाल लेले की याचिका पर अपने फैसले में नियामक संस्थाओं और उनसे संबंध सभी संस्थानों को 1997 में विशाखा प्रकरण में जारी किए गए दिशा-निर्देश दो महीने के अंदर लागू करने का निर्देश दिया है। इस याचिका में विशाखा प्रकरण के दायरे में अन्य संस्थाओं को भी शामिल करने का अनुरोध किया गया था।
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शीर्षस्थ अदालत ने 1997 में निजी, सरकारी महकमों और सार्वजनिक उपक्र मों में महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं से निपटने के लिए दिशा निर्देश दिए थे। इन दिशा निर्देशों के अनुसार कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न की घटनाओं की रोकथाम करना और ऐसे विवादों के समाधान तथा कानूनी कार्यवाही के लिए सभी उचित कदम उठाना नियोक्ता का कर्तव्य होगा।
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दिशा-निर्देशों में यह भी कहा गया था कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के नियमों को अधिसूचित करने के साथ ही इनका प्रकाशन और वितरण भी किया जाना चाहिए। इसमें यौन उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ दंड का भी प्रावधान होना चाहिए। इस फैसले के तहत निजी नियोक्ताओं को भी अपने आदेशों में यौन उत्पीड़न के मामलों को निपटाने के लिए समिति गठित करने का निर्देश दिया गया था।


दिशा निर्देशों में ऐसे मामलों की जांच के लिए शिकायत समिति गठित करने की सिफारिश की गई थी। ऐसी समितियों का अध्यक्ष किसी महिला को बनाने और समिति में कम से कम आधी संख्या महिला सदस्यों की रखने की भी सिफारिश की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के 15 साल पुराने फैसले के आधार पर केंद्र सरकार ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को लेकर कानून बनाने की प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया है।
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