शिवसेना की स्वर्ण जयंती, पढ़िए सड़क से सत्ता तक का सफर
मराठी अस्मिता के नाम पर खड़ा हुआ संगठन शिवसेना ने अपने पचास वर्षों का सफर पूरा किया है। कार्टूनिस्ट से राजनीति में आए बाल ठाकरे के पहले विशुद्ध मराठी अस्मिता के स्वर छेड़कर और बाद में हिंदुत्व का पुरोधा बनकर इस संगठन की ताकत को बढ़ाया। बेशक शिवसेना का आधार महाराष्ट्र में सीमित रहा , लेकिन कुछ समान विचारों पर खड़ी भारतीय जनता पार्टी से समझौता कर राजनीतिक शक्ति को बढ़ाया।
19 जून 66 को स्थापित हुए शिवसेना ने 1989 में शिवसेना ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। लेकिन अब सत्ता और राजनीतिक प्रभुत्व पाने के लिए उसे कुछ और साल संघर्ष करना था। शिवसेना की यह अभिलाषा 1995 में पूरी हुई। 1995 में सत्ता में भाजपा के साथ भागेदारी की। लेकिन अगले चुनाव 1999 में यह गठबंधन पराजित हुआ तो फिर लंबे समय के लिए उसे अपने सहयोगी के साथ विपक्ष में बैठना पड़ा। कांग्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी , सपा, आरपीआई के साथ ऐसा ताना बाना बुना कि भाजपा और शिवसेना सत्ता के लिए तरस गए।
शिवसेना और भाजपा के अंदर बिखराव और कुछ गलत रणनीतियों के चलते भी कांग्रेस के लिए राह आसान होती रही। लेकिन 2014 में एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता दूसरी तरफ कांग्रेस, राकांपा शासन के भ्रष्टाचार, बिखराव ने मतदाता ने सत्ता परिवर्तन का मन बनाया। बेशक शिवसेना भाजपा ने चुनाव अलग अलग लड़ा। लेकिन कुछ टिप्पणी, कुछ व्यंग बाण कुछ उठापटक के बाद भाजपा शिवसेना को एक मंच पर आना ही था। वो आ भी गए। बस बड़ा फर्क यह रहा कि नेतृत्व शिवसेना नहीं भाजपा के हाथ में गया।
इस समय शिवसेना लोकसभा में 18 , राज्य सभा में 3 और विधान सभा मे 63 सदस्यों की उपस्थिति के साथ एक क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत बनी है। राज्य से बाहर न उसे जाना है न वह सोच रही है।
सामाजिक संगठन के रुप में सामने आया था शिवसेना
शिवसेना को एक मराठी अस्मिता और हिंदू आग्रह वाले दल के रूप में जाना गया है। पहले यह एक सामाजिक संगठन के रूप में सामने आया। बाद में राजनीतिक ताकत पाने के लिए यह संघठन सक्रिय राजनीति में उतरा। शिवसेना ने भाजपा के साथ अपने गठबंधन को बनाकर राजनीतिक शक्ति अर्जित की।
शिवसेना ने आक्रामकता पर यकीन किया। उनके नेताओं के विचार में जोश के साथ कई बार उग्रता देखी गई। इसके पीछे मराठी जनमानस को उद्वेलित करने की सोच थी। कार्टूनिस्ट से नेता बने बाल ठाकरे ने अपने खास तेवर जोशीले भाषणों, अपनी प्रभावी शाखाओं और सक्षम सगंठन खड़ा करके लोगों का विश्वास जीतने की कोशिश की। और वह शिवसेना के प्रभावी नेता के रूप में सामने आए।
पहले शिवसेना ने दक्षिण भारतीय लोगों के खिलाफ अभियान चलाया। बाद में उनके निशाने पर उत्तर भारतीय आए। जातीय और क्षेत्रीयता के साथ जुड़ा यह संघर्ष लंबा चला। उत्तर भारतीयों ने शिवसेना को पसंद नहीं किया। लेकिन हिंदुत्व अवधारणा पर कुछ उत्तर भारतीय इसके प्रति सहज भी रहे।
बाल ठाकरे के इशारे के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था
शिवसेना को लंबे समय तक अनुशासित दल के रूप में देखा गया। जहां बाल ठाकरे के इशारे पर ही पत्ता हिलता था। लेकिन नब्बे के दशक में जब शिवसेना को शासन करने का अवसर मिला तो मनोहर जोशी को नेता के रूप में आगे लाए जाने पर छगन भुजबल ने पार्टी से नाता तोड़ा।
आगे फिर कई नेता शिवसेना से अलग अलग संदर्भों में अलग होते रहे। नारायण राणे, संजय निरूपम जैसे नेताओं ने पार्टी छोड़ी। लेकिन एक वक्त वो भी आया जब राज ठाकरे ने भी अलग राह ले ली। आरोप यही था कि बाल ठाकरे पुत्र मोह में उद्धव ठाकरे को ही बढ़ावा दे रहे हैं।
राज ठाकरे ने महाराष्ट्र निर्माण सेना बनाई। हालांकि अभी भाजपा के साथ शिवसेना जुड़ी है। मनसे के खेमे में थोड़ी मायूसी है। लेकिन पिछले चुनाव में मनसे की वजह से शिवसेना के हाथों सत्ता आते आते रुकी थी। आगे दोनों में एक कशमकश है।
भाजपा के आगे कम हो चुका है शिवसेना का रसूख
शिवसेना का नेतृत्व उद्धव ठाकरे कर रहे हैं। लेकिन आज शिवसेना के पास प्रभावशाली नेताओं की कमी है शिवसेना के पास करिश्माई नेता नहीं है। उद्धव ठाकरे का बेटा राजनीति का ककहरा सीख रहा है। शिवसेना महाराष्ट्र में अपने संगठन आधार का फैलाव नहीं कर पा रही है। कांग्रेस राकांपा के जो गढ़ टूटे हैं, वहां पहल भाजपा की है। शिवसेना ने बेशक विधानसभा में 63 सीटें जीती हों। लेकिन उसे स्तर पर जूझना है। कोंकण मुंबई शिवसेना का प्रभावशाली क्षेत्र है। उसे मराठवाड़ा- विदर्भ में अपने आधार को बढ़ाना है।
शिवसेना के पास ठोस मुद्दे का अभाव है। उत्तर भारतीयों का विरोध मे अब वह एक सीमा तक आगे बढ़ती है। मराठी प्रभुत्व की बात कहने वाली अब केवल शिवसेना नहीं। भाजपा की सफलता ने उसकी इस धार को थोड़ा कुंद किया है।
शिवसेना की चिंता इस बात पर भी रहती है कि अलग विदर्भ की मांग न उठे। कोंकण में उसका आधार न खिसके। भाजपा शिवसेना के आंतरिक मतभेद नए नहीं हैं। बाल ठाकरे के समय से ही दरार पड़ गई थी। बस सियासी समीकरणों पर दोनों एक नाव पर हैं। शिवसेना की कोशिश यही है कि सत्ता में रहते हुए वह अपने परपरागत वोटों को विश्वास में ले।