गंगा को लेकर सामने आया चौंकाने वाला सच
जीवनदायिनी गंगा में मछलियों का तेजी से सफाया हो रहा है। अलग-अलग समय पर हुए शोध से यह सच सामने आया है। महज 12 वर्षों में गंगा में पाई जाने वाली मछलियों की 303 प्रजातियां खत्म हो चुकी हैं। हालांकि यही मछलियां गंगा में प्रदूषणों की सफाई में मददगार रही हैं।
वाराणसी के सहायक निदेशक(मत्स्य) मुकेश कुमार सारंग ने इसके लिए प्रदूषण और गंगा में हो रहे अंधाधुंध शिकार को कारण माना है। उनका कहना है कि जिला पंचायत ने एक-एक किलोमीटर के अंतराल पर गंगा में मछली मारने का ठेका दे दिया है।
ठेकेदार बड़ी मछलियों के साथ ही उनके अंडे-बच्चों को भी मार दे रहे हैं। इस पर रोक नहीं लगी तो सामान्य तौर पर पाई जाने वाली प्रजातियां भी खत्म हो जाएंगी।
जल प्रदूषण भी है जिम्मेदार
वर्ष 2003 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के मत्स्य वैज्ञानिक प्रो. गोपाल श्रीवास्तव ने यूपी से बिहार के बीच गुजरी गंगा की धारा पर अध्ययन में मछलियों की 365 प्रजातियों का पता लगाया था।
इसके बाद वर्ष 2009 में मत्स्य वैज्ञानिक बीएमएस श्रीवास्तव ने जब शोध किया तब गंगा के इसी क्षेत्र में मछलियों की सिर्फ 210 प्रजातियां ही रह गई थीं।
नेशनल ब्यूरो ऑफ फिश जेनेटिक रिसोर्सेज के संयुक्त निदेशक डॉ. डब्ल्यू एस लाकड़ा की 2012 की रिपोर्ट में चिंता जताई गई थी कि गंगा में औद्योगिक कारखानों के रसायनयुक्त पानी से प्रदूषण इस कदर फैल रहा है कि मछलियों की तादाद तेजी से घट रही है। तब उन्होंने गंगा में मछलियों की सिर्फ 198 प्रजातियों के बचे होने की पुष्टि की थी
12 साल में 303 प्रजातियां खत्म
अब स्थिति ज्यादा विकट हो गई है। प्रदूषकों को खाने वाली सुइस, मटकछुइया, सिंगी, देसी मांगुर समेत तीन सौ से अधिक प्रजातियों का अब पता नहीं चल रहा है।
दो साल से मत्स्य वर्गीकरण के लिए गंगा की मछलियों पर अध्ययन कर रहे राजघाट निवासी राजेश कुमार साहनी के आंकड़े ज्यादा चिंताजनक हैं। उनके मुताबिक अब 62 प्रजातियां ही गंगा में रह गई हैं।
12 साल में 303 प्रजातियां खत्म हो चुकी हैं। इनके अंडे मिलना भी अब चुनौती है। इसमें कुछ रंगीन मछलियां भी देखी गई हैं, जो इक्वेरियम में भी पाली जा सकती हैं लेकिन संरक्षण जरूरी है।
कमाई के लिए खत्म कर रहे मछलियों को
गंगा से मछलियों के गायब होने वाली प्रजातियों में पुलिया, पढ़िन, गोंच, बेलगगरा, पियासी, हिल्सा, बाचा, वैकरी और बुल्ला शामिल हैं। वर्ष दर वर्ष इन प्रजातियों के गायब होने की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है।
जहां 2003 में 365 प्रजातियां बची थीं वहीं 2009 में 210 बची हुईं थी। लेकिन आगे के आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं 2012 में केवल 198 मछलियों की प्रजाति गंगा में बची थी जो 2015में घटकर 62 ही रह गई है।
इस संबंध में सहायक निदेशक (मत्स्य) मुकेश कुमार सारंग, का कहना है कि गंगा में डेढ़ किलो वजन से कम की मछलियों को पकड़ने या मारने पर रोक है।
जिला पंचायतों के ठेकेदार कमाई के लिए गंगा की मछलियों का सफाया कर रहे
हैं। जून, जुलाई, अगस्त मछलियों के व्रीडिंग का समय है। ऐसे दौर में
मछलियों का शिकार कतई नहीं होना चाहिए।