सड़क हादसों से जीडीपी को 3 फीसदी का नुकसान
देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अभी जितना है, उसमें हर साल तीन फीसदी की और बढ़ोतरी होती, यदि हर साल यहां सड़क दुर्घटनाओं में इतने अधिक लोगों की जान नहीं जाती। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में वर्ष 2014 के दौरान 1.42 लाख लोगों की जान गई थी।
सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले सेव लाइफ फाउंडेशन द्वारा बृहस्पतिवार को यहां आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सेव लाइफ फाउंडेशन के सीईओ पीयूष तिवारी ने एक सरकारी आकलन के हवाले से बताया कि भारतीय सड़कों पर साल में जितने लोगों की मौत हो जाती है, यदि उसका आर्थिक नुकसान जोड़ा जाए तो यह सकल घरेलू उत्पाद के करीब तीन फीसदी के बराबर होगा।
उनका कहना है कि भारतीय सड़कों पर हर रोज करीब 400 लोग दुर्घटना और समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने की वजह से दम तोड़ देते हैं। इसका मतलब है कि यहां हर रोज बोइंग 747 किस्म का विमान क्रैश होता है। क्योंकि इस विमान में इतने ही यात्रियों के बैठने की क्षमता है।
सेव लाइफ फाउंडेशन का कहना है कि भारत में सड़क सुरक्षा को अभी भी हल्के में लिया जाता है। तभी तो वर्ष 2012-17 के लिए इस मद में महज 900 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। इसके मुकाबले देखें तो इसी अवधि के लिए टीबी से लड़ने के लिए 4,500 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है।
मलेरिया से लड़ने के लिए भी इस अवधि के लिए 4,000 करोड़ रुपये की व्यवस्था है जबकि एड्स रोग से लड़ने के लिए तो भारी भरकम 11,394 करोड़ रुपये की व्यवस्था है।
भारत में सड़क सुरक्षा
नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) के महानिरीक्षक आलोक मित्तल ने इस अवसर पर बताया कि सड़क सुरक्षा में सरकार की तो भूमिका बनती ही है, आम नागरिकों की भी भूमिका है। इसके लिए समाज के हर तबके में हर उम्र के लोगों को जागरूक किये जाने की आवश्यकता है।
साथ ही महानगरों, शहरों और ग्रामीण इलाकों में जो भी सड़कें बने, वह भारतीय सड़क कांग्रेस के दिशा निर्देशों के अनुरूप बने। अधिकतर दुर्घटना के मामलों में देखा गया है कि वहां सड़क का निर्माण मानक के अनुरूप नहीं था। वैसे भी सड़क हादसों में 60 से 70 फीसदी लोग पैदल यात्री, साइकिल चालक या दोपहिया वाहन पर सवार व्यक्ति जान गंवाते हैं।
उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि शहरों में सड़क तो चौड़े बनाये जा रहे हैं, लेकिन साइकिल ट्रैक या फुटपाथ गायब होते जा रहे हैं। कहीं फुटपाथ है भी तो वह अतिक्रमण का शिकार है।