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मंगल अभियानः वो 24 मिनट तय करेंगे सफलता

Tue, 23 Sep 2014 07:53 PM IST
Updated Tue, 23 Sep 2014 07:53 PM IST
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24 important minute of mars mission.

भारत के मंगल अभियान का निर्णायक चरण 24 सितंबर को सुबह यान को धीमा करने के साथ ही शुरू होगा। इस मिशन की सफलता उन 24 मिनटों पर निर्भर करेगी, जिस दौरान यान में मौजूद इंजिन को चालू किया जाएगा।

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इसमें इस बात की सावधानी रखनी होगी कि यान इतना धीमा न हो जाए कि मंगल की सतह से टकरा जाए और उसकी रफ़्तार इतनी भी तेज़ न हो कि वो मंगल के गुरुत्वाकर्षण से बाहर अंतरिक्ष में खो जाए।
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अगर यह अभियान पहले प्रयास में ही सफल रहता है तो भारत एशिया ही नहीं दुनिया का पहला ऐसा देश बन जाएगा जिसने एक ही प्रयास में अपना अभियान पूरा कर लिया था। चीन भले ही अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भारत से आगे रहा है लेकिन उसे भारत से बड़ी चुनौती मिलने वाली है।
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इस समय दुनिया भारत और चीन के बीच 21वीं सदी की अभूतपूर्व एशियाई अंतरिक्ष दौड़ की गवाह बन रही है। भारत लाल ग्रह पर चीन से पहले पहुंचने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चीन ने 2003 में ही अपने अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजकर भारत को पछाड़ दिया था।

एक सफलता चीन को पीछे छोड़ देगी

24 important minute of mars mission.

मंगल अभियान की सफलता अंतरिक्ष विज्ञान में चीन को पीछे छोड़ सकती है। पिछले हफ़्ते जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई दिल्ली में मिले तो बहुत ही सदभावपूर्व माहौल था।

लेकिन हिमालयी क्षेत्र में सीमा के मुद्दे पर गतिरोध बना रहा और अंतरिक्ष के मामले में भी दोनों ही देश अपनी श्रेष्ठता दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत का पहला मंगल अभियान, मंगलयान, इस समय अपने 300 दिन के मैराथन पर है, जिसमें उसे 67 करोड़ किलोमीटर की दूरी तय करनी है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 24 सितंबर की सुबह अपने इस अंतरिक्ष यान को धीमा करेगा ताकि यह मंगल की कक्षा में स्थापित हो सके।

इसरो के अध्यक्ष के राधाकृष्णन कहते हैं कि अगर यह सफल हुआ तो ''भारत ऐसा करना वाला भारत एशिया का पहला देश बन जाएगा और अगर यह पहले प्रयास में ही संभव हो पाया तो भारत अपने दम पर दूरस्थ मंगल ग्रह पर पहले ही प्रयास में पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बन जाएगा।''

चीन से आगे निकलने की बारी

24 important minute of mars mission.

रूस और अमेरिका भी अपने पहले प्रयास में यह कारनामा नहीं कर पाए थे। चीन का पहला मंगल अभियान, यंगहाउ-1, 2011 में असफल रहा। इसे रूस के प्रोबोस-ग्रंट अभियान के साथ छोड़ा गया था।

इससे पहले 1998 में जापान का मंगल अभियान ईंधन ख़त्म होने के कारण विफल रहा। इसमें दो राय नहीं है कि बहुत बाद में शुरू करने वाला भारत मंगल ग्रह पर पहुंचने के प्रयास में अपने एशियाई प्रतिद्वंद्वी से आगे है।

राधाकृष्णन कहते हैं, ''हम किसी से मुक़ाबला नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपनी क्षमता को उच्च स्तर पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।''

मंगल की ग्रह में चक्कर लाने वाला भारत का यह अभियान स्वदेश निर्मित एक रोबोटिक यान है जिसका वज़न 1350 किलोग्राम है। इसे बंगाल की खाड़ी में स्थित भारत के उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र श्रीहरिकोटा से पांच नवंबर 2013 को छोड़ा गया था।

इसरो के अनुसार, ''तब से लेकर यह अभियान उम्मीद के अनुरूप कार्य कर रहा है और सूर्य से आधी दूरी पर स्थित मंगल की ओर तेज़ गति से अग्रसर है।''

दिल धाम के रख देंगे वो 24 मिनट

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राधाकृष्णन कहते हैं, ''इस अभियान पर 450 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। अभी तक दुनिया के किसी भी अंतरग्रहीय अभियान के मुक़ाबले यह सबसे सस्ता है।''

30 जून 2014 को भारत के उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र के अपने दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ''हमारे मंगल अभियान की लागत हॉलीवुड फ़िल्म 'ग्रैविटी' से भी कम है। यह भारत के लिए एक उपलब्धि है।''

भारत का कम लागत और तेज़-मोड़ लेने में सक्षम यह उपग्रह अभियान, रहस्यमयी मंगल के बारे में और जानने के इच्छुक दुनियाभर के वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान खींच रहा है।

24 सितंबर की सुबह इसरो मंगलयान को फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश करेगा और इसे धीमा करने के लिए यान में मौजूद इंजन को 24 मिनट तक चलाएगा।

यह एक पेचीदा प्रक्रिया है क्योंकि अगर यह पर्याप्त धीमा नहीं हुआ तो मंगल के गुरुत्वाकर्षण की ज़द में नहीं आ पाएगा और अंतरिक्ष में खो जाएगा। लेकिन अगर इंजन ने ज़रूरत से ज़्यादा काम कर दिया तो यह मंगलयान को इतना धीमा कर देगा कि यह मंगल की सतह से टकरा कर नष्ट हो जाएगा।

वर्ष 1960 से लेकर अभी तक दुनिया भर में मंगल पर 51 अभियान भेजे गए और इनकी सफलता की दर 24 प्रतिशत रही है। इसलिए भारत के इस अभियान पर दवाब ज़्यादा है।

भौतिक विज्ञान के नियम भारत की मदद करेंगे

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भारतीय मंगल अभियान के प्रमुख एम अन्नादुरै का कहना है, ''हमें विश्वास है कि भौतिक विज्ञान के नियम भारत की मदद करेंगे और देश जल्द ही अपने पहले रोबोटिक मंगल अभियान में सफल होगा।''

इसरो इस मिशन को 'तकनीक का प्रदर्शन' मान रहा है जो दुनिया को दिखा रहा है कि अब यह देश 'सपेरों का देश' नहीं रहा बल्कि हाईटेक देश हो चुका है, जिसने तमाम प्रतिबंधों और विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी तकनीक ख़ुद विकसित की। अगर वाक़ई मंगलयान मंगल तक पहुंच गया तो मोदी के अमरीकी दौरे से पहले यह एक बड़ा वैश्विक भू राजनितिक संदेश होगा।

हालांकि छह महीने के अपने बहुत ही नगण्य कार्यकाल में यह मंगल के वातावरण का अध्ययन करेगा। यह मीथेन गैस का पता लगाएगा, रहस्य बने हुए ब्रह्मांड के उस सवाल का भी पता लगाएगा कि क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं?

अनुमान है कि कक्षा में स्थापित होने के कुछ ही घंटों में यान एक भारतीय आंख द्वारा मंगल ग्रह की ली गई तस्वीरें भेजना शुरू कर देगा।

इससे मंगल का पानी कैसे ख़त्म हो गया जैसे सभी महत्वपूर्ण सवालों को समझने में मदद मिलेगी, जो पृथ्वी पर इंसानों के लंबे समय तक अस्तित्व बने रहने के लिए ज़रूरी हैं। मंगल अभियान की रेस के ज़रिए देश ने कठिन अंतरग्रहीय यात्रा अभियानों को अपने हाथ में लेने की तकनीकी दक्षता दिखाई है।

इस तथ्य के बावजूद कि भारत के 40 करोड़ लोग अब भी बिना बिजली के रहते हैं और 60 करोड़ लोगों के पास शौचालय नहीं हैं। इस अंतरिक्ष दौड़ को लेकर बहुत सारे सवाल हैं और कहा जा रहा है कि सुपर पॉवर बनने की चाहत में भारत का यह 'भ्रमित सपना' है।

हालांकि, सही मायने में मंगलयान की कीमत चार रुपए प्रति भारतीय है, जो एक अरब 20 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए कोई बहुत बड़ी राशि नहीं है। लेकिन मंगल ग्रह पर पहुंचने के 300 दिन के अपने इस 'लॉन्ग मार्च' में, भारतीय हाथी निःसंदेह लाल ड्रैगन से आगे है। देश के लिए एक छोटी सी ख़ुशी है जो 21वीं सदी में सुपर पॉवर बनने के लिए प्रेरित करती है।

(पल्लव बागला और सुभद्रा मेनन 'रीचिंग फॉर दि स्टार्सः इंडियाज़ जर्नी टू मार्स एंड बीयोंड' पुस्तक के लेखक है।)

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