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खौफ की चादर हटी, मुस्कराई अयोध्या

Thu, 06 Dec 2012 01:22 AM IST
मनोज श्रीवास्तव
मनोज श्रीवास्तव Updated Thu, 06 Dec 2012 01:22 AM IST
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20th anniversary of babri mosque demolition

अयोध्या के मिश्रीलाल अग्रहरि ने अपनी बेटी की शादी का निमंत्रण पत्र बांटा तो तमाम रिश्तेदार चौंके। अग्रहरि की बेटी की शादी 6 दिसंबर को स्थानीय भगवताचार्य स्मारक सदन में है। पर मिश्रीलाल को भरोसा है कि सब शांति से निपट जाएगा।

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अयोध्या नगर पालिका के चेयरमैन राधेश्याम गुप्ता बताते हैं कि अग्रहरि अकेले नहीं हैं। 6 दिसंबर को अयोध्या में एक दर्जन से अधिक शादियां हैं। करीब पांच शादियों के निमंत्रण उन्हें खुद मिले हैं। यहां के लोगों को याद नहीं आ रहा है कि पिछले 20 साल के दौरान किसी ने यहां 6 दिसंबर के दिन शादी करने का फैसला किया हो।
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दरअसल यह शादियां अयोध्या की बदली फिजा का संकेत हैं। दहशत के कारण जिस दिन लोग अपनी खिड़कियां तक खोलना मुनासिब नहीं समझते थे, उस दिन शादियां रचा रहे हैं। बदली फिजा का असर यहां के स्थानीय तीज-त्योहारों से लेकर बाजार और बंदरों के जरिए भी ध्वनित हो रहा है।
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निर्मोही अखाड़े के पुजारी रामदास कहते हैं कि अयोध्या की हवा में आई बेखौफी का संकेत उन्हें तो पिछले पखवारे हुई चौदह कोसी परिक्रमा (21 नवंबर) के दौरान मिल गए थे। बकौल रामदास पिछले 20-22 साल की तुलना में इस परिक्रमा में न केवल भीड़ अप्रत्याशित तौर से बढ़ी बल्कि समय भी ज्यादा लगा।

20-22 घंटे में पूरी हो जाने वाली परिक्रमा इस बार करीब 30 घंटे चली। चैत्र में रामनवमी के आयोजनों में आई भीड़ ने भी चौंकाया था। सोशल एक्टिविस्ट गोपाल कृष्ण कहते हैं कि अजुध्या की हवा में बदलाव उन्होंने बंदरों के जरिए महसूस किया। बकौल गोपाल, अयोध्या में बंदरों की बहुतायत है।

उनका भोजन-पानी काफी कुछ दूर से आने वाले श्रद्धालुओं पर निर्भर करता है। पुण्य के लिए कोई उन्हें चने खिलाता है तो कोई केले। पिछले सालों में दिसंबर के महीने में शहर में श्रद्धालुओं की संख्या अचानक कम हो जाया करती थी। इसलिए भूखे बंदर कटखन्ने भी हो जाते और बस्तियों में हमले भी बोलने लगते। लेकिन इस बार ऐसा कुछ देखने को नहीं मिल रहा है।

6 दिसंबर 1992 की घटना के बाद अयोध्या में बंदी का माहौल रहता था। मुसलमान तो अपनी दुकानें एकदम नहीं खोलते। लेकिन यह सिलसिला भी अब बदलता नजर आ रहा है। हरद्वारी बाजार में ढोलक बेचने वाली जोहरा बेगम कहती हैं कि खास दबाव न पड़ा तो इस बार वह दुकान बंद नहीं करेंगी, ‘चाहे जौन होए।’

अयोध्या की संत परंपरा के मर्मज्ञ जय सिंह कहते हैं कि अयोध्या में रामानंदी वैष्णवों की परंपरा स्थापित है और इस परंपरा में कट्टरता या मजहबवाद को स्थान नहीं है। पिछले 20-22 साल से अयोध्या की जो तसवीर आम आदमी के जेहन में घूमी वह असल नहीं थी। वोट की तिजारत करने वालों ने एक अलग माहौल बना दिया था। पर अब केंचुल उतर गई, अयोध्या अब फिर अपने मूल स्वर में गुनगुनाएगी।

आम जनजीवन में भी बदले माहौल का असर साफ दिख रहा है। अयोध्या की सड़कों पर न तो हफ्ते भर पहले से सीआरपीएफ के जवानों के बूटों की ठकठक सुनाई पड़ रही है और न ही बाजारों के शटर निर्धारित समय से पहले गिर रहे हैं। 6 दिसंबर को स्कूल बंद करने की मुनादी भी नहीं हुई। किसी मोहल्ले से मंदिर वहीं बनाएंगे या यौमे शहादत को लेकर कोई उद्घोष भी नहीं सुनाई पड़ रहा है।


पौ फटने के साथ सरयू के घाटों पर बढ़ी हलचल भी बदली फिजा की पीठ ठोकती नजर आई। दशकों से घाट पर तख्त लगाकर पूजा पाठ कराने वाले पंडित माणिकनाथ तिवारी बताते हैं कि अयोध्या विवाद के चलते पिछले सालों में दिसंबर के पहले हफ्ते में पूजा-पाठ करवाने वाले दूरदराज के आम स्नानार्थी भी सरयू घाट आने से कतराते थे। लेकिन इस बार कार्तिक पूर्णिमा से स्नानार्थियों की जो भीड़ आनी शुरू हुई वह कम होने का नाम नहीं ले रही है। सरयू की लहरें भी शांत होकर बह रही हैं, जैसे कभी यहां कुछ हुआ ही न हो।

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