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ईयू ने मोदी को गले लगाया, बिफरी कांग्रेस

नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Sat, 09 Feb 2013 01:05 AM IST
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2002 riots were unfortunate modi tells eu envoys

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गुजरात दंगों के बाद से लगभग 11 साल तक मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से दूरी बनाए रखने वाले यूरोपीय संघ (ईयू) ने आखिरकार उन्हें अब गले लगा लिया है। 2014 के आम चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की दौड़ में शामिल मोदी का बायकॉट खत्म करने के फैसले को ईयू ने जायज भी ठहराया है।
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ईयू ने गुजरात चुनाव में मोदी की तीसरी जीत का जिक्र करते हुए कहा है कि वह लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए नेता हैं। लेकिन ईयू का यह कदम कांग्रेस को  रास नहीं आ रहा है। बौखलाई कांग्रेस ने कहा है कि क्या मोदी गुजरात दंगों की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं। कांग्रेस ने मोदी पर निजी हमला बोलते हुए उन्हें महिला विरोधी भी करार दिया।


भारत में ईयू के तमाम देशों के राजदूतों ने 7 जनवरी को मोदी को दिल्ली में लंच पर आमंत्रित किया था। यह लंच बैठक जर्मन राजदूत के चाणक्यपुरी स्थित आवास पर हुई थी। इसमें यूरोपीय यूनियन के राजदूत जोओ कारविन्हो भी मौजूद थे।

सूत्रों के अनुसार बैठक में मोदी ने ईयू के प्रतिनिधियों से कहा था कि वर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगे दुर्भाग्यपूर्ण थे। यूरोपीय संघ का संदेश साफ है कि गुजरात में लगातार तीसरी चुनावी जीत के साथ मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा में प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल उम्मीदवार आंके जा रहे मोदी की वह अनदेखी नहीं कर सकता।

ईयू ने कहा है कि अब वह रिश्तों के नए दौर की शुरुआत कर रहा है। ईयू के अहम सदस्य जर्मनी के भारत में राजदूत माइकल स्टेनर ने शुक्रवार को कहा कि मोदी का बायकॉट खत्म करने का फैसला जायज है। माना जा रहा है कि ईयू का यह रुख गुजरात दंगों को लेकर देश-दुनिया में गंभीर सवालों के कठघरे में रहे मोदी को राहत देगा। साथ ही इससे उनकी पीएम पद की उम्मीदवारी की वकालत कर रहे उनके समर्थकों का हौसला भी बढ़ेगा।

वहीं, कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने कहा कि मोदी महिला और गरीब विरोधी हैं। वह महिलाओं का सम्मान नहीं कर सकते। यूरोपीय यूनियन के मोदी को गले लगाने के बारे में पूछे गए सवाल पर रेणुका ने पलटकर सवाल किया कि क्या उन्हें अमेरिका से वीजा मिल गया है।

केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि यूरोपीय यूनियन ने मोदी से गुजरात दंगों की जिम्मेदारी लेने की बात कही थी। उन्होंने हैरानी जताई कि मोदी इन दंगों की जिम्मेदारी लेने को तैयार क्यों नहीं हैं, जबकि दंगे उन्हीं के शासन में हुए थे।

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