1965 में वीर अब्दुल हमीद ने कैसे उड़ाए पाकिस्तान के वो घातक टैंक
8 सितंबर, 1965 की सुबह असल उत्तर और चीमा के बीच कपास और गन्ने के खेत में लेटे हुए 4 ग्रेनेडियर्स के जवानों को आगे आते हुए पाकिस्तानी पैटन टैंकों की गड़गड़ाहट सुनाई दी।
सड़क से 30 मीटर दूर क्वार्टर मास्टर अब्दुल हमीद, कपास के पौधों के बीच एक जीप में अपनी रिकायलेस गन के साथ छिपे बैठे थे। जैसे ही पहला टैंक उनकी शूटिंग रेंज में आया, उन्होंने अपनी आरसीएल गन से फायर किया जिससे टैंक में आग लग गई।
उस समय सिर्फ 20 गज की दूरी से ये नजारा देख रहे कर्नल हरि राम जानू याद करते हैं, ''हमें यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ जब पीछे आ रहे टैंकों के ड्राइवर उन्हें बीच सड़क में ही छोड़ कर भाग गए।''
आरसीएल से ज्यादा से ज्यादा तीन फायर संभव
उस लड़ाई में भाग लेने वाले कर्नल रसूल खां कहते हैं, ''106 एमएम आरसीएल की रेंज 500-600 गज होती है। ये टैंक के खिलाफ बहुत प्रभावशाली हथियार है। लग जाए तो बचता नहीं है।
लेकिन इसकी खराब बात ये है कि फायर होते ही दूर से इसे पहचान लिया जाता है क्योंकि इसमें पीछे से शोला निकलता है। इससे सिर्फ़ एक-दो या ज्यादा से ज्यादा तीन फायर किए जा सकते हैं।''
लेकिन इसके बावजूद हमीद ने उसी दिन पाकिस्तान का दूसरा पैटन टैंक भी ध्वस्त किया। अगले दिन इंजीनयर कंपनी ने एंटी टैंक माइंस लगाई ही थीं कि पाकिस्तानी सेबर जेट्स ने भारतीय ठिकानों पर बमबारी शुरू कर दी।
सैनिकों ने तुरंत अपनी खंदकों में शरण ली। कैप्टेन सुरेंदर चौधरी याद करते हैं, ''मैं अपने ट्रेंच के बाहर जेरी कैन को तकिया बनाकर लेटा हुआ था कि मैंने अपने ठीक ऊपर से दो सेबर जेट्स गुज़रते हुए देखे।
मैं लुढ़ककर ट्रेंच में गिर गया। थोड़ी देर बाद जब मैं ऊपर आया, मैंने देखा कि मेरे जेरी कैन में गोलियों से चार छेद बन गए हैं। मैं बाल-बाल बचा था।''
हमीद ने पाकिस्तानी टैंक पास आने दिया
उस दिन ग्रेनेडियर्स पर पाकिस्तानियों ने टैंकों से तीन हमले किए। हमीद और हवलदार बीर सिंह ने दो-दो टैंक और नष्ट किए। कुछ टैंक एक दिन पहले लगाई गई एंटी टैंक माइंस के शिकार हुए। अगले दिन यानी 10 सितंबर को पाकिस्तानियों ने बहुत ही ज़बरदस्त गोलाबारी शुरू कर दी।
कर्नल जानू याद करते है, ''हम उम्मीद कर रहे थे कि अब इंफ़ैंट्री अटैक आएगा, लेकिन साढ़े आठ बजे तक कुछ नहीं हुआ। तभी हमें पाकिस्तानी टैंकों के आने की आवाज़ सुनाई दी।
हमीद की नज़र टैंक पर तब पड़ी जब वो उससे 180 मीटर दूर था। उसने टैंक को पास आने दिया और फिर उस पर सटीक निशाना लगाया। टैंक जलने लगा। हमीद तेज़ी से अपनी जीप को दूसरी तरफ़ ले गए ताकि दूसरे पाकिस्तानी टैंकों को उनकी लोकेशन का पता न चल पाए।''
पीछे से निशाना
कर्नल जानू कहते हैं, ''बाकी पाकिस्तानी टैंक आगे आ रहे थे। मैंने हमीद से कहा कि वो इन टैंकों पर फ़ायर न करे। जब ये टैंक हमारी पोज़ीशन के ऊपर से गुज़र गए तो हमीद ने उस पर पीछे से निशाना लगाकर उसे तबाह किया।
तीसरे टैंक पर वो अपना निशाना लगा ही रहे थे कि उसने उन्हें देख लिया। दोनों ने साथ-साथ ट्रिगर दबाया। दो गोले फटे। हमीद का गोला टैंक पर लगा और टैंक के गोले ने हमीद की जीप को उड़ा दिया।''
मोहम्मद नसीम उस समय हमीद के ड्राइवर थे। उन्हें वो दिन अभी भी याद है। वे कहते हैं, ''हमीद की उंगली ट्रिगर पर थी कि उधर से पाकिस्तानी टैंक का गोला आ गया।
वो सीधा हमीद के शरीर पर लगा और उनके जिस्म का ऊपरी हिस्सा कटकर दूर जा गिरा। मैं दौड़ता-दौड़ता कर्नल रसूल के पास गया। मैंने उनको बताया हमीद ख़त्म हो गए।
उन्हें मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ। मैंने सामने पड़े मलबे में हाथ डाला, तो मेरा हाथ हमीद की पसलियों में घुस गया। थोड़ी-थोड़ी दूर पर उनके शरीर के दूसरे अंग पड़े थे। हमने सबको इकट्ठा किया और वहीं गडढ़ा खोदकर उन्हें दफनाया।''
गोली चलाने को मना किया
लेकिन लड़ाई अभी खत्म नही हुई थी। पाकिस्तान की तरफ से तीन आरसीएल जीप आती हुई दिखाई दीं। लाइट मशीन गन पोस्ट पर खड़े शफीक, नौशाद और सुलेमान ने बिना फायरिंग आदेश का इंतजार किए उन पर फायरिंग कर दी। पहली जीप में सवार सभी पाकिस्तानी सैनिक मारे गए लेकिन तीसरी जीप तेज़ी से वापस मुड़ी और भागने में सफल रही।
लेफ्टिनेंट जानू इस फायरिंग से बहुत नाराज हुए। उन्होंने इन तीन सैनिकों के पास जाकर उन्हें ताकीद दी कि आइंदा से वो बिना आदेश गोली न चलाएं क्योंकि इससे पाकिस्तानियों को उनकी जगह का पता चल जाएगा।
पाकिस्तानी जनरल मारे गए
11 बजे पाकिस्तान के जनरल आफ़िसर कमांडिंग एक जीप पर आगे बढ़ते दिखाई दिए। उस जीप को उनके आर्टलेरी कमांडर चला रहे थे। अपने रेजिमेंटल कमांडर के टैंक (जिसे हमीद ने नष्ट किया था) को सड़क पर खड़े देख वो उसकी तरफ बढ़े।
जैसे ही वो नज़दीक आए ग्रेनेडियर सुलेमान अपनी ट्रेंच में खड़े हो गए। पाकिस्तानी जनरल ने अपनी जीप रोकी और सुलेमान को आवाज़ देकर अपने पास बुलाया। जब सुलेमान नहीं गए तो पाकिस्तानी जनरल अपनी जीप से उतरे और पैदल ही अपनी रिवाल्वर निकालते हुए इन सैनिकों की तरफ बढ़े।
इस बीच बाकी दो सैनिक शफीक और नौशाद भी अपनी बंदूकें तानते हुए खड़े हो गए। ख़तरे को देखते हुए कर्नल जानू चिल्लाए, ‘फायर।’ एक साथ कई गोलियाँ चलीं और पाकिस्तानी जनरल वहीं ढ़ेर हो गए।
आर्टलेरी के कमांडर ने जीप मोड़कर भागने की कोशिश की लेकिन उनके माथे में गोली लगी और वो स्टेयरिंग व्हील पर ही गिर गए। एक जीप वापस जाने में सफल रही।
लेकिन उसमें भी ड्राइवर को छोड़कर सभी लोग मारे गए। थोड़ी देर बाद उस जीप से एक संदेश भेजा गया, जिसे 4 ग्रेनेडियर्स के जवानों ने मॉनिटर किया- ‘बड़ा इमाम मारा गया।’
जनरल का शव ढ़ूंढ़ने की कोशिश
कर्नल जानू याद करते हैं, ''तीन बजे के आसपास पाकिस्तानी टैंकों की गड़गड़ाहट फिर सुनाई दी। मैंने गिना कुल आठ टैंक थे और हर एक टैंक पर 20-20 पाकिस्तानी जवान थे।
वो उतरकर खेतों में फैल गए। हम साफ सुन सकते थे। वो जोर जोर से चिल्ला रहे थे- जनरल साहब आप कहां हैं, हम आपको लेने आए हैं। उन्होंने चार पाकिस्तानी सैनिकों के शव उठाए और उन्हें अपने टैंकों पर रखा लिया।''
इस बीच कर्नल जानू ने पीछे एक संदेश भेजकर रेड ओवर रेड फायरिंग का अनुरोध किया। कर्नल जानू बताते हैं, ''रेड ओवर रेड फ़ायरिंग का मतलब है अपने सैनिकों से अपने ऊपर ही पीछे से फायरिंग करवाना।
ऐसा तब किया जाता है जब दुश्मन बिल्कुल पास आ जाता है और हमारे बचने की बहुत कम उम्मीद होती है। जैसे ही हमारे सैनिकों का फायर हमारे ऊपर आया, पाकिस्तानियों ने वहां से भागना शुरू कर दिया। इस चक्कर में उनके दो और टैंक बरबाद हुए।''
पाक जनरल की विधवा शव मांगने आईं
जब लड़ाई ख़त्म हो गई तो 4 ग्रेनेडियर्स के सैनिक चीमा गाँव पर ही रूके रहे। एक दिन भारतीय सैनिकों को सफेद झंडा लिए कुछ पाकिस्तानी सैनिक आगे आते दिखाई दिए। उनके साथ सफेद कपड़े पहने एक महिला भी आ रही थी। उन्होंने कहा कि ये महिला भारतीय सैनिकों से मिलना चाहती है।
रचना बिष्ट अपनी किताब '1965- स्टोरीज फ़्राम द सेकेंड इंडोपाक वार' में लिखती है, ''उस महिला ने आँसू भरी आँखों से कहा कि वो उस आर्टलरी कमांडर की विधवा है जो भारत के साथ असल उत्तर की लड़ाई में मारे गए थे।
उन्होंने कहा कि बहुत मेहरबानी होगी अगर मेरे पति का शव मुझे वापस कर दिया जाए। भारतीय कमांडर ने कहा कि उनके उनके पति की मौत पर बहुत अफ़सोस है।
वो बहुत बहादुर सैनिक थे लेकिन शव उन्हें नहीं सौंप सकते क्योंकि उन्हें पूरे सैनिक सम्मान के साथ दफ़नाया जा चुका है। भारतीय कमांडर ने उस महिला को चाय पिलाई और सम्मानपूर्वक उन्हें विदा किया।''
नहर का किनारा काटा
इसी लड़ाई के दौरान भारतीय सैनिकों ने पास की एक नहर का किनारा काट दिया जिससे पूरे इलाके में पानी भर गया। इसकी वजह से बचेखुचे पाकिस्तानी टैंक भी वहीं फंसकर रह गए।
पाकिस्तानी टैंकों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि कर्नल सालेब ने ब्रिगेड कमांडर से अनुरोध किया कि पैटन टैंकों पर पेंट से गिनती लिखी जाए ताकि उन्हें गिनने में आसानी हो।
'वार इज ओवर'
उसी समय पाकिस्तान में अयूब ख़ाँ अपने सूचना सचिव अल्ताफ़ गौहर को खेमकरण सेक्टर में बढ़ती पाकिस्तानी सेना के मूव समझा रहे थे कि उनके सैनिक सचिव जनरल रफ़ी बदहवास हालत में कमरे में घुसे और लगभग चिल्लाते हुए बोले- भारतियों ने मधुपुर नहर को खोल दिया है।
अल्ताफ़ गौहर ने अयूब पर लिखी किताब में लिखा है, ''अयूब सारी ब्रीफ़िंग भूल गए। वो जानना चाहते थे कि पूरे इलाके को जलमग्न होने में कितना समय लगेगा।
मैंने गुलाम इसहाक खां को जो उस समय जल और ऊर्जा विकास प्राधिकरण के प्रमुख थे, फ़ोन मिलाया। उन्होंने पुराने सिंचाई रिकार्ड्स के आधार पर हिसाब लगाया कि पूरे इलाके में आठ घंटे में पानी भर जाएगा।
अयूब ये जानकर भौंचक्के रह गए कि जनरल नासिर ने ये सोचा ही नहीं था कि भारत टैंकों को रोकने के लिए इस तरकीब का भी सहारा ले सकता है।''
खेमकरण में पाकिस्तानी हमला 11 सितंबर को रोक दिया गया और इसी के साथ पाकिस्तान की सारी रणनीति नाकाम हो गई। पाकिस्तान के लिए ये एक तरह से युद्ध का अंत था।
भिकीविंड पैटन नगर बना
कर्नल जानू कहते हैं, ''युद्ध विराम के बाद हमारी यूनिट से कहा गया कि इन टैंकों को एक जगह इकट्ठा किया जाए। हम इन्हें टो कर भिकीविंड ले गए।
बाद में इस जगह का नाम पैटन नगर पड़ा। ये पैटन टैंकों की दुनिया में सबसे बड़ी कब्रगाह थी।'' कर्नल रसूल खां कहते हैं, ''हमने कुल 94 टैंक तबाह किए। आप हर सैनिक छावनी के मुख्य द्वार पर जो पैंटन टैंक खड़े देखते हैं, वो 4 ग्रेनेडियर्स का तोहफा है देश के लिए।''
हमीद ने सात टैंक तोड़े थे
अब्दुल हमीद को असाधारण वीरता दिखाने के लिए भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र दिया गया। उनकी पत्नी रसूलन बीबी इस समय 86 साल की हैं।वो अब ठीक से सुन नही सकतीं। उन्होंने कहा, ''दुख बहुत भयल लेकिन हम इतना सोच लीन्ही, हमार आदमी चली गएनी पर कितना नाम कर दीन्ही।''
अब्दुल हमीद के परमवीर चक्र साइटेशन में चार टैंक तोड़ने का उल्लेख किया गया है लेकिन उनके कंपनी कमांडर कर्नल जानू कहते हैं कि हमीद ने वास्तव में सात टैंक तोड़े थे।
परमवीर चक्र के लिए उनकी सिफारिश 9 सितंबर को ही चली गई थी, इसलिए उसमें 10 सितंबर को तोड़े गए तीन और टैंकों का जिक्र नहीं है।