मोदी के 14 हथियार, जिनसे बने 'महानायक'
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चुनावों में अप्रत्याशित जीत के बाद मोदी के संदर्भ एक बात तो निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि वे बहुत दृढ़ निश्चयी हैं। पीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने से लेकर चुनाव जीतने तक मोदी को काफी आलोचनाएं सहनी पड़ी।
दंगों के दाग हों या पत्नी का मामला, मोदी को हर तरह से घेरा गया लेकिन मोदी जिस लक्ष्य को लेकर चले, उसे पाकर ही दम लिया। उन्होंने जब 'लक्ष्य 272' बनाया तो भाजपा तक को उम्मीद नहीं थी कि मोदी ये कर पाएंगे। 'लक्ष्य 272' का खूब मखौल उड़ा लेकिन मोदी पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।
आलोचनाओं की आंधी में मोदी जी जान से अपने लक्ष्य को पूरा करने में जुटे। एक तरफ जब चुनावी विश्लेक्षक और खुद पार्टी के सदस्य ये मान रहे थे कि गुजरात दंगों के दाग के चलते मोदी भाजपा को बुरी तरह पराजित कराएंगे, मोदी चुनाव प्रचार में लगे रहे।
प्रभावशाली वक्ता मोदी
इसमें कोई दो राय नहीं कि इस समय तमाम नेताओं में मोदी एक प्रभावशाली वक्ता है। मोदी की खासियत यही है कि वो लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते। विश्लेक्षकों को मोदी के भाषण देने के अंदाज में भले ही हिटलर की झलक दिखती हो लेकिन आम जनता के बीच मोदी इसी तरह की भावभंगिमा और जोशीले भाषण के लिए लोकप्रिय हुए हैं।
अपने भाषणों में चाय वाला, छप्पन इंच का सीना, नीच राजनीति, टॉफी मॉडल, वंशवाद, जीजाजी जैसे जुमले लाकर मोदी जनता के बीच खूब लोकप्रिय हुए।
मौके का प्रयोग
मौके पर चौका कैसे लगाते हैं, मोदी से सीखिए। मोदी ने चुनाव मैदान में अपने खिलाफ हुई हर बयानबाजी को हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी को चायवाला कहा तो मोदी ने देश भर में चाय की स्टॉल लगवा दी। देश भर में नमो चाय बंटने लगी और वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मोदी चाय पर चुनावी चर्चा तक करने लगे।
प्रियंका गांधी ने मोदी को नीच राजनीति करने वाला कहा तो मोदी ने बिना देर किए उसे अपनी जाति से जोड़कर भावुक बयान दे डाले।
इससे सबसे ज्यादा नुकसान बसपा को हुआ और मायावती को यहां तक कहना पड़ा की मोदी नीची जात से नहीं आते, अगर आते हैं तो प्रमाण पत्र दिखाएं।
बेहतरीन मैनेजमेंट और सहयोगी
एक बेहतरीन मैनेजमेंट मोदी की बड़ी खासियत है। इसी के बल पर मोदी भाजपा को ये विश्वास दिला पाए कि उनसे अच्छा प्रधानमंत्री पद का दावेदार कोई नहीं हो सकता।
दरअसल मोदी ने अपने दमदार सहयोगियों पर विश्वास किया और अपनी टीम मैनेजमेंट के जरिए जिस तरह की रूपरेखा बनाई, उससे भाजपा को बेहतरीन नतीजे प्राप्त हुए। इसी मैनेजमेंट टीम के जरिए मोदी ने तमाम देश में अपना प्रचार और प्रसार किया।
मोदी की टीम ने गुजरात से उद्योगपतियों कलाकारों को देश भर में भाजपा के प्रचार के लिए भेजा। बनारस में पहुंचे गुजरात के हीरा व्यापारियों ने मोदी की जीत के लिए काफी मेहनत की जो सफल साबित हुई।
नेतृत्व क्षमता
इस मामले में मोदी का कोई सानी नहीं गुजरात में तीन बार चुनाव जीतना इसी का प्रमाण है। मोदी गुजरात की विधानसभा से लेकर पूरी भाजपा में इस कदर छा गए कि विरोधी तक उनकी तारीफ करने लगे।
ये उनकी नेतृत्व क्षमता का ही प्रमाण है कि देश भर से भाजपा प्रत्याशियों ने मोदी के नाम पर ही जनता से वोट मांगा। जनता ने भी गुजरात में मोदी के सफल नेतृत्व को देखते हुए भाजपा के ज्यादातर प्रत्याशी, चाहें वो बाहरी हो या कमजोर, सभी को वोट दिया।
सोशल मीडिया
सच कहें तो मोदी ने सोशल मीडिया की अहमियत को पहचानते हुए चुनाव जीतने में इसका भरपूर प्रयोग किया। शायद पहली बार सोशल मीडिया पर किसी एक शख्सियत की इतनी लहर फैली कि चुनाव आयोग को भी सोशल मीडिया संबंधित निर्देश जारी करने पड़े।
मोदी ने बाकायदा सोशल मीडिया पर प्रचार के लिए बेहतरीन आईटी इंजीनियरों की एक टीम बनाई। उसी का नतीजा है कि फेसबुक और ट्विटर मोदीमय हो गए।
भुनाई दबंग छवि
16 मई को नतीजे आते ही कई इलाकों में मोदी को दबंग की तरह दिखाया गया। मोदी वाकई दबंग की छवि प्रस्तुत करते हैं। आधी आस्तीन के कुर्ते पहन कर जब मोदी विरोधियों को ललकारते हैं तो जनता को एक दबंग जननायक की छवि याद आती है।
जनता की मानसिकता में छिपे बैठे दबंग नायक की आस को मोदी ने जमकर भुनाया। कोई मोदी को दबंग मानता है तो कोई सिंघम। अपने भाषणों में पाकिस्तान को जमकर लताड़ने वाले मोदी एक तरफ देश की रक्षा की बात करते देखे गए तो दूसरी तरफ गरीबों के मसीहा के रूप में छा गए।
ऊर्जावान नेता और छप्पन इंच का सीना
मोदी ने अपनी सेहत और ऊर्जा का सही उपयोग करते हुए लोकसभा चुनावों में रिकार्डतोड़ प्रचार किया। 63 साल के होने के बावजूद मोदी ने प्रतिदिन कई हजार किलोमीटर के चुनाव प्रचार बिना थके किया।
ये निरोगी काया और शारीरिक ऊर्जा थी जिसके बल पर 63 साल की उम्र में मोदी देश भर में करीब छह हजार रैलियां कर पाएं। उन्होंने बिना रुके और थके देश भर में तीन लाख किलोमीटर का सफर किया। विरोधी तक मोदी की ऊर्जा का लोहा मानते हैं।
सेलेब्रिटी का साथ
मोदी ने समाज में सेलेब्रिटी की अहमियत को पहचाना और उसका बखूबी इस्तेमाल किया। सुपर स्टार रजनीकांत के घर जाकर उनसे मिलना और रजनीकांत का मोदी को अच्छा व्यक्ति कहना, रजनीकांत के फैन को मोदी के समर्थन में ले आया। कहा तो यहां तक जा रहा है कि दक्षिण में भाजपा को कुछ एक सीटें भी मोदी और रजनीकांत की दोस्ती के कारण मिली हैं।
दूसरी तरफ फिल्म स्टार सलमान खान हों या उनके पिता सलीम खान, सब मोदी रंग में रंगे देखे गए। प्रख्यात लेकर चेतन भगत अनुपम खेर और कई अन्य फिल्मी हस्तियां इस दौरान मोदी के गुण गाती नजर आई।
स्पष्ट और कठोर प्रशासन
जानने वाले कहते हैं कि मोदी कठोर प्रशासक रहे हैं। गुजरात सरकार में मोदी का सिक्का चलता रहा। गुजरात में मोदी के रहते किसी भी स्थानीय स्तर के नेता को उभरने का मौका नहीं मिला। यहां तक भाजपा में राष्ट्रीय स्तर के नेता भी मोदी को कठोर फैसले लेने वाला प्रशासक मानते हैं।
अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि टिकट बंटवारे पर भी मोदी ने उन्हीं लोगों पर दांव बनाया, जिन पर मोदी को विश्वास था।
भाजपा में मोदी के आने के बाद वरिष्ठ नेताओं को जिस तरह हाशिए पर भेजा गया, सभी ने देखा है। मोदी ने युवाओँ पर भरोसा करते हुए मौके दिए और इस फैसले के लिए मोदी ने कई स्तर पर विरोध भी झेला लेकिन मोदी टस से मस नहीं हुए।
गुजरात का विकास मॉडल
मोदी ने लोकसभा का रण जीतने के लिए गुजरात के विकास मॉडल का बखूबी इस्तेमाल किया। गुजरात के विकास की बातों से मोदी ने जनता को भरोसा दिलाया कि देश गुजरात जैसा हो सकता है। अपने हर भाषण में गुजरात की खूबियां दिखाकर मोदी ने जनता को खुशहाल देश की वो तस्वीर दिखाई जो जनता देखना चाह रही थी।
मोदी ने दूध, व्यापार, साबरमती, सड़कें, निर्बाध बिजली और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गुजरात के विकास मॉडल का भरपूर प्रयोग किया। मोदी ने भूकंप के बाद उठ खड़े हुए कच्छ के विकास का ब्यौरा देते हुए आपदा प्रबंधन की जीती जागती मिसाल जनता के सामने पेश की।
उद्योगपतियों के फेवरेट मोदी
मोदी आरंभ से ही उद्योगपतियों के फेवरेट रहे हैं। पश्चिम बंगाल में जब ममता बनर्जी ने टाटा नैनो को जमीन नहीं दी तो मोदी ने रतन टाटा को गुजरात आमंत्रण दिया। अंबानी हो या टाटा बिड़ला, सभी मोदी के प्रशंसक हैं।
उद्योगों के लिए गुजरात में जमीन और अन्य संसाधन देकर मोदी उद्योगपतियों के चहेते बन चुके हैं। अडानी और अंबानी मोदी के गुण गाते हैं।
गुजरात में विकास की कहानी के पीछे विदेश निवेश का भी अच्छा खासा योगदान है। यहां तक कि मोदी के आने की खबर से ही शेयर बाजार में उत्साह दौड़ गया और बाजार ने ऊंची छलांग लगा दी।
भ्रष्टाचार के आरोप नहीं
मोदी पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं चल रहा है। हालांकि दंगों के दाग जब तब मोदी को परेशान करते रहे हैं लेकिन गुजरात में तीन कार्यकाल में मोदी एक बेदाग प्रशासक के तौर पर लोकप्रिय रहे हैं।
कांग्रेस ने जब भी मोदी पर अपने करीबियों को लाभ देने के आरोप लगाए, मोदी ने कच्चा चिट्ठा देते हुए कांग्रेस के आरोप नकार दिए। अडानी से मोदी की करीबियत का हवाला देने पर मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि उनके काल में नहीं बल्कि कांग्रेस के काल में गुजरात में जमीन कौड़ियों के दाम दी गई।
जानते हैं चुप रहना
मोदी सिर्फ गरजना ही नहीं चुप रहना भी जानते हैं। दंगों के मामले में पत्रकारों के सवाल हों या पत्नी के मसले पर विरोधी दलों के आरोप, मोदी अपेक्षाकृत शांत रहते आए हैं। मोदी बखूबी जानते हैं कि किस मौके पर बोलना चाहिए और किस मौके पर चुप रहना चाहिए।
वडोदरा में जब मोदी ने नामांकन भरते वक्त पत्नी के कॉलम में जशोदाबेन के नाम लिखा तो उन पर आरोपों की बौछार हो गई। लेकिन मोदी शांत रहकर चुनाव प्रचार करते रहे। उन्होंने पत्नी के आरोपों पर सफाई भी देनी मुनासिब नहीं समझी।
इसी तरह जब दंगों के मामले में मोदी पर आरोप लगाए गए तो मोदी अक्सर शांत देखे गए। हालांकि पत्रकारों से बातचीत के दौरान मोदी ने काफी संभलकर इस संवेदनशील मसले पर अपना पक्ष रहा लेकिन ज्यादातर वो इससे बचते नजर आए।
इसे मोदी की समझदारी ही कहेंगे कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के एक पत्रकार से संबंधों का मामला जब खुला तो मोदी ने शालीनता दिखाते हुए कोई बयानबाजी नहीं की जबकि दिग्गी मोदी की पत्नी के मामले पर हमेशा कटाक्ष करते आए हैं।