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100 दिन: इन मुद्दों पर मोदी क्यों बन गए 'मौन-मोहन'?

Thu, 04 Sep 2014 08:12 AM IST
Updated Thu, 04 Sep 2014 08:12 AM IST
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100 days :why modi make himself maun mohan
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर बीजेपी हमेशा हमलावर रहती थी, तेवर हमेशा तीखे रहते थे और निशाने पर रहती थी मनमोहन सिंह की चुप्पी। जनता भी शायद मानने लगी थी कि अब देश को 'ताकतवर' पीएम की ज़रूरत है और ऐसे में बीजेपी की ओर से सामने आए मोदी।
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मोदी के आते ही माहौल मोदीमय हो गया और जनता को भी लगने लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा। 'अच्छे दिनों' का वायदा कर बीजेपी सत्ता में आ गई और मोदी को मिल गई पीएम की गद्दी।
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लेकिन गद्दी पर बैठते ही मोदी भी खामोश हो गए, जिन मुद्दों पर वो मनमोहन सिंह को घेरा करते थे उन्हीं मुद्दों पर खुद भी घिर गए। आइए नज़र डालते हैं ऐसे ही कुछ मुद्दों पर जिनमें देश को उनसे उम्मीद थी कि वो बोलेंगे लेकिन वो नहीं बोले।
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बलात्कार के मुद्दे पर चुप क्यों रहे मोदी

100 days :why modi make himself maun mohan
बहुत वक्त नहीं हुआ जब देश ने वो निर्भया कांड और उससे उपजे गुस्से को देखा था। देश में यूपीए की सरकार थी और जनाक्रोश सरकार के खिलाफ। लोग सड़कों पर थे, इंसाफ मांग रहे थे लेकिन उन्हें मिलीं लाठियां और तेज पानी की बौछारें।

किसी के हाथ में मोमबत्ती थी तो किसी की आंख में आंसू लेकिन आग हर दिल में थी। ये वो आग थी जिसकी तपिश सिंहासन पर बैठने वालों को भी महसूस हुई। मोदी और बीजेपी ने बाकी नेताओं ने सरकार को इस मुद्दे पर घेरा, मनमोहन सिंह की चुप्पी पर सवाल खड़े किए और फिर सत्तापरिवर्तन हुआ, महिलाओं की सुरक्षा का वायदा कर बीजेपी ने सरकार बना ली।

देश को उम्मीद थी कि अब पीएम खामोश नहीं रहेगा, लेकिन जल्दी ही देश की ये उम्मीद टूट गई। यूपी के बदायूं में गैंगरेप हुआ, दलित लड़कियों को पेड़ से लटका दिया गया, जनता एक बार फिर गुस्से में थी लेकिन पीएम मोदी खामोश थे।

लखनऊ के मोहनलालगंज में रेप की वारदात सामने आई लेकिन मोदी ने खामोशी का लबादा नहीं उतारा। यूपी समेत पूरे भारत में एक के बाद रेप होते रहे लेकिन मोदी कुछ नहीं बोले।

उनकी खामोशी पर सवाल खड़े होते हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यूपी से 73 सीटें मिलीं लेकिन बीजेपी ने कानून व्यवस्था के मुद्दे पर यूपी सरकार को घेरने के अलावा कुछ नहीं किया।

जवानों की मौत पर भी चुप रहे मोदी

100 days :why modi make himself maun mohan

हेमराज का नाम जनता को याद होगा। भारतीय सेना का जवान जिसका सिर पाकिस्तानी फौजी काट के साथ ले गए। इस घटना के बाद देश में भयंकर आक्रोश पैदा हुआ। लोगों को सरकार निकम्मी लगने लगी और जनता 'ताकतवर पीएम' ढूंढने लगी।

जनता की तलाश मोदी पर जाकर खत्म हो गई, वो पीएम बन गए। लोगों को लगने लगा कि अब पीएम सीमा पर जाकर जवानों का हाल लेंगे, शहीदों के घर जाकर सांत्वना देंगे और अब किसी हेमराज का सिर काटने की हिम्मत पाकिस्तान जुटा नहीं पाएगा।

लेकिन जनता को निराशा हुई जब मोदी जवानों की शहादत पर चुप रहे, जनता को अचरज हुआ था जब मोदी ने नवाज शरीफ को शपथ ग्रहण समारोह पर बुलाया था लेकिन जनता को दुख तब हुआ जब मोदी शहीदों के लिए दो लाइन ना बोले।

पाकिस्तान की हर गोली पर ट्वीट करके यूपीए सरकार को घेरने वाले मोदी खामोश रहे जब बुलंदशहर के दो जवान सीमा पर शहीद हो गए, वो खामोश रहे जब पाकिस्तान गोलियां बरसा रहा था, और वो खामोश रहे जब पाक सेना आतंकियों को कवर दे रही थी।

सांप्रदायिक हिंसा पर भी चुप रहे नरेंद्र मोदी

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पिछले दिनों देश के कई हिस्सों को सांप्रदायिकता का दंश झेलना पड़ा, कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और कई बार भारत की गंगा-जमुनी तहजीब संकट में दिखाई दी।

उम्मीद थी कि मोदी कुछ बोलेंगे, हिंसा को शांत करने के लिए कोई ठोस कदम उठाएंगे लेकिन हैरानी हुई जब उन्होंने इस पर ट्वीट करना भी उचित नहीं समझा। मोदी खामोश रहे जबकि उन्होंने मुजफ्फरनगर दंगों पर कांग्रेस और यूपीए सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ा था।

पुणे में मुस्लिम इंजीनियर की हत्या का मामला हो या फिर यूपी की सांप्रदायिक हिंसा, पीएम खामोश रहे। उनकी पार्टी स्थानीय सरकारों पर उंगली उठाती रही, धरने प्रदर्शन करती रही लेकिन मोदी खामोश रहे।

'लव जेहाद' भी सामने आ चुका है और शंकराचार्य के बयान भी, ऐसे में सवाल बीजेपी पर भी हैं। क्या सांप्रदायिकता का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए क्या जा रहा है? क्या मोदी को ये सब पता है? और सवाल ये भी कि मोदी खामोश क्यों है?

सी सैट विवाद पर भी मोदी कुछ नहीं बोले

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देश का वो युवा सड़कों पर था जो देश की जिम्मेदारी लेना चाहता है, वो युवा देश जिसकी बातें करके मोदी सत्ता में आए वो सड़कों पर था लेकिन मोदी खामोश थे। सिविल सर्विसेज़ की परीक्षा में सीसैट को लागू किया गया, इससे हिंदीभाषी छात्रों का गुस्सा आंदोलन के रूप में फूट पड़ा।

देश भर में एक बहस छिड़ गई, टीवी चैनलों पर चर्चाएं होने लगीं, अखबारों में संपादकीय छपने लगे, विरोधी दल सरकार पर निशाना साधने लगे लेकिन मोदी जी ने खामोशी तोड़ना उचित नहीं समझा।

मोदी अगर एक बार आंदोलनकारी छात्रों से मिल लेते, उनकी मुश्किलें सुन लेते तो शायद विवाद उतना ना बढ़ता लेकिन उन्होंने अपने पूर्ववर्ती पीएम की राह पर चलते हुए कुछ ना बोलने की नीति को ही अपनाए रखा।

हूटिंग विवाद पर भी खामोश रहे मोदी

100 days :why modi make himself maun mohan

मोदी के मंच पर गैर भाजपाई सरकारों और उनके सीएम की मोदी समर्थकों द्वारा हूटिंग की गई लेकिन मोदी खामोश रहे। अगर ऐसा मनमोहन सिंह सरकार के दौरान होता तो क्या मोदी यूं ही खामोश रहते?

मोदी वहां-वहां गए जहां आने वाले वक्त में चुनाव होने हैं, वहां के सीएम के साथ उन्होंने मंच साझा किया लेकिन उनके समर्थकों ने स्थानीय सीएम को विरोध में नारे लगाए। अगर ऐसा मनमोहन सिंह सरकार के दौरान होता तो क्या मोदी ने इसे संघीय ढांचे पर प्रहार ना करार दे दिया होता?

हरियाणा के सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा की हूटिंग हुई, झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन की हूटिंग हुई और इससे सचेत महाराष्ट्र ने सीएम पृथ्वीराज चव्हाण ने मोदी के साथ मंच साझा करने से तौबा कर ली।

इस ऐसा क्यों ना समझा जाए कि ये बीजेपी द्वारा आने वाले चुनावों की रिहर्सल है? और यदि ऐसा नहीं है तो मोदी ने समर्थकों से खामोश रहने की अपील क्यों नहीं की? आखिर इस मुद्दे पर खामोश क्यों रहे मोदी?

विवादों में मोदी के मंत्री लेकिन मोदी खामोश

100 days :why modi make himself maun mohan
मोदी सरकार में राजस्थान से एकमात्र मंत्री निहालचंद पर रेप और यौन शोषण के आरोप लगे लेकिन मोदी खामोश रहे, स्मृति ईरानी की डिग्री पर विवाद उठा और सवाल भी खड़े हुए लेकिन मोदी कुछ नहीं बोले, हर्षवर्धन के बयान भी जनका को रास नहीं आए लेकिन मोदी ने फिर भी कुछ नहीं कहा।

मनमोहन सिंह के किसी पर मंत्री पर कुछ भी आरोप लगता था तो मोदी सोशल मीडिया के माध्यम से उस पर अपनी प्रतिक्रिया देते थे लेकिन मोदी ने खामोश रहना ही ठीक समझा जब उनके मंत्रियों पर आरोप लगे।

राजनाथ सिंह के बेटे पर भी आरोप लगे और रेलमंत्री सदानंद गौड़ा के बेटे पर लगे आरोप तो बेहद गंभीर किस्म के थे लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने खामोशी का दामन थामे रखा। राजनाथ के मामले में पीएमओ से केवल ट्वीट करने सफाई दी गई और आरोपों को सिरे से खारिज किया गया।

सवाल कई हैं? आरोप कई हैं? किसी मंत्री ने आरोपों पर सफाई दी तो किसी ने कहा- नो कमेंट्स लेकिन मोदी ने कुछ नहीं कहा। यकीनन देश की जनता उनकी खामोशी सुन रही है।

टमाटर 'लाल' होता रहा है, मोदी चुप रहे

100 days :why modi make himself maun mohan

यूपीए सरकार को मोदी ने महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा था लेकिन अब बीजेपी की सरकार बनने के बाद क्या देश को इनसे निजात मिल गई? ये इतना आसान नहीं है इस बात को तो सभी जानते हैं लेकिन चुप रहना भी कहां ठीक है?

हाल ही में टमाटर के दाम आसमान छूने लगे, उम्मीद थी सरकार कुछ करेगी, मोदी कुछ कहेंगे लेकिन बीजेपी के नेताओं ने जो बयान दिए वो जनता के मुंह का स्वाद खट्टा करने के लिए काफी थे।

यूपीए सरकार के दौरान भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता उद्वेलित थी, लोग परेशान थे और ऐसे में मोदी सिंघम बनकर सामने आए। जनता को विश्वास था कि अब अच्छे दिन आएंगे लेकिन सरकार के 100 दिन पूरे होने पर जनता दो सवाल पूछ रही है- पहला ये कि अच्छे दिन कहां हैं? और दूसरा ये कि मोदी जी प्रमुख मुद्दों पर आप क्यों चुप हैं?

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