जेब पर असर डालने वालीं 10 बड़ी बातें
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साल 2013 में खाद्य सुरक्षा कानून जैसी ऐतिहासिक पहल हुई, लेकिन महंगाई भरपेट भोजन के दावों पर भारी पड़ गई। खाने-पीने की चीजों के दाम इस साल करीब 20 फीसदी तक बढ़े। सबसे पहले खाद्य सुरक्षा की गारंटी का दावा करने वाली राजस्थान और दिल्ली की कांग्रेस सरकारों के जाने के पीछे महंगाई बड़ी वजह रही। इस साल 100 और 80 रुपये किलो तक पहुंचे प्याज और टमाटर ने रसोई से लेकर राजनीति का गणित बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
फीकी पड़ी सोने की चमक
सोना सबसे सुरक्षित निवेश है, यह परंपरागत भरोसा भी 2013 में काफी कमजोर हुआ। सोने के निवेशकों के लिए यह अब तक का एक सबसे खराब वर्ष साबित हुआ। चांदी का भी यही हाल रहा। पिछले 13 साल में पहली बार निवेशकों को सोने में निगेटिव रिटर्न मिला। घरेलू बाजार में पिछले एक साल में सोने की वैल्यू करीब तीन फीसदी और चांदी की करीब 24 फीसदी कम हुई।
घरेलू बाजार में इस साल सोना 33900 की रिकॉर्ड ऊंचाई तक गया और 25450 रुपये प्रति दस ग्राम के न्यूनतम स्तर पर भी रहा। वहीं, चांदी इस साल 59750 रुपये प्रति किलो की ऊंचाई तक पहुंची और 39010 रुपये प्रति किलो का निचला स्तर भी छुआ। सोने के आयात पर अंकुश लगाने के लिए लगी पाबंदियों के चलते दीपावली पर सोने के सिक्कों की खनक भी गायब हो गई।
रुपया हुआ ‘सीनियर सिटीजन’
इस साल उभरते बाजारों की मुद्राओं में रुपये की सबसे बुरी गत हुई। डॉलर के मुकाबले रुपया 28 अगस्त 2013 को 68.80 का रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। कमजोर आर्थिक हालात के चलते विदेशी संस्थागत निवेशकों ने बड़े पैमाने पर भारतीय बाजारों से पैसा निकाल मजबूत हो रही अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगाया। जिसके चलते डॉलर लगातार मजबूत होता गया।
रुपये की बिगड़ी सेहत को सुधारने के लिए सरकार, रिजर्व बैंक और सेबी ने आनन-फानन में ताबड़तोड़ फैसले किए। इनमें सोने के आयात पर कई तरह के प्रतिबंध लगाना प्रमुख रहा। सरकारी कंपनियों को अर्ध सरकारी बांड जारी करने की अनुमति और कई क्षेत्रों में एफडीआई नियमों में ढील भी दी गई। इसका असर घरेलू मुद्रा पर पड़ा और साल के आखिर तक यह 62 के स्तर पर आ गया।
रिकॉर्ड बने, लेकिन कमाई गुम
शेयर बाजार ने 2013 में उठा-पटक का दौर झेला। हालांकि, साल के आखिरी महीनों में इसमें स्थिरता लौटती दिखाई दी। बीएसई के सेंसेक्स ने 21 अगस्त को गिरकर 17905.91 अंक का साल का सबसे निचला स्तर देखा, वहीं 9 दिसंबर को करीब पांच साल बाद यह 21326.42 अंक के ऑल टाइम हाई पर पहुंच गया।
पूरे साल अमेरिकी इकनॉमी में सुधार की उम्मीदें भारतीय शेयर बाजार का मिजाज बदलती रहीं। यूरो जोन संकट और अमेरिका की बांड की खरीद योजना को लेकर समय-समय पर फेडरल रिजर्व के बदलते रुख ने भी घरेलू बाजार को खासा प्रभावित किया। चार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद बाजार पर मोदी फैक्टर हावी रहा। इस सबके बीच विदेशी संस्थागत निवेशक शेयर बाजार पर मेहरबान रहे।
घोटालों में फंसी निवेशकों की गाढ़ी कमाई
ऑनलाइन पत्रिका कोबरापोस्ट ने कई बैंकों पर मनीलांड्रिंग में लिप्त रहने का आरोप लगाया। रिजर्व बैंक की गई जांच में भी बैंकों की ख्ाामियां साफ उजागर हुईं। देश के बड़े कमोडिटी मार्केट नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनएसईएल) में 5300 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया।
इस घोटाले के सामने आने के बाद निवेशकों में हड़कंप मच गया और सरकार ने जुलाई में एनएसईएल में कारोबार रोक दिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए कॉरपोरेट अफेयर मंत्रालय, एफएमसी, सेबी, मुंबई पुलिस सहित कई एजेंसियां मामले की जांच में जुट गईं। वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) ने अपने आदेश में एफटीआईएल के मालिक जिग्नेश शाह को जिम्मेदार ठहराते हुए कह दिया कि शाह देश में कोई भी एक्सचेंज चलाने के काबिल व्यक्ति नहीं है।
रघुराम राजन - सरप्राइज मैन
भारतीय रिजर्व बैंक के 23वें गवर्नर के रूप में रघुराम राजन इंडस्ट्री और आम आदमी के लिए सरप्राइज मैन के रूप में सामने आए। सितंबर में जब उन्होंने पदभार संभाला, तो रुपया गिरावट के रिकॉर्ड स्तर पर था। महंगाई दर ऊंचे स्तर पर और आर्थिक रफ्तार सुस्त थी।
आरबीआई की कमान संभालने के बाद उन्होंने निवेशकों का भरोसा लौटाने की कवायद शुरू की। जिसका परिणाम यह रहा कि रुपया साल के अंत तक डॉलर के मुकाबले रुपया 68 के स्तर से संभलकर 61-62 के स्तर पर आ गया है। इस बीच उन्होंने अपने द्वारा पेश की गई तीनों मौद्रिक समीक्ष्ााओं में हर बार सभी के अनुमानों के विपरीत कदम उठाकर सरप्राइज देकर इंडस्ट्री और आम आदमी को थोड़ी राहत देने की कोशिश की है। हालांकि अभी भी रिजर्व बैंक गवर्नर राजन के लिए महंगाई और गिरती विकास दर प्रमुख चुनौती बनी हुई है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री राजन किस तरह सामंजस्य बैठाते हैं, नए साल में यह देखने वाली बात होगी।
एफडीआई ने खूब कराया इंतजार
यह पूरा साल विदेशी निवेश आने के इंतजार और एफडीआई नियमों में ढील की कवायद में गुजरा। रक्षा, एविएशन, टेलीकॉम, बीमा, कमोडिटी एक्सचेंज जैसे कई क्षेत्रों में एफडीआई की राह आसान की गई। एफडीआई के लिहाज से रिटेल का मामला खासा गरम रहा। लेकिन पूरे साल सरकार मल्टीब्रांड रिटेल में निवेश का इंतजार करती रही।
इस बीच भारती और वालमार्ट का करार टूटा लेकिन साल के आखिरी महीने में आए ब्रिटिश रिटेलर टेस्को के प्रस्ताव ने सरकार को कुछ हद तक मुंह दिखाने लायक छोड़ा। सिंगल ब्रांड रिटेल में जरूर सरकार की कोशिशें रंग लाती नजर आई। स्वीडिश रिटेलर आइकिया ने एंट्री का ऐलान किया है। दिल्ली और राजस्थान में रिटेल एफडीआई विरोधी सरकारों के आने से मल्टीब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश का मैदान सिकुड़ गया है।
टाटा पर सायरस की छाप
रतन टाटा के रिटायरमेंट के बाद टाटा समूह की कमान साइरस मिस्त्री ने संभाली। नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाले देश के अग्रणी औद्योगिक समूह के लिए यह एक युग परिवर्तन सरीखा रहा। साइरस के आने के बाद टाटा समूह में बदलाव का दौर शुरू हुआ है। उन्होंने पहला बड़ा कदम समूह को एक नए विजन के साथ चलाने की ओर बढ़ाया। इसके लिए करीब एक दशक पहले बनाए गए फैसले लेने वाले दो निकायों को भंग कर एक नया ग्रुप ऑफ एक्जीक्यूटिव काउंसिल गठित किया गया। इसके अलावा साइरस ने टाटा समूह में शीर्ष पदों पर ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को आगे लाने की बात भी कही। रतन टाटा के सपनों की कार नैनो को स्मार्ट सिटी कार के नए अवतार में पेश करने का फैसला भी साइरस की अगुवाई में लिया गया।
अर्थजगत में महिलाओं को तरजीह
पिछले साल निर्भया जैसे मामलों के बाद इस साल महिलाओं से जुड़ी कुछ अच्छी खबरें सामने आईं। जहां एक ओर बजट में निर्भया फंड का ऐलान किया गया। वहीं, महिला बैंक की शुरुआत भी हुई। सरकार ने 19 नवंबर में देश के पहले महिला बैंक की शुरुआत की। ऊषा अनंतसुब्रमण्यन को भारतीय महिला बैंक का अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) बनाया गया।
देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की कमान अरुंधति भट्टाचार्य को सौंपी गई। भट्टाचार्य एसबीआई की पहली महिला सीएमडी बनीं। उन्होंने 1977 में एसबीआई से अपने कैरियर की शुरुआत की थी। बैंकिंग में चंदा कोचर, शिखा शर्मा, नैना लाल किदवई से शुरू सिलासिला काफी आगे बढ़ चुका है। वित्त मंत्रालय में सीबीडीटी और सीबीईसी की प्रमुख भी महिलाएं ही हैं।
एविएशन में नई उड़ान
एफडीआई के जरिए निवेश के मौकों को भुनाने में एविएशन क्षेत्र के दिग्गजों ने खास दिलचस्पी दिखाई। टाटा समूह एक साथ दो-दो विदेशी एयरलाइंस के साथ इस क्षेत्र में उतरने जा रहा है। जबकि नरेश गोयल जैसे पुराने खिलाड़ी विदेशी साझेदारी में पहले ही हाथ आजमा चुके हैं। सरकार ने एविएशन में 100 फीसदी एफडीआई की छूट दी।
इससे पहले अबुधाबी की एतिहाद एयरवेज ने जेट एयरवेज में 24 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने का फैसला किया। सिंगापुर एयरलाइंस और मलयेशिया की एयर एशिया ने टाटा समूह के साथ मिलकर भारतीय बाजार में उतरने का फैसला किया है। देश को पहली एयरलाइन देने वाले टाटा समूह ने इसके पहले एविएशन में सिंगापुर एयरलाइन के साथ उतरने की कोशिश की थी, लेकिन नीतिगत झंझटों के चलते कदम वापस खींच लिए थे।