नामी अस्पताल पर 1 करोड़ जुर्माना, जानिए क्यों?
राष्ट्रीय उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने करीब 15 साल पहले एक शिशु के जन्म के समय लापरवाही बरतने पर नामी निजी अस्पताल इंद्रप्रस्थ अपोलो और उसकी एक डॉक्टर को एक करोड़ रुपये के मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दिया है।
डॉक्टर की लापरवाही के कारण जन्म के समय से ही बच्ची मानसिक विकलांग हो गई। कई अस्पतालों में इलाज के बाद 12 साल की उम्र में उक्त बच्ची की मौत हो गई। इसके साथ ही आयोग ने अपोलो अस्पताल पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
एक डॉक्टर दंपति को भुगतान किए जाने वाले मुआवजे में 80 लाख रुपये अस्पताल को और 20 लाख रुपये महिला डॉक्टर सोहिनी वर्मा को देना होगा। आयोग ने कहा कि यह अपने तरह का एक अलग मामला है, जिसमें मां ने अपनी अमूल्य बच्ची को खो दिया।
जस्टिस जेएम मलिक की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अस्पताल और उसके डॉक्टर अनैतिक मेडिकल प्रेक्टिस और पेशेवर दुराचरण के दोषी हैं। उन्होंने मामले में मेडिकल रिपोर्ट में बदलाव करने के लिए उससे छेड़छाड़ किया, जिसे स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है।
आयोग ने नकारी अस्पताल की दलील
आयोग ने 43 पृष्ठों के आदेश में कहा कि कॉरपोरेट अस्पतालों और विशेषज्ञों से अन्य अस्पतालों और डॉक्टरों से बेहतर सेवा की उम्मीद की जाती है और उन्हें एक सीमा तक जवाबदेह होने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि इलाज में लापरवाही के मामले में मुआवजा पर्याप्त होना चाहिए, जिससे कि डॉक्टरों को कुछ हद तक जवाबदेह बनाया जा सके। इस मामले में डॉक्टर और अस्पताल का कहना है कि उन्होंने न तो अधिक मात्रा में दवा दी और न ही ऑपरेशन करने में देरी की।
अस्पताल ने अपने तीन विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय भी पेश की जिसमें कहा गया था कि जो उपचार किया गया वह बिल्कुल सही था। लेकिन आयोग ने इस राय को खारिज कर दिया।