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कब तक इनकार करेंगी प्रियंका गांधी?

Sat, 09 Aug 2014 12:15 PM IST
आकार पटेल वरिष्ठ पत्रकार/बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आकार पटेल वरिष्ठ पत्रकार/बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए Updated Sat, 09 Aug 2014 12:15 PM IST
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एक ओर जहाँ पार्टी के भीतरी हलकों से प्रियंका गांधी को बड़ी भूमिका देने की मांग ज़ोर पकड़ती जा रही है। वहीं प्रियंका अपनी राजनीतिक सक्रियता का दायरा अमेठी और रायबरेली के बाहर ले जाने को तैयार नहीं दिखतीं।

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सियासी पंडितों में इस बात को लेकर कयास जारी है कि मौजूदा हालात में पार्टी को प्रियंका की कितनी जरूरत है और अगर वे राजनीति में आने का फैसला करती हैं तो इससे कांग्रेस के लिए क्या बदल जाएगा।
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लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। बात ये भी जोर देने वाली है कि आखिर प्रियंका कब तक इंकार करती रहेंगी। पढ़ें ये खास विश्लेषण..
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आखिर क्या भूमिका होगी प्रियंका की

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जिस तरह से लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की हार हुई है उससे ये कहना कि कांग्रेस का देश से सफ़ाया हो जाएगा, अभी ज़ल्दबाजी होगी। पराजय के कारण कांग्रेस कार्यकर्ताओं में निराशा है और मेरा आकलन है कि अगले 30-40 साल तक तो कांग्रेस का अस्तित्व बना रहेगा।

जहाँ तक प्रियंका गांधी को बड़ी ज़िम्मेदारी देने की बात है तो प्रियंका को लाने से एक बात तो साफ हो जाएगी कि राहुल पार्टी को नेतृत्व देने में विफल रहे हैं और उनसे काम नहीं हुआ है और मुझे नहीं लगता कि गांधी परिवार इतना स्पष्ट संकेत देगा प्रियंका को अगर कांग्रेस पार्टी में लाया भी जाता है तो उनकी भूमिका साइड रोल की होगी या उन्हें कुछ अतिरिक्त ज़िम्मेदारी दी जा सकती है।

फिलहाल गांधी परिवार प्रियंका को बड़ी ज़िम्मेदारी देने से बचना चाहेगा।

परिवार की असफलता

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हां, प्रियंका के आने से कांग्रेस पार्टी में कुछ हद तक बदलाव आ सकता है। वह कार्यकर्ताओं में कुछ जोश भर सकती हैं। हक़ीक़त यह है कि लोकसभा चुनाव में जहां भी कांग्रेस हारी है, वह भाजपा के साथ वहां सीधी लड़ाई में थी।

गुजरात में कांग्रेस 30 साल से नहीं जीती। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस में सीधी टक्कर होती रही है और इन राज्यों में ये पार्टियां या तो सत्ता में होती हैं या विपक्ष में।

इस साल हमें शायद यह भी ख़बर मिले कि महाराष्ट्र जो कि कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है, वह भी उसके हाथ से निकल चुका हो। कुछ हद तक ये मानना ही होगा कि कांग्रेस की हार गांधी परिवार की असफलता और नरेंद्र मोदी के प्रति सकारात्मक रुझान का नतीजा रही।

तो प्रियंका गांधी के आने से बहुत कुछ बदल जाएगा, ऐसा नहीं लगता। पिछले 30 साल में भाजपा जिस तेज़ी से उभरी है, उसके प्रभाव को एकदम से कम करना मुश्किल होगा।हाँ, इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रियंका राजनीति के कुछ मामलों में राहुल से ज़्यादा परिपक्व हैं। हाल के लोकसभा चुनावों के दौरान भी उन्होंने कई मर्तबा ये दिखाया भी।

'परास्त नेता' की छवि है राहुल की

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वो जानती हैं कि लोग ख़ासतौर पर मीडिया क्या सुनना चाहता है। वैसे भी मौजूदा माहौल में जो राहुल की 'परास्त नेता' की छवि बनी हुई है, प्रियंका के आने से उसमें कुछ सुधार ही होगा।

दरअसल, कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल दूसरी पंक्ति के नेतृत्व का न होना है। कांग्रेस ही नहीं, भाजपा में भी दूसरी पंक्ति गायब है। गुजरात में जब तक नरेंद्र मोदी का शासन रहा उन्होंने दावेदारों को या तो पार्टी से निकाल दिया या किनारे कर दिया।

शिवराज सिंह चौहान जैसे नेताओं को भी दूसरी पंक्ति का नहीं कहा जा सकता। रही बात कांग्रेस की तो राज्यों में भी कांग्रेस का मज़बूत नेतृत्व नहीं है। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है, जैसे महाराष्ट्र, वहां भी उनका कोई मजबूत नेता नहीं है और कांग्रेस की पराजय का यह भी बड़ा कारण रहा है।

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