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'यह इंसानी नजरिये से सोचने का वक्त है': जैगम इमाम

Fri, 20 Mar 2015 09:01 AM IST
रवि बुले/ अमर उजाला, मुंबई ब्यूरो
रवि बुले/ अमर उजाला, मुंबई ब्यूरो Updated Fri, 20 Mar 2015 09:01 AM IST
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Zaigham Imam feels religion has been commercialised in Indian films

उत्तर प्रदेश के चंदौली के रहने वाले 32 बरस के जैगम इमाम दो उपन्यास लिख चुके हैं और एक फिल्म बना चुके हैं। कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समारोहों में प्रदर्शित और प्रशंसित हो चुकी उनकी फिल्म दोजखः इन सर्च ऑफ हेवन आज सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। यूपी में यह फिल्म लखनऊ, इलाहाबाद और बनारस में दिखाई जाएगी। इस फिल्म को लेकर जैगम इमाम से बातचीत की रवि बुले ने...

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लोगों के लिए फिल्म का मतलब बड़े सितारे, भव्य सैट, मोटा बजट है। कम चर्चित और नए कलाकारों के साथ पहली फिल्म बनाना क्या जोखिम का काम नहीं था?
हर नए निर्देशक पर यह बड़ा दबाव होता है कि वह अच्छी कहानी के साथ नामी कलाकारों को लेकर फिल्म बनाए। मार्केट की डिमांड शायद इसे ही कहते हैं। लेकिन भारत ही नहीं विदेश में भी कई नामी निर्देशक हैं जिन्होंने करियर की शुरुआत सितारों के बजाय कहानी प्रधान फिल्मों से की। फिर मेरे पास कोई रास्ता नहीं था कि बड़े कलाकरों तक पहुंच सकूं और न मेरा फोकस सितारे थे। हालांकि मुझ पर भी इन बातों का दबाव था। परंतु मेरे दिमाग में हमेशा यही बात थी कि एक अच्छी फिल्म के साथ अपनी बात कहूं। सितारे लुभाते हैं, लेकिन छोटी फिल्में अपनी जगह बना रही हैं।
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धर्म संवेदनशील मुद्दा है। हिंदू हों या मुस्लिम, धर्म के ठेकेदारों का गुस्सा फिल्मों पर खूब उतरता है। दोजख... इस्लाम की कुछ मान्यताओं के अनुकूल नहीं दिखती। क्या कहेंगे?
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हो सकता है कुछ लोगों को दोजखः इन सर्च ऑफ हेवन पसंद न आए लेकिन यह फिल्म अब तक देश के जिन हिस्सों से गुजरी है वहां इसे खूब सराहना मिली। दक्षिण भारत समेत कोलकाता, कोल्हापुर, मुंबई और दिल्ली में इसकी स्क्रीनिंग हुई और दर्शकों ने इसे प्यार दिया। हमने इसमें पिता-पुत्र के जिस इमोशन को दिखाने की कोशिश की है उसे लोगों ने दिल से महसूस किया। कोई हंगामा नहीं हुआ। विवाद होना होते तो अब तक हो चुके होते। वास्तव में यह धर्म के मद्देनजर इंसान की बदली हुई सोच की कहानी है। आज समय है कि हम धर्म से ऊपर इंसानी नजरिये को रख कर सोचें।

लेकिन सेंसर की स्क्रीनिंग में कुछ मुस्लिम सदस्यों ने फिल्म का विरोध किया था?
सही बात है, मगर सेंसर बोर्ड की तत्कालीन प्रमुख लीला सैमसन ने अंततः खुद फिल्म देख कर इसे यू प्रमाणपत्र दिया था। मुझे नहीं लगता कि इसके बाद किसी विवाद की गुंजाइश रह जाती है।

फिल्म की कहानी के बारे में जरा विस्तार से बताएं?
दोजख धर्म की पृष्ठभूमि वाली सामाजिक फिल्म है। यहां एक मुस्लिम पिता और उसका किशोरवय बेटा है। पिता पक्के नमाजी होने के साथ इमाम भी हैं। उन्हें यह बात बेहद अखरती है कि उनका बेटा एक हिंदू पुजारी का दोस्त है। वह बेटे पर पाबंदियां लगाते हैं। पिता की ऐसी बातें उन्हें अपने बेटे से दूर कर देती है। मगर वक्त का पहिया ऐसे घूमता है कि पिता सोचता है, उसे खुश रहने के लिए धर्म की नहीं बेटे की जरूरत है। धार्मिक नजरिये से सोचने के बजाय इंसानी नजरिये से सोचने की जरूरत है।

आपकी कहानी में बनारस है। गंगा-जमुनी संस्कृति है। जो भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। फिर भी इक्कीसवीं सदी में तक हिंदू-मुस्लिम के बीच अदृश्य दीवार है। सब मानते हैं कि दीवार ढहनी चाहिए, लेकिन कैसे?
पहल दोनों तरफ से होनी चाहिए। फिल्म, टेलीविजन या मीडिया में राजनीतिक स्तर पर मुसलमानों को जैसा दयनीय बताया जाता है हालात वैसे कतई नहीं हैं। न ही हिंदू-मुस्लिम के बीच की खाई बहुत गहरी है। मैं बनारस में ऐसे माहौल में रहा हूं जहां दोनों धर्मों के लोग बड़े प्यार से मिल-जुलकर रहते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो बनारस में कोई सलीम भाई रामलीला में हनुमान का रोल नहीं कर रहे होते, कोई मुसलमान होली नहीं खेलता और न ही कोई रामलाल या किशन जी ईद की मुबारकबाद देते हुए बच्चों को ईदी देते। लोगों को समझना होगा कि राजनेता अपने फायदे के लिए बढ़ा-चढ़ाकर बातें करते हैं सो उनकी बातों को बहुत गंभीरता से न लें, बल्कि समझदार बनें।

आपने अपने उपन्यास पर फिल्म बनाई। क्या शुरू से इस कहानी को रुपहले पर्दे पर लाना चाहते थे?
सच कहूं तो जब मैंने उपन्यास लिखना शुरू किया, तब यह तय नहीं था कि इस पर फिल्म बनाऊंगा। जैसे-जैसे इसकी कहानी विकसित होती गई मुझे लगा इस पर फिल्म अवश्य बननी चाहिए।


फिल्म बनाने के लिए आपने नौकरी छोड़ने का जोखिम तक लिया था। क्या यह सच है?
बिल्कुल। मीडिया में मैंने अपना करिअर अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित अखबार से शुरू किया था। इसके बाद मैं न्यूज चैनलों में चला गया। जब मैंने उपन्यास लिखा तो सोचा कि क्यों न दायरे को कुछ और बड़ा किया जाए, तब मैंने न्यूज चैनल की नौकरी छोड़ दी और फिल्म बनाने का फैसला लिया। हालांकि नौकरी के बगैर गुजारे दिन बहुत कठिन थे।

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