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क्रिकेट मैच जीत के हीरो पहुंचा कोठे पर
अमर उजाला मुंबई / रवि बुले
Updated Mon, 28 Oct 2013 01:16 PM IST
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15 नवंबर को रिलीज हो रही फिल्म 'रज्जो' की कहानी बहुत दिलचस्प है। इसे खुद फिल्म के निर्देशक विश्वास पाटिल बता रहे हैं।
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क्रिकेट मैच में जीत का जश्न कैसे मने? तवायफ के कोठे पर। मुंबई के विरार के कुछ लड़के ऐसा ही करते हैं और जब यह बात चंदू को पता चलती है तो वह भी उनके पीछे-पीछे पहुंच जाता है। यहीं उसकी मुलाकात होती है ‘रज्जो’ से।
पहली नजर में दोनों में प्यार होता है और सिलसिला आगे बढ़ता है। बात हो रही है 15 नवंबर को रिलीज होने वाली फिल्म ‘रज्जो’ की। जिसे मराठी के विख्यात उपन्यासकार 54 वर्षीय विश्वास पाटिल ने बनाया है। फिल्म में ‘रज्जो’ बनी हैं कंगना रनौत और चंदू हैं बरेली (उ.प्र.) के पारस अरोड़ा।
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पाटिल फिल्मों के बड़े ‘भक्त’ हैं। विश्व सिनेमा हो या भारतीय वे एनसाइक्लोपीडिया हैं। यही कारण है कि जब ‘रज्जो’ की बात शुरू हुई तो उन्होंने फिल्म के रंगों से चर्चा शुरू की। रज्जो के रंग, जो गुलाबी हैं। नारंगी हैं।
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दिखेंगे मुजरों के रंग
उन्होंने बताया, ‘फिल्म शुरू होने से पहली ही मैं अपने कैमरामैन (बिनोद प्रधान) को लेकर मुंबई की उन जगहों पर गया जहां आज भी मुजरे होते हैं। वहां के रंग आपको दिखेंगे।’ खास बात यह भी है कि ‘दिल तो पागल है’ और ‘गदर’ के संगीतकार उत्तम सिंह सात साल बाद इस फिल्म से बॉलीवुड संगीत में वापसी कर रहे हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर ‘महानायक’ और इतिहास प्रसिद्ध पानीपत के तीसरे युद्ध पर ‘पानीपत’ जैसे कालजयी उपन्यास लिखने वाले विश्वास पाटिल बातों में जितने सहज-सरल हैं, काम में उतने ही कर्मठ। लेकिन फिल्म जगत की अपनी राजनीति है।
गलाकाट स्पर्द्धा है। नए के लिए यहां पैर टिकाना बड़ी चुनौती है। पाटिल इन दिनों ऐसी चुनौतियों का मुकाबला कर रहे हैं। उन्हें विश्वास है कि वे हर हाल में यह मुकाबला जीतेंगे। ‘रज्जो’ के सामने संजय लीला भंसाली की ‘रामलीला’ चुनौती पेश कर रही है।
लड़का पड़ा वेश्या के प्यार में
ऐतिहासिक और सामाजिक उपन्यासों के लेखक पाटिल ने अपनी फिल्म के लिए मराठी नाटककार जयंत पवार की कहानी को चुना। वह कहते हैं, ‘मुझे यह कहानी कुछ अजीब लगी थी। विरार का लड़का एक वेश्या के प्यार में पड़ जाता है। हकीकत और कल्पना का अद्भुत मिश्रण इस लव स्टोरी में था।’
पाटिल याद करते हैं, ‘एक समय मैं सेंट्रल मुंबई के इलाकों में निर्वाचन अधिकारी था और उस दौरान वोटर लिस्ट तैयार करते हुए वे कोठे मैंने बार-बार देखे थे।’ उस दौरान उन्हें कई किरदारों ने आकर्षित किया। जिन्हें उन्होंने फिल्म में सजाया है। जैसे महेश मांजरेकर का किन्नर का रोल। प्रकाश राज की कारपोरेटर की भूमिका।
एक गन्नेवाला जो एक वेश्या के प्यार में शायरी करता था। एक शराबी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट, जिसने गलती से कुछ बच्चों को मार दिया था। ये किरदार मूल कहानी में नहीं थे। पाटिल ने फिल्म की स्क्रिप्ट में इन्हें पिरोया। पवार के अनुसार सेंट्रल मुंबई बहुत जीवंत एरिया है। यह सचाई और कल्पना के बीच की जगह है।
याद आएंगे मंटो और राजेंद्र सिंह बेदी
वह कहते हैं, ‘इसी इलाके में मंटो को दिल को छूने वाली कहानियां मिलीं। राजेंद्र सिंह बेदी ने भी इस इलाके की कुछ कहानियां लिखीं।’ कंगना रनौत को ‘रज्जो’ बनाने पर विश्वास कहते हैं, ‘मुझे सशक्त अभिनेत्री और प्रवीण डांसर की जरूरत थी। कंगना ने साबित किया है कि वे बहुत अच्छी नृत्यांगना हैं।’
पाटिल के अनुसार कंगना को फिल्मों में नशा करने वाली लड़की के ही रोल ज्यादा मिले हैं और उनकी यही छवि बन गई है। वह बताते हैं, ‘जब मैंने ‘वो लम्हे’ देखी थी तभी लगा था कि कंगना को भारतीय लड़की का रोल मिलना चाहिए, वह कमाल करेगी। रज्जो में मैंने वही किया।’
लेकिन ऐसा तो नहीं कि तावायफ की कहानी समय से पीछे की बात हो? पाटिल कहते हैं, ‘बिल्कुल नहीं। रज्जो पाकिजा या उमराव जान नहीं है। उसमें उनकी अदाएं और अदब नहीं हैं। आज की तवायफ को दस जगह हफ्ता देना पड़ता है।
मुंबई की तेज रफ्तार के साथ जिंदगी का तालमेल बैठाना पड़ता है। यह पूरी तरह आज की कहानी है। फिर हमारा नायक भी क्रिकेट मैच जीत कर कोठे पर जाता है, कोई युद्ध जीत कर नहीं।