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तो सीग्रेड फिल्मों के हीरो होते संजीव कुमार
अमर उजाला,मुंबई
Updated Wed, 08 Jan 2014 08:02 AM IST
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फिल्मों में आने से पहले संजीव कुमार रंगमंच पर काम करते थे और उनकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी। वह गुजराती थे और उनका असली नाम हरीभाई जरीवाला था।
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उन्होंने फिल्मों में काम की तलाश की तो शुरुआती दिनों में ‘सी ग्रेड’ फिल्मों में भी रोल ऑफर हुए। संजीव कुमार अच्छी फिल्मों की तलाश में लगे रहे।
मेहनत रंग लाई और जल्द ही कामयाबी ने कदम चूमे। अपने कैरियर में संजीव कुमार को हिंदी फिल्मों के इतिहास की ऐसी फिल्म भी मिली, जो अपने आप में अनूठी है। 1974 में आई ‘नया दिन नई रात’।
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निर्देशक ए. भीम सिंह का यह कमाल का प्रयोग था, जिसमें उन्होंने अलग-अलग नौ तरह के किरदारों को एक ही अभिनेता से करवाया।
संजीव कुमार के लुक में निर्देशकों को जाने क्या दिखाई देता था कि उन्हें भरी जवानी में बूढ़े व्यक्ति के रोल दिए जाते थे। रंगमंच पर उन्होंने मात्र 22 साल की
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उम्र में एक बूढ़े का सशक्त अभिनय किया था। नाटक था आर्थर मिलर का ‘ऑल माई सन’। यहीं निर्माता-निर्देशक गुलजार ने भी उन्हें पहली बार देखा था और अपनी फिल्मों में अक्सर बूढ़े के रोल दिए और उनके चेहरे पर मूंछ लगाई।
संजीव कुमार मूंछ नहीं रखते थे। लेकिन ‘नया दिन नई रात’ उनकी सबसे अलग फिल्म थी। इस फिल्म से पहले वह बेहतरीन अभिनेता के रूप में ख्याति पा चुके थे और ‘दस्तक’ (1971) और ‘कोशिश’ (1973) के लिए सर्वश्रेष्ठ ऐक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार भी पा चुके थे।
उन दिनों में जबकि ऐक्टर के लिए डबल रोल वाली फिल्म बड़ी बात होती थी, संजीव कुमार को यह आश्चर्यजनक भूमिका मिली। इसमें पाइप पीते हुए विधुर बूढ़े, सिगार चबाते पुलिसवाले, बंदूकधारी डकैत, पियक्कड़ पति, मनोचिकित्सक, धोखेबाज तांत्रिक से लेकर कोढ़ी तक के रोल शामिल थे।
वैसे फिल्म की कहानी मुख्य रूप से जया भादुड़ी की थी। जो सुषमा नाम की ऐसी युवती के किरदार में थीं, जो पिता द्वारा उसकी शादी करने के फैसले से नाराज होकर घर से भाग जाती है।
लेकिन कदम-कदम पर उसका सामना अलग-अलग किस्म के पुरुषों से होता है। इन सभी भूमिकाओं में संजीव कुमार थे, जो जया को जिंदगी का कोई न कोई सबक सिखाते थे! इन तमाम लोगों से मिलती हुई अंत में जया की भेंट उस युवक आनंद से होती है, जिसे पिता ने उसके लिए चुना। यह भी संजीव कुमार होते हैं!
नौ भूमिकाओं के लिए संजीव कुमार का मेक-अप करने वाले आर्टिस्ट थे, सरोश मोदी। वैसे रोचक तथ्य यह है कि एक कलाकार के नौ रंगों वाली यह फिल्म संजीव कुमार के लिए नहीं, बल्कि दिलीप कुमार के लिए लिखी गई थी!
लेकिन उन्होंने इसे करने से इंकार कर दिया था। वैसे खुद दिलीप कुमार ने ही भीम सिंह को संजीव कुमार का नाम इस रोल के लिए सुझाया था। दिलीप कुमार फिल्म ‘संघर्ष’ में संजीव कुमार के साथ काम कर चुके थे और उनकी प्रतिभा से परिचित थे।
फिल्म का अंत सुषमा और आनंद की शादी के दृश्य से होता है। ...और यहां पर संजीव कुमार के छह रूप एक साथ पर्दे पर नजर आते हैं। वर-वधु को आशीर्वाद देते हुए।