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सालगिरह पर पढ़िए एमएफ हुसैन के विवाद
दीपा गहलोत
Updated Tue, 17 Sep 2013 06:21 PM IST
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मकबूल फिदा हुसैन का आज जन्मदिन है। उनकी सौंवी सालगिरह पर उनके विवादास्पद जीवन पर एक नजर डालते चलिए।
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मक़बूल फ़िदा हुसैन का जन्म हर जगह 1915 बताया जाता है लेकिन उनके पासपोर्ट के अनुसार उनका जन्म 1913 में हुआ था। मुंबई की इंस्टीट्यूट ऑफ़ कंटेम्प्ररी आर्ट्स, आसीआईए, में 26 सितंबर से नौ अक्तूबर तक उनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लग रही है जिसमें हुसैन की बेटी ने कलाकारों को हुसैन की 100वीं सालगिरह कहने की अनुमति दी है।
हुसैन जीवन भर अपनी प्रशंसा और आलोचनाओं से ऊपर उठे हुए इंसान रहे। एक बार आपातकाल के दौरान उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पेंटिंग बनाई तब, या जब उन्होंने माधुरी दीक्षित (जिनके साथ उन्होंने लगभग भुला दी जाने वाली फ़िल्म 'गजगामिनी' बनाई) के प्रति अपनी दीवानगी ज़ाहिर कर अपना मज़ाक बनाया।
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हिंदू देवियों की तस्वीरें ने किया विवाद
हुसैन को हिंदू देवियों दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की नग्न तस्वीरें बनाने के लिए कड़ी आलोचना का शिकार होना पड़ा। उनकी पेंटिंग से चरमपंथी हिंदू संगठनों में भारी आक्रोश पैदा हो गया।
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हुसैन ने साल 1970 में ये पेंटिंग तब बनाई थी जब भारत अधिक उदार माना जाता था। मगर इन पेंटिंग को 'विचार मीमांसा' नाम की पत्रिका में साल 1996 में छापा गया। शीर्षक दिया गया, मक़बूल फ़िदा हुसैनः पेंटर या क़साई।
अश्लील पेंटिंग बनाने के विरोध में हुसैन के ख़िलाफ़ देश के अलग-अलग हिस्सों से आठ आपराधिक मामले दर्ज किए गए। हालांकि वे कोर्ट में हाज़िर नहीं हुए। उनके ख़िलाफ़ ग़ैरज़मानती वारंट जारी हुए। साल 1998 में हिंदू संगठनों, जैसे बजरंग दल ने हुसैन के घर पर हमला किया और वहां रखी दूसरी तस्वीरों को नष्ट कर दिया।
पर रवैया फिर भी नहीं बदला
मुंबई में शिवसेना ने माना कि ये प्रतिक्रिया और हमला हिंदुत्व के अपमान के बदले किया गया था। उन्होंने इस प्रतिक्रिया को सही ठहराया। यही नहीं लंदन में भी हुसैन की पेंटिंग प्रदर्शनी को विरोध प्रदर्शन के बाद बंद कर देना पड़ा।
उनकी मौत के बाद भी लोगों का उनके प्रति रवैया नही बदला है। मुंबई में उनकी पेंटिंग की सार्वजनिक नीलामी को रद्द किया गया और इसे बेहद निजी तौर पर आयोजित किया गया। दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2004 में इन शिकायतों को ख़ारिज कर दिया कि उनकी कलाकृतियों से विभिन्न समूहों के बीच तनाव बढ़ रहा है।
ईश-निंदा का आरोप भी लगा
भारत के चित्रकार एमएफ़ हुसैन ने क़तर की नागरिकता स्वीकार कर ली थी। एक इस्लामी संगठन 'ऑल इंडिया उलेमा काउंसिल' ने भी उनकी फ़िल्म 'मीनाक्षीः ए टेल ऑफ़ थ्री सिटीज़' के एक गीत 'नूर-उन-अला-नूर' से नाराज़गी जताई।
इस गीत को ईश-निंदा माना गया। हुसैन ने इस गाने को हटाने की बजाय इस फ़िल्म को ही सिनेमाघरों से हटा लिया। साल 2006 में, इंडिया टुडे, में 'आर्ट फॉर मिशन कश्मीर' के लिए एक विज्ञापन छपा। इसमें हुसैन की एक पेंटिंग बनी थी जिसमें भारत के मानचित्र पर एक नंगी औरत की पेंटिंग बनी थी।
उस औरत के पूरे जिस्म पर भारत के राज्यों के नाम थे। हिंदू जागृत्ति समिति और विश्व हिंदू परिषद् (वीएचपी) ने इसे अश्लील मानते हुए विरोध किया। उन्होंने हुसैन पर माफ़ी मांगने का दबाव डाला।
अंतिम समय रहा निर्वासित जीवन
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हुसैन के ख़िलाफ़ सारे आरोपों को यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि पेंटिंग एक कलाकृति मात्र है।
लगातार विरोध प्रदर्शन, मुकदमे, कष्ट और मौत की धमकी ने हुसैन का जीना इतना मुहाल किया कि वे लंदन और दोहा में निर्वासित जीवन बिताने लगे। अंततः उन्होंने 2010 में क्लिक करें क़तर की नागरिकता भी ले ली।
हुसैन पर हो रहे हमलों की कला बिरादरी चाहे जितनी आलोचना करे, देश का मिज़ाज लगातार असहिष्णु होता जा रहा है। आज ऐसा माहौल बन गया है कि दूसरे कलाकारों की प्रदर्शनियों पर भी धार्मिक समूहों के हमले और तोड़फोड़ होने लगे हैं।
लगता है कि हुसैन विवादों के प्रतीक बन गए हैं। उनकी छवि के साथ यह हमेशा जुड़ा रहेगा। आज उन्हें उस जगह देखा जाता है जहां उदारता और असहिष्णुता टकराती है।