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आग लगे तो आर के स्टूडियो में ही लगे
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Fri, 18 Oct 2013 04:06 PM IST
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राजकपूर को कला विरासत में मिली। कला अभिनय की बारीकियां सीखने के लिए उन्होंने क्लेपर ब्वाय तक बनना स्वीकार किया। फिल्मों में आने के लिए अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के नाम का इस्तेमाल बस इतना ही था कि उन्हें पंडित केदार दत्त का सानिध्य मिला।
लेकिन उन्हें एकदम कैमरे के सामने नहीं लाया गया। न ही कैमरे को पकड़ाया गया। वह स्टूडियो में हर तरह का काम यहां तक कि झाडूं पौंछा भी लगाते थे। वो दिन दूर हुए। नीलकमल में उन्हें मधुबाला के साथ काम अभिनय करने को मिला। उनकी शुरूआत यहीं से थी। यहीं उनके मन में अपना थियेटर खोलने का मन बनाया।
वह अपने साथियों को पिकनिक के बहाने खंडाला ले गए। वहीं पर बताया कि आर के स्टूडियो बनवाना चाहते थे। सब खुश हुए। केवल चौबीस साल की उम्र में आर के स्टूडियो बनाया। लेकिन आगे उनके लिए काफी संघर्ष था। खैर किसी तरह पहली फिल्म बनाने की बात हुई तो उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'आग' बनाई।
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नर्गिस के साथ उनकी यह पहली फिल्म थी। लेकिन यह काम आसान नहीं था। बहुत मुश्किलें आईँ। किसी तरह फिल्म तैयार हुई। लेकिन उस समय इस फिल्म को वितरक नहीं मिले। राज कपूर और उनकी मंडली बहुत परेशान थी। किसी तरह फिल्म बनी पर उसे खरीददार नहीं मिले।
एक निर्माता निर्देशक ने तो राज कपूर से कहा, देखिए इसे अपने स्टूडियो में ही लगाइए अच्छा है आग लगे तो आपके स्टूडियो में ही लगे। उस समय ये बातें राजकपूर को निराश कर सकती थी। लेकिन उन्होंने हौसला नहीं खोया। आखिर आग बनकर तैयार हुई।
फिल्म बेशक हिट नहीं हुई हो। लेकिन आर के बैनर में इसका अपना महत्व है। आगे चलकर 'बरसात','आवारा', 'श्री चार सौ बीस', 'संगम' जैसी फिल्में फिल्म जगत में इतिहास बनी। फिल्म की थीम, गीत संगीत और राज नर्गिस के संजीदा अभिनय के लिए इस फिल्म को याद किया जाता है। राम गांगुली के संगीत में जिंदा हूं इस तरह, और कोयल काहे को शोर मचाए जैसे गीत आज भी उतने ही रुझान से सुने जाते हैं।
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लेकिन उन्हें एकदम कैमरे के सामने नहीं लाया गया। न ही कैमरे को पकड़ाया गया। वह स्टूडियो में हर तरह का काम यहां तक कि झाडूं पौंछा भी लगाते थे। वो दिन दूर हुए। नीलकमल में उन्हें मधुबाला के साथ काम अभिनय करने को मिला। उनकी शुरूआत यहीं से थी। यहीं उनके मन में अपना थियेटर खोलने का मन बनाया।
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वह अपने साथियों को पिकनिक के बहाने खंडाला ले गए। वहीं पर बताया कि आर के स्टूडियो बनवाना चाहते थे। सब खुश हुए। केवल चौबीस साल की उम्र में आर के स्टूडियो बनाया। लेकिन आगे उनके लिए काफी संघर्ष था। खैर किसी तरह पहली फिल्म बनाने की बात हुई तो उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'आग' बनाई।
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नर्गिस के साथ उनकी यह पहली फिल्म थी। लेकिन यह काम आसान नहीं था। बहुत मुश्किलें आईँ। किसी तरह फिल्म तैयार हुई। लेकिन उस समय इस फिल्म को वितरक नहीं मिले। राज कपूर और उनकी मंडली बहुत परेशान थी। किसी तरह फिल्म बनी पर उसे खरीददार नहीं मिले।
एक निर्माता निर्देशक ने तो राज कपूर से कहा, देखिए इसे अपने स्टूडियो में ही लगाइए अच्छा है आग लगे तो आपके स्टूडियो में ही लगे। उस समय ये बातें राजकपूर को निराश कर सकती थी। लेकिन उन्होंने हौसला नहीं खोया। आखिर आग बनकर तैयार हुई।
फिल्म बेशक हिट नहीं हुई हो। लेकिन आर के बैनर में इसका अपना महत्व है। आगे चलकर 'बरसात','आवारा', 'श्री चार सौ बीस', 'संगम' जैसी फिल्में फिल्म जगत में इतिहास बनी। फिल्म की थीम, गीत संगीत और राज नर्गिस के संजीदा अभिनय के लिए इस फिल्म को याद किया जाता है। राम गांगुली के संगीत में जिंदा हूं इस तरह, और कोयल काहे को शोर मचाए जैसे गीत आज भी उतने ही रुझान से सुने जाते हैं।