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राजकपूर के साथ शैलेंद्र, मतलब फिल्म हिट

Sat, 15 Dec 2012 10:01 AM IST
रोहित मिश्र
रोहित मिश्र Updated Sat, 15 Dec 2012 10:01 AM IST
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rajkapoor and Shailendra are complementary to each other

गीतकार शैलेंद्र की आज पुण्यतिथि है और राजकपूर का जन्मदिन। यह एक अनूठा संयोग तो है, इससे भी बड़ा संयोग इन दो महान कलाकारों की मित्रता है। अगर ये दोनों साथ न होते तो शायद कई यादगार फिल्में और गुनगुनाने लायक गीत हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री को नहीं मिल सकते थे। शैलेंद्र को उनकी योग्यता के अनुरूप ख्याति दिलाने में राजकूपर की भूमिका थी तो राजकपूर को शो मैन बनाने में शैलेंद्र की। 

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शैलेंद्र की देन है 'राजकपूर टच'

राजकपूर और शैलेंद्र ने एक साथ कई फिल्में की। जिन फिल्मों में राजकपूर निर्माता या निर्देशक होते उसमें वह हरसंभव शैलेंद्र का साथ पाने का प्रयास करते। राजकपूर और शैलेंद्र के बीच इन्हीं अल्फाजों का रिश्ता था। राजकपूर जोड़ी बनाने के लिए जाने जाते थे। नायिका के साथ जोड़ी, संगीतकार के साथ जोड़ी और गीतकार के साथ जोड़ी। राजकपूर ने शंकर जयकिशन के साथ 18 फिल्में कीं, नरगिस के साथ 16 फिल्में की। कुछ ऐसा ही रिश्ता उनका शैलेंद्र के साथ रहा है।
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राजकपूर की जिस इमेज को हम आज सोचते हैं उसे गढ़ने में गीतकार का शैलेंद्र का सबसे बड़ा योगदान रहा है। 'श्री 420' फिल्म का गाना 'मेरा जूता है जापानी' से यदि राजकूपर का स्वदेशी प्रेम दिखता है तो उसकी एकमात्र वजह शैलेंद्र थे। 'आवारा', 'श्री 420', 'अनाड़ी' 'जिस देश में गंगा बहती है' और 'संगम' वह फिल्में जिन्होंने राजकपूर का चरित्र को गढ़ा है। इन फिल्मों के सभी गाने शैलेंद्र ने लिखे हैं। कहा तो यह भी जाता है जिन राजकपूर के जिन फिल्मों के गीत शैलेंद्र ने नहीं लिखे हैँ उन फिल्मों में दर्शकों को 'राजकपूर टच' महसूस नहीं किया।  
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यूं मिले राजकपूर और शैलेंद्र
शैलेंद्र मुंबई में एक रेलवे वर्कशॉप में नौकरी करते थे। उनकी ख्याति रेलवे यूनियन के अच्छे गीतकारों में थी। महज 24 साल की उम्र में 'आग' फिल्म का निर्देशन कर चुके और 'बरसात' फिल्म की तैयारी कर रहे राजकपूर रेलवे वर्कशॉप के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे।

शैलेंद्र ने इस कार्यक्रम में कविता पाठ किया। राजकपूर उनकी कविताओं से प्रभावित हुए। कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह राजकपूर को अलग ले गए और उनसे अपनी फिल्म में काम करने का आग्रह किया। शैलेंद्र ने कहा कि वह अपनी नौकरी से खुश हैं। राजकपूर अपना विजटिंग कार्ड देते हुए यह कहकर चले गए कि कभी उनका मन बदले तो वह जरूर मेरे पास आएं।

कुछ समय बाद शैलेंद्र की पत्नी बीमार पड़ गई। यार-दोस्तों से उधार लेकर भी इलाज का ख़र्च पूरा नहीं हुआ तो उन्हें राजकपूर की याद आई। शैलेंद्र ने पत्नी के इलाज के लिए राजकपूर से पैसे उधार लिए और कहा 6 माह के भीतर मैं यह उधार चुका दूँ। जब शैलेंद्र को लगा कि वे उधार नहीं चुका पाएंगे तो वह दोबारा राजकपूर के पास गए और कहा कि वे गीत लिखने के लिए तैयार हैं । उस समय तक ‘बरसात’ के सारे गीत रिकार्ड हो चुके थे। गीतकार थे हसरत जयपुरी।

राजसाहब ने हसरत साहब को समझाया और कहा कि मैँ शैलेंद्र को मौका देना चाहता हूं। आपको फिल्म के दो गीत हटाने पड़ेगे। यह गीत ‘प्रेम नगर में बसने वाले’ और ‘मैं जिंदगी में हरदम रोता ही रहूंगा थे। इन्हें हटाकर शैलेंद्र से दो गीत लिखवाए गए। यह गीत ‘बरसात में हमसे मिले तुम सनम तुमसे मिले हम’ और ‘पतली कमर है तिरछी नज़र है' थे। यह गीत खूब चले और यही चल निकली शैलेंद्र और राजकपूर की जुगलबंदी।

शैलेंद्र ने बनाई तीसरी कसम
शैलेंद्र ने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘तीसरी कसम’ बनाई तो नायक की भूमिका के लिए राजकपूर से अनुरोध किया। हालांकि उस समय राजकपूर की उम्र अधिक हो गई थी मगर उन्होंने दोस्ती निभाई। एक सीधे-साधे प्रौढ़ प्रेमी के रुप में उन्होंने फिल्म को यादगार बना दिया। शैलेंद्र के सादगी भरे शब्दों ने राजकपूर के सीधे सादे व्याक्तित्व के साथ मिलकर दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ी। अव्वल दर्जे के सृजनकारी शैलेंद्र को बाजार के चोचले नहीं आते थे। अनाड़ी फिल्म के लिए लिखा गया उनका ही गीत ‘सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी’ उनके जीवन पर भी सटीक बैठता है।

'तीसरी कसम' बनाने के दौरान ही वह ऐसे भंवर में फंसे कि खुद को निकाल नहीं पाए। प्रोडक्शन में आने को लेकर शैलेंद्र को राजकपूर ने काफी समझाया था कि बाजार अपनी शर्तों पर मजबूर कर देता है, जिसे शैलेंद्र नहीं कर सकते थे। शैलेंद्र इस साहित्यिक कृति में बहुत छेड़छाड़ नहीं करना चाहते थे। बाजार की जरूरतें दूसरी थी। इस बात को राजकूपर समझ रहे थे। फिल्म बनी तो बहुत ही क्लासिकल पर वह वैसा व्यवसाय नहीं कर सकी जैसी कि शैलेंद्र उम्मीद कर रहे थे। इस फिल्म की अनापेक्षित असफलता ही शैलेंद्र की मृत्यु की वजह बनी।

'तीसरी कसम' फिल्म के बनाने और उसे रिलीज करवाने में भी राजकपूर की बड़ी भूमिका थी। राजकपूर ने शैलेंद्र से यह फिल्म न बनाने की बात कही। फिर जब उन्होंने देखा कि वह इस फिल्म को लेकर बहुत उत्सुक हैं तो फिर राजसाहब ने उनकी मदद की।


राजकपूर ने इस फिल्म के लिए शैलेंद्र से उतना पारश्रिमिक भी नहीं लिया जितना कि उनका बाजार रेट था। फिल्म की शूटिंग सागर और बीना में हुई थी। वहीदा रहमान शूटिंग के बीच में ही पूरे पैसे न मिलने से नाराज हो गई थीं। वह राजकपूर के कहने पर ही दोबारा आईं। फिल्म के डिस्ट्रीब्यूशन को लेकर भी शैलेंद्र विवादों में पड़े। फिर आगे बढ़कर राजकपूर और मुकेश ने उनकी सहायता की।

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