फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Entertainment Archives ›   nandita das spoke dark skin colour bias in India

हमारे यहां रंग को लेकर हीन भावना है बरकरार: नंदिता

Thu, 19 Mar 2015 11:58 AM IST
Updated Thu, 19 Mar 2015 11:58 AM IST
विज्ञापन
nandita das spoke dark skin colour bias in India

गोरे रंग को लेकर भारतीयों की हीन भावना या चाहत जदयू नेता शरद यादव के बयान के बाद से चर्चा के केंद्र में है। हिंदी फिल्म अदाकारा नंदिता दास उन बेहद कम लोगों में से हैं जिन्होंने इसे लेकर खुलकर आवाज उठाई है।

विज्ञापन


बीबीसी संवाददाता इकबाल अहमद से बातचीत में नंदिता दास ने बचपन में सांवलेपन को लेकर कही गई बातों और भारतीय मानसिकता पर बात की है। क्या कहती हैं नंदिता दास।
विज्ञापन


खूबसूरती का खांचा
"साल 2009 से रंग भेद पर एक अभियान जारी है, 'डार्क इज ब्यूटीफ़ुल'। लेकिन 2013 में वीमेन ऑफ़ वर्थ नाम की एक स्वंयसेवी संस्था की कविता इमैनुअल ने मुझसे कहा कि मैं इस अभियान का समर्थन करूं।
विज्ञापन
विज्ञापन


मैं सामान्यत: ऐसी चीजों का समर्थन नहीं करती जिनसे मैं बहुत ज्यादा जुड़ी नहीं होती। लेकिन कई बार महसूस होता है कि अगर कुछ अच्छा हो रहा है तो हमें कम से कम उसका समर्थन तो करना ही चाहिए।

मैंने ऐसा किया तो वो बात खूब फैली, वायरल हो गई। इतने लोगों ने उसके बारे में लिखा कि मुझे लगा कि यह मुद्दा अलग से भी उठाया जा सकता है। मैंने पहले इसके बारे में नहीं सोचा था।

मैं खूद सांवली हूं

nandita das spoke dark skin colour bias in India

चूंकि मैं खूद सांवली हूं। और आप जब खुद सांवले होते हैं तो आपको बचपन से ही कोई न कोई याद दिलाता रहता है कि आपका रंग औरों से कुछ कम है। या आपसे कहा जाता है कि धूप में मत जाइए या यह क्रीम ले लीजिए।

हम जानते हैं कि सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं बहुत से मुल्कों में, कम से कम दक्षिण एशिया में रंग को लेकर हीन भावना है।

जब मैंने उस अभियान का समर्थन किया तो कई किशोर लड़कियों को लगा कि चलो कोई तो हमारे बारे में बात कर रहा है।

क्योंकि जितनी फिल्में हैं, जितने विज्ञापन हैं, जितनी ब्यूटी मैग़जीन्स हैं और टीवी सीरियल हैं, सब आपको किसी न किसी तरह से कहते रहते हैं कि आप पर्याप्त सुंदर नहीं हैं।

खूबसूरती की जो परिभाषा गढ़ी गई है अगर आप उसमें फिट नहीं हो रहे, तो फिर आपका कोई काम नहीं है।"

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed