निजी पलों को पर्दे पर उतारने में दिखाई हिम्मत
20 सितंबर, 1948 को मुंबई में पैदा हुए महेश भट्ट बचपन से ही आक्रोश से भरे व्यक्ति थे, जो तमाम रुढ़िवादी परंपराओं को तोड़ने में विश्वास रखते थे। उनकी पहली ही फिल्म मंजिलें और भी हैं अत्यंत साहसी फिल्म थी। महेश भट्ट ने भगवान रजनीश से यू.जी. कृष्णमूर्ति तक अनेक दार्शनिकों से अंतरंग संबंध बनाए रखे और साथ ही उनके प्रेम-प्रसंग भी प्रकाश में आए हैं।
ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं जो अपनी जिंदगी के निजी पलों को सार्वजनिक करते हैं, लेकिन महेश भट् इसका अपवाद हैं। उनकी अधिकतर फिल्मों में उनकी बायोग्राफी देखने को मिलती है। ‘जनम’, ‘नाम’, ‘अर्थ’, ‘जख्म’, ‘वो लम्हें’ और हमारी अधूरी कहानी... उनकी इन सभी फिल्मों की कहानियां उनके खुद (महेश भट्ट) पर या उनके माता-पिता के जीवन पर आधारित हैं।
एक इंटरव्यू में महेश ने अपने माता-पिता के संबंधों का खुलासा करते हुए बताया था कि वह बचपन में पिता के प्यार को तरसते थे। भट्ट ने कहा था, 'मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे पिता अक्सर हमारे घर आते थे, लेकिन वह घर पर रुकते नहीं थे। अपने जूते भी नहीं उतारते थे। हां, वह मेरी मां से लेकर मेरी पढ़ाई तक का पूरा खर्च उठाते थे। जब मुझसे मेरे स्कूल के दोस्त मेरे पिता के बारे में पूछते तो मैं यह नहीं कहता था कि वह बिजनेस में व्यस्त हैं, बल्कि मैं साफ कह देता था कि उनका एक दूसरा परिवार है।'
मां की मांग में सिंदूर भरा और मुंह में तुलसी के पत्ते रखे
वह आगे बताते हैं कि मेरे अंदर एक आक्रोश था, मैं सच्चई को स्वीकार करना चाहता था। मैं घंटों तक बालकनी से अपने पिता की कार की राह देखा करता था। मेरी मां हमेशा बिंदी लगाया करती थीं और उन्हें साड़ी पहनना बहुत पसंद था। उनकी मां शिरीन अपने जमाने की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में से एक थीं। उन्होंने ‘मुंबई की सेठानी’, ‘शमशीर-ए-अरब’, और ‘पासिंग शो’ जैसी अनेक फिल्मों में काम किया है। अभिनय के दौरान ही उनकी पोरबंदर (गुजरात) में रहने वाले और फिल्म निर्माता नानाभाई उर्फ बटुक भट्ट से मुलाकात हुई और दोनों में प्रेम हो गया था। दोनों लिव-इन-रिलेशन में रहने लगे, इसी दौरान ही महेश भट्ट का जन्म हुआ था, जबकि नानाभाई विवाहित थे।
महेश का कहना था कि इसके बावजूद मैंने अपने मां-बाप के बीच गजब की बॉन्डिंग देखी थी। मां की आखिरी इच्छा थी कि मैं उनका अंतिम संस्कार मुस्लिम रीति-रिवाजों से ही करूं। उनकी मृत्यु के बाद मुझे समाज से इसके लिए लड़ाई लड़नी थी। मेरे परिवार में सभी लोग इसके विरोध में थे। लेकिन मुझे अपनी मां की अंतिम इच्छा पूरी करनी थी। जब मैंने उन्हें दफन करने कब्रिस्तान में गया तो पहली बार मुझे उनका पूरा नाम ‘शिरीन मोहम्मद अली’ पता चला। मुझे यह जानकर बहुत गर्व हुआ कि मैं बहुत प्रतिष्ठित बैकग्राउंड से हूं। मेरी मां मुस्लिम थी और पिता गुजराती ब्राह्मण।
लेकिन उन दोनों ने ही सांप्रदायिकता का कभी ढोंग नहीं किया। उन दोनों के दिल में एक-दूसरे के लिए व्यक्तिगत रूप से श्रद्धा और सम्मान था। मां के अंतिम संस्कार के समय पिता घर आए। उन्होंने मां की मांग में सिंदूर भरा और मुंह में तुलसी के पत्ते रखे। इस तरह मां की मौत के बाद पिता ने उन्हें सामाजिक रूप से अपनी पत्नी घोषित किया। उन्होंने मुझे मां को कब्रिस्तान ले जाने से मना किया, लेकिन कुछ देर बाद ही कुरान की आयतों के साथ कब्रिस्तान जाने के लिए कहा। महेश ने अपने पिता को कब्रिस्तान की दीवार पर चढ़कर उनकी मां की कब्र पर एक मुट्ठी मिट्टी डालते हुए देखा था।