{"_id":"15169b5f6bca378a33c66b50c1c85d7a","slug":"interview-of-raghbeer-yadav","type":"story","status":"publish","title_hn":"हिंदुस्तान परदे पर दिखता ही कहां हैः रघुवीर यादव","category":{"title":"Entertainment Archives","title_hn":"एंटरटेनमेंट आर्काइव","slug":"entertainment-archives"}}
हिंदुस्तान परदे पर दिखता ही कहां हैः रघुवीर यादव
अमर उजाला मुंबई/ हरि मृदुल
Updated Thu, 31 Oct 2013 12:43 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
परदे पर हर रोल में अलग दिखने वाले रघुवीर यादव का मानना है कि फिल्मों से असली हिंदुस्तान गायब हो चुका है।
विज्ञापन
जाने माने अभिनेता रघुवीर यादव स्तरीय काम में यकीन करते हैं। वे क्वांटिटी से ज्यादा क्वालिटी वर्क में ध्यान देते हैं। कॉमर्शियल फिल्मों के दौर में उनका मन आज भी एक्सपेरिमेंटल फिल्मों में अधिक रमता है।
मैसी साहब, सलाम बांबे, समर और पीपली लाइव जैसी पचासों फिल्मों में काम कर चुके रघुवीर इन दिनों मैनू एक लड़की चाहिए, क्लब 60 और पॉकेट गैंगस्टर जैसी प्रयोगधर्मी फिल्मों में अभिनय कर रहे हैं।
विज्ञापन
इसमें कोई शक नहीं है कि आपकी गिनती बड़े एक्टरों में होती है, लेकिन आपके खाते में काफी कम फिल्में हैं। यह क्या विरोधाभास है?
भई, मैं जिस तरह के किरदार करना चाहता हूं, उस तरह के ऑफर मिलते नहीं हैं। मेरी आदत किसी प्रोड्यूसर की जी हुजूरी करने की है नहीं। जो काम मेरे पास आता है, मैं उसे पूरी ईमानदारी और मस्ती से करता हूं। ऊपर वाले की दया से मेरी दाल-रोटी अच्छी तरह चल रही है।
विज्ञापन
यह दौर एक्सपेरिमेंटल फिल्मों का तो नहीं है। इक्का-दुक्का फिल्में इस तरह की बन जाती हैं, लेकिन ऐसी फिल्मों को ज्यादा दर्शक नहीं मिलते?
मेरा मानना है कि हर दौर में हर तरह की फिल्में बनती हैं। हां, यह सच है कि अब समानांतर सिनेमा जैसा आंदोलन खत्म हो चुका है, लेकिन उसकी जगह छोटे बजट की बेहतरीन फिल्में तो बन ही रही हैं। नए निर्देशक कमाल का काम कर रहे हैं। मुझे इनसे ही बड़ी उम्मीदें हैं। ये लोग ही सिनेमा को आगे ले जाएंगे।
बड़े बजट की कॉमर्शियल फिल्मों के बारे में आपका क्या कहना है? हॉलीवुड को तो ये फिल्में ही टक्कर दे रही हैं?
भले ही हॉलीवुड को ये फिल्में टक्कर दें, लेकिन इनमें असली हिंदुस्तान कहीं नहीं दिखता। सब कुछ नकली लगता है। यही वजह है कि आज की फिल्मों में गांव और कस्बे गायब हो चुके हैं। असली हिंदुस्तान परदे से नदारद है।
अपनी फिल्म मैंनू एक लड़की चाहिए के बारे में बताइए? आपका किरदार कितना चुनौतीपूर्ण है?
इस फिल्म में दो वकील और एक गवाह की मजेदार कहानी है। गवाह एक लड़की है। केस जीतने के लिए वकील को इस लड़की की जरूरत है। इसी वजह से फिल्म का नाम मैंनू एक लड़की चाहिए रखा गया है।
तो आप इस फिल्म में एक वकील की भूमिका में दिखेंगे। इससे पहले तो आपने कभी वकील का किरदार नहीं निभाया है?
हां, मैं इस फिल्म में एक वकील बना हूं। सरकारी वकील बने हैं जाकिर हुसैन। हम दोनों की बड़ी भिडं़त है फिल्म में। पहली बार मैं इस तरह का किरदार निभा रहा हूं। यह मेरे लिए एक चुनौती है।
फिल्म पॉकेट गैंगस्टर के बारे में कहा जा रहा है कि यह वन शॉट फिल्म है। ऐसी प्रयोगधर्मी फिल्म आज तक नहीं बनी है?
हां, पॉकेट गैंगस्टर एक अजीब सी फिल्म है। 129 मिनट की इस फिल्म को एक ही शॉट में फिल्माया गया है। पूरी फिल्म गुवाहाटी में शूट हुई है। इसमें मेरे साथ विजय राज और शिवांगी जैसे अदाकार हैं।
आपके कई साथी कलाकार निर्देशन के मैदान में अपना हाथ आजमा चुके हैं। क्या आपके मन में नहीं आता कि कोई फिल्म निर्देशित की जाए?
डायरेक्शन काफी कठिन काम है। बड़े बड़े एक्टर इस क्षेत्र में असफल साबित हुए हैं। लेकिन मैं कुछ फिल्में जरूर निर्देशित करना चाहता हूं। शायद इस काम का अभी वक्त नहीं आया है।
आपने छोटे परदे पर अमरावती की कथाएं, मुल्ला नसीरुद्दीन, मुंगेरीलाल के हंसीन सपने और चाचा चौधरी जैसे धारावाहिकों में अभिनय किया। इधर आप किसी सीरियल में नहीं दिखे हैं?
इसके जवाब में मैं फिर वही रोना रोऊंगा कि मनपसंद का काम नहीं मिल रहा है। मैं तो एक अभिनेता हूं, मेरे लिए हर माध्यम एक समान है। लेकिन मन का काम तो मिले। मुझे पैसे तो चाहिए, लेकिन काम का आनंद भी चाहिए।