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फारुख शेखः वह नहीं तो क्या उनकी बातें तो हैं

Sun, 29 Dec 2013 07:44 AM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई Updated Sun, 29 Dec 2013 07:44 AM IST
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interview of nterview of farooq sheikh

फारुख शेख अब हमारे बीच में नहीं हैं। लेकिन उनका यह इंटरव्यू उन्हें एक बार फिर जीवित कर देता है।

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बीती छह दिसंबर को सिनेमाघरों में पहुंची फिल्म ‘क्लब 60’ में फारुख शेख लीड भूमिका निभा रहे थे। फिल्म की रिलीज के दौरान उन्होंने जिंदगी के विभिन्न पहलुओं पर ‘अमर उजाला’ से बातचीत की। ‘क्लब 60’ में भले ही वे एक हादसे का हुए शिकार पिता की भूमिका में थे, लेकिन निजी जीवन में उनकी बातों में कमाल का हौसला था।

जिंदगी कभी रुकती नहीं

पुरानी फिल्म ‘देवदास’ में दिलीप साब मोतीलाल से पूछते हैं कि क्या तुमने अपनी जिंदगी में दुख नहीं देखा? तब मोतीलाल जवाब देते हैं कि यह तो जिंदगी की बातें हैं, अब इसे हंस के गुजार लो या फिर रो कर गुजार लो। यानी ऐसा तो है नहीं कि किसी हादसे के बाद जिंदगी रुक जाती है।
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हादसे तो जिंदगी के साथ लगे ही हैं। ये समय समय पर आते हैं। ये न हों तो जिंदगी जिंदगी न रहे। अगर जिंदगी में सिर्फ खुशियां ही हों तो सोचिए कि यह कितनी सपाट हो जाएगी। सुबह को हम इसीलिए पसंद करते हैं कि वह रात के बाद आती है।
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बढ़ी उम्र की आसान राहें
सबसे मुख्य बात है आपकी सेहत। अगर आपको चलने-फिरने, देखने-सुनने में कोई दिक्कत नहीं है तब बाकी समस्याएं कोई खास नहीं है क्योंकि इस उम्र तक आपके पास इतना तजुर्बा आ चुका होता है कि आप मुश्किलों से निकलना काफी हद तक जान चुके होते हैं। आप जानते हैं कि फलां रास्ते से कैसे गुजरना है। इस उम्र में आप ऐसी कई गलतियां करने से बच जाते हैं जो जवानी के दिनों में आसानी से कर जाते हैं।

कुछ नहीं करने में भी मजा है

मैं बहुत चुनिंदा फिल्मों में काम करता हूं। साल में एक या फिर दो साल में एकाध फिल्म करता हूं। मुझे लगता है कि कुछ न करना भी एक बड़े मजे का काम है और मैं उसके बड़े मजे लूटता हूं! मैं अपने आप को और अपने परिवार को पूरा वक्त देता हूं।


बदलाव के पक्ष में
दर्शक नए सिनेमा की मांग कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि आप हमें ऐसा कुछ दीजिए कि जिसे देख कर हम हॉल से बाहर आएं तो उसकी बातें दिमाग में रह जाएं। ऐसी दिलचस्प फिल्में बनाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसके बावजूद कॉमर्शियल सिनेमा की अहमियत अपनी जगह है।

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