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'जज्बात हर जगह हैं एक से'
Updated Sat, 20 Sep 2014 01:09 PM IST
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शेक्सपियर की क्लासिक ट्रेजेडी 'मेकबेथ' से प्रेरित है उनकी प्रस्तुति 'मेडबेथ'। अपनी इस कृति में उन्होंने कुछ ऐसे बदलाव किए हैं, जिससे दर्शक हंसी से लोटपोट हो जाते हैं। रूपेश बताते हैं, 'आम लोगों से जुड़ने के लिए मैंने इस क्लासिक रचना को समकालीन बनाने का प्रयास किया है।' पिछले महीने गुड़गांव के एपीसेंटर में उन्होने अपने चर्चित शो मेडबेथ की प्रस्तुति दी थी। स्लेपस्टिक, एक्रोबेटिक्स, माइम और म्यूजिक शो से सजी यह प्रस्तुति देखकर लोग बेहद रोमांचित हो उठे। यही नहीं, रूपेश ने बहुत से दर्शकों को भी स्टेज पर बुलाकर प्रस्तुति का हिस्सा बनाया था।
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'16 साल में 18 बार बदला घर'
रूपेश ने स्वीडन के स्टॉकहोम के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रेमेटिक आर्ट्स से उन्होंने फिजिकल कॉमेडी में स्पेशलाइजेशन किया है। स्वीडन के ही 'क्लाउन विदाउट बॉर्ड्स' से उन्होंने क्लाउनिंग की भी ट्रेनिंग ली थी। लेकिन मुंबई के गिरगांव में जन्मे रूपेश का बचपन मुश्किलों में बीता। उनके माता-पिता दोनों मुंबई की स्वास्तिक ऑयल मिल में काम करते थे और 80 के दशक की हड़ताल के दौरान उनकी नौकरी छूट गई। आर्थिक दिक्कतों के बीच 16 साल की उम्र तक रूपेश ने परिवार ने 18 बार घर बदला।
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'हंसाया वॉरजोन में रह रहे बच्चों को'
बचपन से ही रूपेश की थिएटर में रुचि थी। साल 2003 में उनकी मुलाकात थिएटर आर्टिस्ट केफास बर्लिन से हुई, जो मसूरी और देहरादून में कैंप लगा रहे थे। कैफाज के साथ उनकी इतनी जमी कि बिजनेस का काम छोड़कर रूपेश प्रशिक्षण के लिए स्वीडन रवाना हो गए। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उन्होंने स्वीडन के लावा थिएटर में नौकरी की और यूरोप के अलग-अलग देशों में वर्कशॉप अटेंड कीं। क्लाउंनिंग की ट्रेनिंग के बाद वह वॉरजोन और मुश्किल हालात में रह रहे गरीब बच्चों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने के लिए जाते थे।
'जो जज्बा भारतीयों में है, वह और कहीं नहीं'
9 साल बाद मुंबई वापस आकर एक बार फिर से वे अपने लिए जमीन तलाश रहे हैं। वह कहते हैं, 'भारत में असीम संभावनाएं हैं। मैंने बहुत से देशों के युवाओं को देखा और जाना। लेकिन संघर्ष का जो जज्बा भारतीय युवाओं में है, वह कहीं और देखने को नहीं मिलता। भारत के निवासी दुनिया में कहीं भी जाएं, अपना अस्तित्व कायम रख सकते हैं।'
'अहम भूमिका निभा सकते हैं कलाकार'
रूपेश मानते हैं कि कलाकार अगर पहल करें, तो समाज को आगे ले जाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसी तरह की एक पहल उन्होंने खुद की है। उन्होंने साल के 20 दिन मुंबई के एक रेड लाइट एरिया कामाठीपुरा के बच्चों के साथ बिताने का फैसला किया है। उनका मानना है कि थिएटर के लिए सरकार की तरफ से फंडिंग होनी चाहिए, तभी इस माध्यम का सही मायनों में उपयोग किया जा सकता है। दुनिया के तमाम देश घूमने और वहां के लोगों से भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाने के बाद पूरी दुनिया उन्हें अपनी सी लगती है।
'आत्मीयता से जुड़ते हैं लोग'
फिजिकल थिएटर और क्लाउनिंग में प्रशिक्षित 33 वर्षीय रूपेश टिल्लू ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने थिएटर करते हुए दुनिया के कई देशों की सैर की, लेकिन हर जगह उन्होंने यही महसूस किया कि लोगों चाहें जिस भी देश के हों, उनके जज्बात एक से होते हैं। अगर आप उनसे रिश्ता जोड़ना चाहें, तो वे आपको गले लगा लेते हैं। फिलहाल रूपेश मुंबई रहते हैं और अपनी प्रस्तुतियां देने के लिए आगामी 29 सितंबर को स्वीडन रवाना हो रहे हैं। 6 नवंबर को वापसी के बाद मुंबई में वह अपनी नियमित प्रस्तुतियां देंगे।