फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Entertainment Archives ›   interview of ketan mehta

इस 'शोले' में उस 'शोले' से अलग क्या

Thu, 02 Jan 2014 05:13 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई Updated Thu, 02 Jan 2014 05:13 PM IST
विज्ञापन
interview of ketan mehta

'शोले' जिन चुनौतियों के साथ बनीं उससे ज्यादा चुनौतियां उसे 3डी फॉर्मेट में बदलने की थीं। पढ़िए ये हैरतअंगेज कहानियां।

विज्ञापन


दो राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके निर्देशक केतन मेहता का ‘शोले’ से क्या संबंध है? इस फिल्म पर पड़ी वक्त की धूल को झाड़ने के साथ उनकी कंपनी ने इसे 3डी फॉरमेट में भी बदला है। क्या चुनौतियां थीं इस काम में और अपनी नई फिल्म के साथ केतन कब आएंगे दर्शकों के बीच।

आपकी कंपनी माया डिजिटल स्टूडियो ने ‘शोले’ को 3डी फॉरमेट में परिवर्तित किया। यह कितना मुश्किल और चुनौती भरा था?

‘शोले’ हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर है। इस फिल्म को 3डी में परिवर्तित करना बड़ी चुनौती थी क्योंकि यह 38 साल पुरानी फिल्म है। फिल्म का नेगेटिव भी धुंधला पड़ने लगा था। हमसे पहले उसका डिजटलीकरण किया, उसके रंगों में सुधार किया। उसके बाद उसे 3डी में परिवर्तित किया।
विज्ञापन


यह तीन घंटे से ज्यादा लंबी फिल्म है। इस काम की कठिनाई का अनुमान आप ऐसे लगा सकते हैं कि एक फिल्म के एक सेकेंड में 24 फ्रेम होते हैं। इस फिल्म के लिए हमारे सामने दो लाख 85 हजार से ज्यादा फ्रेम थे। हमने एक-एक फ्रेम पर काम किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


मुझे नहीं लगता कि अभी तक दुनिया के किसी कोने में किसी एक फिल्म के डिजिटलीकरण और 3डीकरण पर इतना काम हुआ। ढाई सौ लोगों की टीम एक साल से ज्यादा समय तक इस फिल्म पर लगातार काम करती रही।

कंप्यूटर एनिमेशन और रियल इफेक्ट्स के हॉलीवुड के मास्टर समझे जाने वाले फ्रेंक फॉस्टर के सुपरविजन में इस टीम ने काम किया। आज मुझे इस काम पर गर्व है।

यह काम पूरी तरह तकनीकी होते हुए भी इसके कुछ रचनात्मक पक्ष जरूर रहे होंगे। उनके बारे में बताएं।


जी हां, हमारे सामने तो बनी हुई फिल्म थी। लेकिन इसमें किन दृश्यों में कितनी गहराई प्रदान की जाए, कौन सी और कितनी चीजों को किस प्रकार हवा में उड़ते दिखा जाए जिसके दर्शकों को उसका 3डी इफेक्ट मालूम पड़े, उन्हें लगे कि सब आसपास घट रहा है। यह फैसले रचनात्मकता की मांग करते थे।

और फिल्म का साउंड?

उसे भी नया बनाया गया है। फिल्म का संगीत भी पूरा नया है। हमने एक नई तकनीक का इस्तेमाल किया है, जिसमें दर्शकों को महसूस होगा कि आवाजें उनके आसपास पैदा हो रही हैं। जिन्होंने पहले यह फिल्म देखी है, वे खूब अच्छे यह बदलाव महसूस कर सकेंगे।

नई पीढ़ी 1975 की इस फिल्म से खुद को कितना जोड़ पाएगी?

मुझे पूरा यकीन है कि नई पीढ़ी भी यह फिल्म देखेगी और पसंद करेगी। ‘शोले’ केवल अपने वक्त की ही नहीं, भारत में हर काल में बनी महत्वाकांक्षी फिल्मों में से एक है।

‘शोले’ को आपने सबसे पहले कब देखा था?


जब मैं फिल्म इंस्टीट्यूट में स्टूटेंड था। उसी वक्त मुझे लगा था कि मेकर ने बहुत बड़ी चुनौती की लेकर यह फिल्म बनाई है। निर्देशक रमेश सिप्पी ने उस जमाने में 70एमएम में यह फिल्म बनाई थी। जो तब की नई तकनीक थी। उस वक्त वे साउंड नया लाए थे। अंतरराष्ट्रीय तकनीशियनों ने इस फिल्म पर काम किया था।

रमेश सिप्पी इस बात से नाखुश हैं कि मूल फिल्म से किसी तरह की छेड़छाड़ की जाए।

इस मामले में हम कोई पक्ष नहीं हैं। हम फिल्म निर्माताओं के लिए काम कर रहे हैं और एक कंपनी के रूप में हमारा काम ग्राहक को अपनी सेवा देना है।

-क्या फिल्म को लेकर आपका रमेश सिप्पी से कोई रचनात्मक संवाद हुआ?

बिल्कुल नहीं। हमारे पास काम आया और हमें उस एक तय समय सीमा में करके देना था।

2005 में आपकी ‘मंगल पांडेः द राइजिंग’ आई। उसके बाद आपने ‘रंग रसिया’ बनाई मगर वह रिलीज नहीं हुई। अपनी फिल्म के साथ आप कब सिनेमाघरों में आएंगे?

इस साल। 2014 में के शुरुआती महीनों में। ‘रंग रसिया’ विवादों में फंस गई थी, इस कारण रिलीज नहीं हो सकी। लेकिन अब विवाद खत्म हो गया है। अतः फिल्म इस साल रिलीज होगी।


यह 19वीं सदी के विख्यात पेंटर राजा रवि वर्मा के जीवन पर है। साथ ही मेरी नई फिल्म ‘मांझीः द माउंटेनमैन’ भी आएगी। इसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी दशरथ मांझी का रोल कर रहे हैं। मांझी ने बिहार में अकेले एक पहाड़ को काट कर सड़क तैयार कर दी थी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed