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अपनी नज़्मों की तरह खुलते ही गए गुलजार
बृजेश सिंह/नेशनल ब्यूरो
Updated Sat, 03 May 2014 11:30 AM IST
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आज गुलजार को फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा जाएगा। पढ़िए उनसे अंतरंग बातचीत।
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फिल्मों से समाज नहीं, समाज से फिल्में चलती हैं। यह मानना है अपने गीतों से हर वर्ग के दिलों पर राज करने वाले मशहूर गीतकार गुलजार का। शब्दों के जादूगर गुलजार का कहना है कि फिल्में समाज केआईने की तरह हैं। जो समाज में चल रहा होता है, उसे फिल्मों में ज्यादा प्रभावी तरीके से दिखाया जाता है।
‘जंगल-जंगल पता चला है, चड्ढी पहनकर फूल खिला है’ से लेकर ‘दिल तो बच्चा है जी’ और ’बीड़ी जलई ले जिगर से पिया’ गाने इस शख्सियत की पहचान हैं। समय की मांग पर गुलजार ने खुद को बदला है। वे कहानी के जादूगर मुंशी प्रेमचंद के दीवाने हैं। इसीलिए वह शुक्रवार को दिल्ली स्थित दूरदर्शन भवन पहुंचे।
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मौका था उनके द्वारा मुंशी प्रेमचंद की कहानी गोदान और निर्मला पर निर्देशित नाटकों की री लांचिंग का। दोनों नाटक पहली बार 2004 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुए थे। गुलजार को शनिवार को विज्ञान भवन में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा जाएगा। प्रेमचंद की कहानी पर निर्देशित नाटकों की री लांचिग के मौके पर गुलजार ने मीडिया के सवालों का हल्के फुल्के अंदाज में जवाब दिया।
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दादा साहब फाल्के पुरस्कार को आप किस तरह देखते है?
यह अभी तक मेरे लिए सर्वोच्च सम्मानों में से एक है। मुझे इस काबिल समझा गया यह मेरे लिए खुशी की बात है।
लंबे सफर में कुछ ऐसा है जिसे न कर पाने का आपको मलाल हो?
मुझे नहीं लगता कि मैंने अभी तक कुछ ऐसा नहीं किया, जिसका मुझे मलाल हो। मैंने जो किया है, उससे संतुष्ट हूं। आगे अगर मुझे कुछ मिला और मैं नहीं कर पाया तो उसका मलाल जरूर रहेगा।
फिल्मों के गानों में शब्दों के चयन को आप कैसे देखते हैं। खुद को कैसे एडजस्ट किया?
बदलाव फिल्म में नहीं, समाज में आया है। फिल्में समाज का आईना हैं। जो समाज में चल रहा होता है, फिल्में उसे लाउड तरीके से दिखाती हैं। समाज के वायलेंस में कोई बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं होता है। ‘बीड़ी जलई ले’ जैसे गाने फिल्म की कहानी की मांग हैं। उस समय अगर ‘मोरा श्याम रंग लई ले’ डालेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा।
नए दौर में नए गायकों को आप कैसे देखते हैं?
मौजूदा दौर में बहुत से अच्छे लोग काम कर रहे हैं। मैंने भी उनके साथ काम किया है। एआर रहमान हों या शंकर एहसान लॉय सभी अच्छा काम कर रहे हैं। मुझे उनका साथ मिला और मैं भी तभी बढ़िया कर पाया। उन्हें भी लगता है उन्हें मेरा साथ मिला। बस सभी मिलकर अपना काम कर रहे हैं। जरूरत है समय की मांग के साथ अपने को री-इंवेंट करने की।
निर्देशन के क्षेत्र में आगे काम करने की कोशिश क्यों नहीं की। अपनी लिखी कहानी पर फिल्म लाने की कोई योजना?
मैं जो कर रहा हूं, क्या वह आपको अच्छा नहीं लग रहा? मैं जो कर रहा हूं, उससे संतुष्ट हूं। मैंने दूरदर्शन के नाटकों के अलावा माचिस, हू-तू-तू जैसी फिल्म की कहानी भी लिखी हैै। फिलहाल मैं जो कर रहा हूं, उससे खुश हूं। आगे की बाद में देखी जाएगी।