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हादसे न हों तो जिंदगी कैसीः फारुख शेख
रवि बुले/अमर उजाला,मुंबई
Updated Wed, 04 Dec 2013 02:17 PM IST
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शुक्रवार को रिलीज हो रही निर्देशक संजय त्रिपाठी की फिल्म ‘क्लब 60’ में फारुख शेख और सारिका मुख्य भूमिकाओं में हैं। पेश है फारुख शेख से बातचीत के अंश...
आप 67 के हो रहे हैं। ‘क्लब 60’ उन लोगों की कहानी है जिनके पास जीवन के गंभीर अनुभव हैं। क्या फलसफा है इसके पीछे?
यह कहानी एक डॉक्टर दंपति की जिंदगी में हुए हादसे की है। फिल्म ‘देवदास’ में दिलीप साब मोतीलाल से पूछते हैं कि क्या तुमने अपनी जिंदगी में दुख नहीं देखा? उस जमाने में डायलॉग राइटिंग कमाल की होती थी।
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मोतीलाल जवाब देते हैं कि यह तो जिंदगी की बातें हैं, अब इसे हंस के गुजार लो या फिर रो कर गुजार लो। यह फिल्म भी कुछ इसी फलसफे को लेकर बढ़ती है। ऐसा तो है नहीं कि किसी हादसे के बाद जिंदगी रुक जाती है या एक उम्र को बाद आदमी हंसना-रोना-मुस्कराना भूल जाता है।
क्या आपकी जिंदगी में कभी ऐसा हादसा गुजरा कि लगा हो अब सब खत्म हो गया?
हादसे तो जिंदगी के साथ लगे ही हैं। ये समय समय पर आते रहते हैं। ये न हों तो जिंदगी जिंदगी न रहे। अगर जिंदगी में सिर्फ खुशियां ही हों तो सोचिए कि यह कितनी सपाट हो जाएगी। सुबह को हम इसीलिए पसंद करते हैं कि वह रात के बाद आती है।
60 की उम्र जीवन एक खास पड़ाव मानी जाती है। आप इसके पार खड़े हैं। आम तौर इस उम्र की क्या मुश्किलें हैं?
सबसे मुख्य बात है आपकी सेहत। अगर आपको चलने-फिरने, देखने-सुनने में कोई दिक्कत नहीं है तब बाकी समस्याएं कोई खास नहीं है क्योंकि इस उम्र तक आपके पास इतना तजुर्बा आ चुका होता है कि आप मुश्किलों से निकलना काफी हद तक जान चुके होते हैं।
आप जानते हैं कि फलां रास्ते से कैसे गुजरना है। इस उम्र में आप ऐसी कई गलतियां करने से बच जाते हैं जो जवानी के दिनों में आसानी से कर जाते हैं।
हिंदी सिनेमा बदल रहा है। कॉमर्शियल और कला फिल्मों के बीच का सिनेमा इधर जमने लगा है। उसे दर्शक मिल रहे हैं। इसे आप किस तरह से देखते हैं?
दर्शक नए सिनेमा की मांग कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि आप हमें ऐसा कुछ दीजिए कि जिसे देख कर हम हॉल से बाहर आएं तो उसकी बातें दिमाग में रह जाएं।
ऐसी दिलचस्प फिल्में बनाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसके बावजूद कॉमर्शियल सिनेमा की अहमियत अपनी जगह है।
आपने समाज में आम आदमी की सहज छवि को पर्दे पर जीवंत किया। लेकिन राजनीतिक सोच को कभी प्रकट नहीं किया। किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े। ऐसा क्यों?
मैं कभी इसलिए राजनीतिक पार्टी नहीं जुड़ा कि कोई भी पार्टी आपको इख्तियार नहीं देती कि उसकी कमजोरी बताएं। चुनाव के दौरान ये पार्टियां कुछ सितारों को ले जाती हैं।
प्रचार करने के पैसे भी देती हैं। अगर यही करना हो तो मैं डोर-टू-डोर सेल्समैन बनना बेहतर समझूंगा।
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आप 67 के हो रहे हैं। ‘क्लब 60’ उन लोगों की कहानी है जिनके पास जीवन के गंभीर अनुभव हैं। क्या फलसफा है इसके पीछे?
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यह कहानी एक डॉक्टर दंपति की जिंदगी में हुए हादसे की है। फिल्म ‘देवदास’ में दिलीप साब मोतीलाल से पूछते हैं कि क्या तुमने अपनी जिंदगी में दुख नहीं देखा? उस जमाने में डायलॉग राइटिंग कमाल की होती थी।
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मोतीलाल जवाब देते हैं कि यह तो जिंदगी की बातें हैं, अब इसे हंस के गुजार लो या फिर रो कर गुजार लो। यह फिल्म भी कुछ इसी फलसफे को लेकर बढ़ती है। ऐसा तो है नहीं कि किसी हादसे के बाद जिंदगी रुक जाती है या एक उम्र को बाद आदमी हंसना-रोना-मुस्कराना भूल जाता है।
क्या आपकी जिंदगी में कभी ऐसा हादसा गुजरा कि लगा हो अब सब खत्म हो गया?
हादसे तो जिंदगी के साथ लगे ही हैं। ये समय समय पर आते रहते हैं। ये न हों तो जिंदगी जिंदगी न रहे। अगर जिंदगी में सिर्फ खुशियां ही हों तो सोचिए कि यह कितनी सपाट हो जाएगी। सुबह को हम इसीलिए पसंद करते हैं कि वह रात के बाद आती है।
60 की उम्र जीवन एक खास पड़ाव मानी जाती है। आप इसके पार खड़े हैं। आम तौर इस उम्र की क्या मुश्किलें हैं?
सबसे मुख्य बात है आपकी सेहत। अगर आपको चलने-फिरने, देखने-सुनने में कोई दिक्कत नहीं है तब बाकी समस्याएं कोई खास नहीं है क्योंकि इस उम्र तक आपके पास इतना तजुर्बा आ चुका होता है कि आप मुश्किलों से निकलना काफी हद तक जान चुके होते हैं।
आप जानते हैं कि फलां रास्ते से कैसे गुजरना है। इस उम्र में आप ऐसी कई गलतियां करने से बच जाते हैं जो जवानी के दिनों में आसानी से कर जाते हैं।
हिंदी सिनेमा बदल रहा है। कॉमर्शियल और कला फिल्मों के बीच का सिनेमा इधर जमने लगा है। उसे दर्शक मिल रहे हैं। इसे आप किस तरह से देखते हैं?
दर्शक नए सिनेमा की मांग कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि आप हमें ऐसा कुछ दीजिए कि जिसे देख कर हम हॉल से बाहर आएं तो उसकी बातें दिमाग में रह जाएं।
ऐसी दिलचस्प फिल्में बनाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसके बावजूद कॉमर्शियल सिनेमा की अहमियत अपनी जगह है।
आपने समाज में आम आदमी की सहज छवि को पर्दे पर जीवंत किया। लेकिन राजनीतिक सोच को कभी प्रकट नहीं किया। किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े। ऐसा क्यों?
मैं कभी इसलिए राजनीतिक पार्टी नहीं जुड़ा कि कोई भी पार्टी आपको इख्तियार नहीं देती कि उसकी कमजोरी बताएं। चुनाव के दौरान ये पार्टियां कुछ सितारों को ले जाती हैं।
प्रचार करने के पैसे भी देती हैं। अगर यही करना हो तो मैं डोर-टू-डोर सेल्समैन बनना बेहतर समझूंगा।