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अर्जुन कपूर से जानिए गुंडे, रणवीर और प्रियंका के बारे में

Thu, 06 Feb 2014 08:31 AM IST
Updated Thu, 06 Feb 2014 08:31 AM IST
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interview of arjun kapoor
रणवीर सिंह से आपकी दोस्ती पर सबकी नजरे हैं। कहां से हुई इस दोस्ती की शुरुआत?
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रणवीर से मेरी पहचान सात-आठ साल पुरानी है। तब हम ऐक्टर नहीं थे। मैं डायरेक्टर बनना चाहता था और वह ग्रेजुएट हो जाने के बाद ऐक्टिंग में आने की तैयारी कर रहा था। पार्टियों में मिलते थे। फिल्मी सर्किल छोटा सा है। बहुत सारे दोस्त कॉमन थे। हम दोनों में एक बात समान थी कि हमें नाचना बहुत अच्छा लगता था।

1970-80 के दौर के गानों पर। हम दोनों का ही फेवरेट गाना था, धिना धिन ना... माई नेम इज लखन। जब मिलते थे तो वह गाना जरूर बजाते और नाचते थे। तब नहीं पता था कि छह-सात साल बाद उसी 1970-80 के दौर की एक फिल्म बनेगी और हम उसमें साथ काम करेंगे।
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हालांकि उस जान-पहचान के दिनों को दोस्ती नहीं कह सकते, लेकिन हां एक-दूसरे को लेकर सकारात्मक सोच थी। जब ‘गुंडे’ का हमें साथ में नरेशन दिया गया और तय हुआ कि साथ काम करेंगे, तब बात बढ़ी। काम करते-करते दोस्ती भी परवान चढ़ी।
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रणवीर में आपको क्या ऐसी बातें दिखी कि यह दोस्ती गहरी हो गई?

यह तो बता नहीं सकता। बस नजदीक रहते रहते लगाव गहरा हो जाता है। हम लोग एक-दूसरे के साथ बहुत कंफर्टेबल महसूस करते हैं। वैसे कोई भी अपनी दोस्ती को डिफाइन नहीं कर सकता कि वह क्यों किसी का दोस्त है। मैं बहुत प्राइवेट पर्सन हूं और अपनी लाइफ या दोस्तों पर ज्यादा बात नहीं करता।

डर लगता है कि कहीं इस दोस्ती को किसी की नजर न लग जाए। कई लोगों को लगता है कि हम ‘गुंडे’ के प्रमोशन के लिए दिखावा कर रहे हैं, लेकिन मैं कहता हूं कि किसी में इतनी ताकत नहीं है कि दिखावे की इतनी जबर्दस्त ऐक्टिंग कर सके। कुछ करिश्मे बस हो जाते हैं।

क्या कर रहे हैँ विक्रम और बाला

interview of arjun kapoor

आपसे अपने इस दोस्त की खूबियां गिनाने को कहा जाए तो क्या बताएंगे

वह बहुत ही पॉजिटिव इंसान है। किसी के बारे में नेगेटिव बात नहीं करता। हमेशा आपको हंसाता है। आप कितने ही टेंशन में हों, वह टेंशन दूर कर देगा। वह फिल्मों का दीवाना है। काम को लेकर बहुत पैशनेट है।

फिल्म में आप बाला बने हैं और रणवीर बिक्रम। कहानी इन्हें गुंडा कहती है। ये किरदार कैसे एक-दूसरे के पूरक हैं?

बिक्रम और बाला एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक-दूसरे के बिना अधूरे। बिक्रम अगर बाला की जिंदगी में नहीं होता तो बाला एकदम काला होता यानी पक्का विलेन। वह बच्चा है। कान का कच्चा है। हिंसक है। किसी की नहीं सुनता। सिर्फ बिक्रम की सुनता है। बिक्रम उसका मां-बाप-भाई सब कुछ है।

दोनों का रिश्ता कमाल का है। ये दोनों अनाथ-रिफ्यूजी बच्चे हैं जो अपना वजूद तलाश रहे हैं। इस तलाश में वे सिस्टम से टकराते हैं। वे कोयले से भरी ट्रेन लूटने से शुरुआत करते हैं और कलकत्ता के बहुत बड़े गुंडे बन जाते हैं।

प्रियंका बारे में क्या कहूं

interview of arjun kapoor

फिल्म में प्रियंका चोपड़ा आप दोनों की हीरोइन हैं। सीनियर हैं। सीनियर ऐक्टर के साथ काम करना किस तरह से मदद करता है?

सीधे तो नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से मदद करता है। आपको पता होता है कि आपका सीनियर एक अलग लेवल पर ऐक्टिंग कर रहा है। ऐसे में आपको अपना लेवल बढ़ाना पड़ता है। इस तरह के आप ग्रो करते हैं। अगर आप सचिन तेंदुलकर को बॉलिंग करेंगे तो अपनी तरफ से अच्छी से अच्छी बॉल फेंकेंगे, नहीं तो सिक्सर पड़ेगा। प्रियंका के साथ काम करना हम लोगों के लिए सचिन को बॉलिंग करने जैसा था।

इरफान फिल्म में बिक्रम और बाला से निपटते हैं। उनसे क्या सीखा?

वो तो कमाल हैं। कहना ही क्या। फिल्म की शूटिंग का मेरा पहला ही दिन इरफान के साथ था। मैं हक्का-बक्का रह गया। डायरेक्टर अली जफर ने जब मुझे बताया कि इरफान के साथ शूट करना है तो मैंने बच्चे कहा कि बच्चे की जान ले लो। इरफान को ऐक्टिंग करते देखना ही अपने आप में ऐक्टिंग की पढ़ाई करने के जैसा है। जैसी बारीकियां उनकी ऐक्टिंग और संवाद अदायगी में होती है वह कोई स्कूल नहीं सिखा सकता। जितने दिन उनके साथ काम किया कुछ न कुछ नया मेरे भीतर जुड़ता गया।

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