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'बेशरम' में बेशरमी नहीं हैः अभिनव कश्यप
अमर उजाला मुंबई/ रवि बुले
Updated Tue, 01 Oct 2013 03:42 PM IST
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पहली फिल्म ‘दबंग’ से बॉक्स ऑफिस पर धाक जमाने वाले निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप अपनी दूसरी फिल्म ‘बेशरम’ के साथ बुधवार को बॉक्स ऑफिस पर आ रहे हैं। ‘दबंग’ कामयाब रही, लेकिन उसकी कुछ आलोचनाएं भी हुईं। ‘बेशरम’ को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
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फिल्म इंडस्ट्री दिन पर दिन ‘बेशरम’ हो रही है। फिल्मों में गालियां, चुंबन और सेक्स के दृश्य, अश्लील कॉमेडी लगातार बढ़ रही है। क्या कहेंगे?
देखिए हर चीज के दो पहलू होते हैं। समाज में बहुत सारी बातों पहले दबी-छुपी होती थीं। अब वे खुल कर सामने आने लगी हैं। आप जिस ओर इशारा कर रहे हैं, वे बातें जिन फिल्मों में दिखाई गईं वे कामयाब रही हैं। अब इसे क्या कहेंगे। मुझे लगता है कि समय आ गया है, जब हम मुद्दों पर खुल कर चर्चा करें। चर्चा होगी तभी समस्याओं का समाधान भी निकलेगा।
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ऐसे खुलेपन का ही नतीजा है कि महिलाओं के खिलाफ इधर अपराध बढ़े हैं।
आप देखिए कि चीजों के बदलने और बहस होने के कारण ही महिलाएं आज अपने खिलाफ होने वाले अपराधों को दर्ज करा रही हैं। वे चुप नहीं हैं। पब्लिक भी उन्हें न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतरने लगी है। फास्ट ट्रेक कोर्ट बन रहे हैं। सरकार और व्यवस्था पर न्याय प्रक्रिया तेज करने का दबाव बनने लगा है।
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मुझे लगता है कि यह आने वाले समय के बारे में भी संकेत है कि अब कोई चुप नहीं बैठेगा। हर विषय पर बातचीत होगी। चर्चा होगी। वाद-विवाद होगा।
आपकी फिल्म (दबंग) के गाने ‘मुन्नी बदनाम हुई...’ की आड़ में कई जगहों पर छेड़छाड़ की घटनाएं हुईं...। इस गाने की काफी आलोचना हुई।
आलोचना करने वाला बहुत थोड़े लोग हैं। सच्चाई यह है कि आम जनता को गाना बहुत पसंद आया। म्यूजिक बिक्री के रिकॉर्ड बताते हैं कि यह पिछले एक दशक का सबसे पापुलर गाना है। यदि इससे अपराध बढ़ता तो क्यों यह इतना लोकप्रिय होता? क्यों लोग इसे सुनते?
मुझे लगता है कि वल्गेरिटी (अश्लीलता) की परिभाषा बदल रही है। दुनिया उसी रंग की नजर आती है, जिस रंग का आप चश्मा पहनते हैं। ‘मुन्नी बदनाम...’ और ‘फेविकोल...’ गीतों को लेकर भी मामला ऐसा ही है।
‘बेशरम’ में किस तरह की बेशरमी है?
इस फिल्म में बेशरमी सेक्सुअल नहीं है। यहां मैंने यह कहने की कोशिश की है कि अगर जुनून की हद तक आप किसी चीज का पीछा करें तो दुनिया आपको बेशरम कहती है।
लेकिन अगर आप सच्चे हैं तो आपको दुनिया को सुनने की जरूरत नहीं। कहते हैं कि ‘सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग’। मैं यही बताने की कोशिश कर रहा हूं कि सिर्फ दिल की सुनें। दूसरों की सुन कर रुक जाएंगे तो आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
‘दबंग’ में आपने पुलिसवाले की कहानी कही, ‘बेशरम’ में चोर की कहानी कह रहे हैं। ठीक उलट क्यों चले गए?
मैं हमेशा चीजों को दोनों तरफ से देखना चाहता हूं। गिलास आधा खाली है तो आधा भरा भी है। वैसे आपको बताऊं कि पुलिस और चोर को लेकर मेरा कोई आइडिया नहीं था। सच यह है कि मेरे को-राइटर राजीव बरनवाल ‘बेशरम’ की कहानी लाए थे और इसने मुझे अपील किया।
यह शायद इसलिए कि पिछली फिल्म में मैंने पुलिस के नजरिये से दुनिया देखी थी, सो बार चोर के नजरिये से देखना मुझे रोमांचक लगा। कहानी भले ही यह चोर की हो, मगर फिल्म का वन लाइन मैसेज है कि गलत काम करने का कोई तरीका सही नहीं हो सकता।
‘दबंग’ के बाद आपने फिर एक्शन-कॉमेडी बनाई। यह दोहराव क्यों?
यह बाजार की मांग है। बनाने को तो मैं बहुत कुछ बनाना चाहता हूं। जो लोग मेरी फिल्म में पैसा लगाते हैं वे कहते हैं कि भाई तुम जो अच्छा करते हो वही करो, नया प्रयोग करने की जरूरत नहीं है। फिल्म मेरा बिजनेस है। रोजी-रोटी है।