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जब धर्मेंद्र को रेल के टीटी से दोस्ती करनी पड़ी

Mon, 10 Feb 2014 08:59 AM IST
रामकृष्ण
रामकृष्ण Updated Mon, 10 Feb 2014 08:59 AM IST
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flashback concern with dharmendra

इन किस्से से धर्मेंद्र के चाहने वाले भी अनजान होंगे। यह धर्मेंद्र का एक नया चेहरा पेश करता है।

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उन दिनों हम तीन लोग अधिक समय साथ ही रहा करते थे, इसलिए हमारे दोस्तों ने उस समूह का नामकरण कर दिया था - `तीन तिलंगे’। इन तिलंगों में मैं स्वयं था, धर्मेंद्र थे और तीसरा था हमारे लिए पीर-बावर्ची और भिश्ती के रोल एक साथ अदा करने वाला युवा रंगरूट दीनानाथ शास्त्री उर्फ बलवीर।

मेरे पास रहने का ठिकाना था, लेकिन खाने भर के पैसे नहीं थे। धर्मेंद्र के पास थोड़े बहुत पैसे तो थे, लेकिन रात बिताने के लिए कोई छत नहीं थी और बलवीर इन सहूलियतों से पूरी तरह बेखबर `आज यहां कल वहां’ की कहावत को चरितार्थ करता था।
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मैं तब लेखन और पत्रकारिता के गलियारे को समझने-बूझने में लगा हुआ था। अपने मनचाहे ध्येय को पाने में मुझे खुद भले ही पूरी कामयाबी न मिल पाई हो, लेकिन मेरे वह दो साथी अपने मंतव्य में भरपूर सफल रहे। धर्मेंद्र नामी फिल्मस्टार होकर हेमा मालिनी जैसी अभिनेत्री के अंकशायी बन गए।
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बलवीर ने कालान्तर में `धरती कहे पुकार के’ जैसी फिल्म का निर्माण कर यह सिद्ध कर दिया कि मामूली आदमी भी ऐसी फिल्म बना सकता है। उन दिनों हम तीनों को पूरे दिन  आगे बढ़ने की राह ढूढ़नी पड़ती थी। कोढ़ में खाज की बात यह कि हम तीनों अपने को अफलातून समझते थे और लोकल ट्रेन में फर्स्ट क्लास के नीचे सफर करना हमें हर्गिज मंजूर नहीं था।

प्रख्यात कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु को लेकर एक दिन हमें किंग्स सर्किल जाना था, जहां कथाकार महीप सिंह ने उनके स्वागत में एक गोष्ठी आयोजित की थी। रेणु के पास तो रेल टिकट था, लेकिन हम तीनों टिकट बगैर ही गाड़ी में चढ़ गए थे। यों बांद्रा से वी.टी. जाने वाली हार्बर लाइन सेन्ट्रल रेलवे की उस लाइन पर आमतौर पर चेकिंग नहीं होती थी, लेकिन उस दिन एक टीटी वहां अवतरित हो गया।

उसके काले कोट पर उसका नाम भी चस्पां था -एस.पी. पांडे। मुंबई में देशपांडे नामके तो अनेक लोग हैं, लेकिन पांडे उत्तर प्रदेश के होते हैं। जैसे ही वह हमारी ओर वह बढ़ा, धर्मेंद्र उसकी ओर देखते हुए चिल्लाए, `अरे पांडेजी, इस खचड़ा लाइन में आप कैसे? पहले तो आप मेन लाइन में थे।’


पांडेजी को लगा जैसे सचमुच उन्हें कोई हमदर्द मिल गया है। धर्मेंद्र ने भी अपना संभाषण जारी रखा, `और इधर देस जाना नहीं हुआ क्या? बाल-बच्चे, खेती-बाड़ी सब ठीक बाय न?’ लेकिन इन प्रश्नों का  पांडेजी कोई जवाब देते, इसके पहले ही किंग्स सर्किल स्टेशन आ गया और हम लोग उन्हें बाय-बाय करते हुए वहां उतर पड़े।

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