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एंग्री इंडियन गॉडेसेस:स्त्री संसार का अलग किस्म का सिनेमा

Fri, 04 Dec 2015 02:10 PM IST
Updated Fri, 04 Dec 2015 02:10 PM IST
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film review Angry Indian Goddesses

निर्माताः गौरव धींगरा

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निर्देशकः पैन नलिन
सितारेः सारा-जेन डायस, संध्या मृदुल, अनुष्का मनचंदा, पवलीन गुजराल, अमृत मघेरा, राजश्री देशपांडे, तनिष्ठा चटर्जी
रेटिंग ***

हमारे शास्त्रों में देवियां पूजनीय हैं लेकिन घर और समाज में उनका क्या स्थिति है? हमारे दौर के सबसे ज्वलंत प्रश्नों में एक यह भी है। इस पर तेज गति से मंथन हो रहा है और मंथन से अमृत तथा विष दोनों निकल रहे हैं। संसारा और वैली ऑफ फ्लावर्स जैसी खूबसूरत फिल्में बना चुके निर्देशक पैन नलिन इस बार बदलते हुए भारतीय समाज में स्त्रियों के संघर्ष का सिनेमा लाए हैं।

उल्लेखनीय बात यह है कि इस कहानी की नायिकाएं अबला नहीं हैं बल्कि शिक्षित, रचनाधर्मी और आत्मनिर्भर हैं। फिर भी उन्हें अपना वजूद बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रूढ़ समाज और पारंपरिक सोच या तो उन्हें पंख फैलाने नहीं दे रहे या उनकी आजादी के पंख कतरने को आतुर है।
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पैन नलिन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह गुजरात से आते हैं और उनके पिता भी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे। पैन अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में विशेष स्थान रखते हैं और उनकी एंग्री इंडियन गॉडेसेस कई देशों के फिल्म समारोहों में सराही गई है। असल में बराबरी के लिए स्त्रियों का संघर्ष सिर्फ भारतीय समाज में ही नहीं चल रहा।
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वह अफ्रीकी और अरब विश्व से लेकर यूरोप तथा अमेरिका में भी जारी है। संघर्ष में बहने वाले रक्त का रंग एक ही होता है। नलिन के सिनेमा की स्त्रियां ग्लोबल हैं। वे कारपोरेट दुनिया से आती हैं, मनोरंजन जगत में ऊंची उड़ान के सपने देखती हैं, वे गरीबों और जरूरतमंदों के लिए जमीन पर संघर्ष कर रही हैं, वे अत्याचार के विरुद्ध चुप नहीं हैं, वे न्याय की भीख मांगने को तैयार नहीं बल्कि उसे अपना हक बता कर छीनने को हथियार भी उठा रही हैं।

फिल्म का खुलापन सेंसर बोर्ड को रास नहीं आया

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एंग्री इंडियन गॉडेसेस की कहानी फ्रीडा (सारा-जेन डायस) और उसकी सहेलियों की है। गोवा में फ्रीडा शादी करने जा रही है और उसने सहेलियों को बुलाया है, मगर बताया नहीं कि किसके साथ विवाह कर रही है। सबके इकट्ठा होने के साथ आप छोटे-छोटे रोजमर्रा के चुलबुले दृश्यों और चुटीले संवादों में बंध जाते हैं। पैन नलिन ने खूबसूरती से इन्हें सीन-दर-सीन पिरोया है। फिल्म में खुलापन है। जो सेंसरबोर्ड को कई जगह रास नहीं आया। यह संवादों-दृश्यों में साफ झलकता है।

असंख्य फिल्मों में नायिकाओं को आइटम, चीज, माल जैसे शब्दों से संबोधित करने की इजाजत देने वाले सेंसर को यह बात गले नहीं उतरी कि एक युवक को सामने से आता देख कोई नायिका कहे कि देखो लंच आ रहा है! कैंची की धार के ऐसे दसियों नमूने आपको यहां दिखेंगे।

ये स्त्री संसार का अलग किस्म का सिनेमा है

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अगर आप स्त्री संसार का अलग किस्म का सिनेमा देखना चाहते हैं। जिसमें हंसी-ठिठोली, चुटीलापन, थोड़ी सी सेक्सी बातें और खूबसूरत चेहरों पर गुस्सा भी हो तो यह फिल्म आपके लिए है। फिल्म के अधिकतर संवाद अंग्रेजी में हैं और थोड़ी हिंदी इस्तेमाल की गई है।

एंग्री इंडियन गॉडेसेस देख कर यह जरूर महसूस होता है कि जिन बातों को नलिन ने कहानी का विषय बनाया है, वे नई नहीं हैं और कहने का अंदाज भी बहुत जुदा नहीं है। नलिन एक-एक दृश्य में यथार्थवादी होते हुए अंत में अचानक काव्यात्मक न्याय के सहारे टिक जाते हैं। जो उन्हीं की वैचारिक क्षमता पर सवाल उठा देता है।

यह जरूर है कि अलग-अलग जगह बिखरी कहानियों को एक जगह रख देने से उनका प्रभाव थोड़ा बढ़ जाता है। फिल्म के कुछ सीन बहुत सुंदर ढंग से संजोए गए हैं। सारे किरदार करीने से लिखे और निभाए गए हैं। सिनेमा के छात्रों के लिए नलिन हमेशा एक प्रभावी टीचर साबित हुए हैं। वह बात इस फिल्म में भी है।

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