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पढ़िए फारुख शेख से जुड़े अनकहे किस्से

Sat, 28 Dec 2013 11:32 AM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई Updated Sat, 28 Dec 2013 11:32 AM IST
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facts about farukh sheikh

अभिनेता फारुख शेख अचानक ही हम सब से विदा लेकर कूच कर गए हैं। जानिए एक कलाकार से इतर कैसे थे फारुख।

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भव्यता के बीच सादे जीवन जैसी कोई बात अगर सिनेमा के पर्दे पर देखनी हो तो फारुख शेख की फिल्में देखिए। नूरी, चश्मे बद्दूर, साथ साथ, बाजार और कथा जैसी फिल्मों का यह नायक शनिवार को हमारे बीच से चला गया।

पर्दे पर उनकी छवि एक सीधे सादे इंसान की थी। जिसकी जिंदगी में कोई तामझाम नहीं। बेहद सादगी भरी मौजूदगी। असल जिंदगी में भी फारुख शेख ऐसे ही थे। बावजूद इसके कि उनकी पैदाइश और परवरिश एक रईस जमींदार घराने में हुई थी। बड़ौदा (गुजरात) के नजदीक एक गांव में 25 मार्च, 1948 को जन्मे फारुख अपने पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे।
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उनके पिता मुस्तफा शेख मुंबई के एक प्रतिष्ठित वकील थे और मां फरीदा शेख गृहिणी। फारुख ने अपनी पढ़ाई मुंबई के सेंट मैरी स्कूल में की। जहां वे पढ़ाई के साथ तमाम नाटकों और खेल-कूद की गतिविधियों में हिस्सा लेते थे। फारुख ने हमेशा कहा कि उनके भीतर जो संस्कार और सादगी आई, वह उनके पिता के व्यक्तित्व की देन थे।
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क्रिकेट के लिए दीवानगी

फारुख स्कूली दिनों से न केवल क्रिकेट के दीवाने थे, बल्कि अच्छे क्रिकेटर भी थे। उन दिनों भारत के विख्यात टेस्ट क्रिकेटर वीनू मांकड़ सेंट मैरी स्कूल के दो सर्वश्रेष्ठ क्रिकटरों को हर साल कोचिंग देते थे और हर बार उनमें से एक फारुख हुआ करते थे। जब वह सेंट जेवियर कॉलेज में पढ़ने गए तो उनका खेल और निखरा। सुनील गावस्कर का शुमार फारुख के अच्छे दोस्तों मे होता है।

कॉलेज में मिली जीवन संगिनी

फारुख शेख अपने कॉलेज के दिनों को हमेशा शिद्दत से याद करते थे। वहां उनके दोस्तों का बड़ा समूह था। यहीं उनकी मुलाकात रूपा जैन से हुई, जो आगे चल कर उनकी जीवन संगिनी बनीं। फारुख और रूपा ने नौ साल तक एक-दूसरे से मेल-मुलाकातों के बाद शादी का फैसला लिया था।

दोनों ही परिवार उनकी दोस्ती से वाकिफ थे और किसी ने विरोध नहीं किया। हालांकि रूपा के परिजन इस बात से जरूर थोड़ा चिंतित थे कि फारुख, जो उन दिनों एक उभरते ऐक्टर थे और ज्यादातर रंगमंच पर काम करते थे, उनकी बेटी का खयाल कैसे रख पाएंगे। लेकिन फारुख को जल्द ही मिली कामयाबी के बाद वे निश्चिंत हो गए।

पेशा तो चुना था वकीलत का

फारुख के जीवन पर पिता का गहरा प्रभाव था और यही कारण था कि उन्होंने वकालत की पढ़ाई की। उनका इरादा पिता की विरासत को आगे ले जाने का था। मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ लॉ से उन्होंने कानून की पढ़ाई की। लेकिन वकील बनने के बाद जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि यह पेशा उनके जैसे इंसान के लिए ठीक नहीं है। उनका कहना था कि ज्यादातर मामलों के फैसले अदालत में नहीं बल्कि पुलिस थानों में तय होते हैं। इसके बाद ही उन्होंने ऐक्टिंग को तवज्जो देनी शुरू की।

पहली फिल्म के लिए मुफ्त में राजी

फारुख कॉलेज के दिनों में नाटकों में काम किया करते थे और यहां शबाना आजमी उनकी अच्छी दोस्त थीं। दोनों ने कई नाटक साथ किए थे। कॉलेज के बाद शबाना जब फिल्म इंस्टीट्यूट में पढ़ाई के लिए पूना जाने लगीं तो उन्होंने फारुख से भी चलने को कहा। परंतु उन्हें वकालत की पढ़ाई करनी थी।

वकालत से मोहभंग के बाद वे ऐक्टिंग कैरिययर पर ध्यान देने लगे। उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘गर्म हवा’ में मुफ्त में काम करने को हामी भरी थी। रमेश सथ्यू यह फिल्म बना रहे थे और उन्हें ऐसे कलाकार चाहिए थे, जो बिना फीस लिए तारीखें दे दें। खैर, इस फिल्म के लिए फारुख शेख को 750 रुपये मिले, वह भी पांच साल में।

सत्यजित रे ने किया इंतजार

फारुख शेख के वकालत छोड़ कर फिल्मों में काम करने से उनके माता-पिता को आश्चर्य तो हुआ लेकिन उन्होंने बेटे के फैसला का विरोध नहीं किया। वे उनके साथ खड़े रहे। फारुख के अनुसार उन दिनों तक यह बात खत्म चुकी थी कि फिल्मों में काम करना बुरा है। ‘गर्म हवा’ की रिलीज के बाद फारुख के पास दूसरी फिल्मों के ऑफर आने लगे।

विख्यात निर्देशक सत्यजित रे को उनका काम इतना पसंद आया कि अपनी फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में उन्हें एक रोल ऑफर कर दिया। जब सत्यजित रे ने फोन किया तो फारुख कनाडा थे। उन्होंने कहा कि मुझे लौटने में एक महीने का वक्त लगेगा। रे ने कहा कि वे इंतजार करेंगे।

नहीं भागे पैसों के पीछे


फारुख शेख संपन्न परिवार से जरूर थे मगर पिता के निधन के बाद उन्होंने छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाया। उन्होंने रेडियो और टीवी पर कार्यक्रम किए, लेकिन सिर्फ पैसों की खातिर फिल्मों में काम करना उन्हें मंजूर न था।

इसीलिए जिस जमाने में ऐक्टर एक साथ दर्जनों फिल्में साइन करते थे, फारुख शेख एक बार में दो से ज्यादा फिल्मों में काम नहीं करते थे। 1978 में ‘नूरी’ की कामयाबी के बाद कुछ ही महीनों में उनके पास करीब 40 फिल्मों के प्रस्ताव आए। लेकिन उन्होंने सारे के सारे ठुकरा दिए क्योंकि वे सब ‘नूरी’ की ही तरह थे।

कभी नहीं रहे विवादों में


फारुख शेख का नाम कभी किसी विवाद में नहीं आया। न ही किसी को-स्टार या हीरोइन से उनका नाम जुड़ा। वे पूरी तरह से पारिवारिक इंसान थे। उनकी दो बेटियां हैं। उन्होंने ईश्वर में सदा विश्वास किया। वे कहते थे कि एक शक्ति है जो ऊपर से हमें संचालित कर रही है।


धर्म और जाति के नाम पर बंटवारे या भेदभाव उन्हें कभी गवारा न थे। उन्होंने सदा कहा कि गुजरा जाने के बाद दुनिया में याद किए जाने की ख्वाहिश उनमें नहीं है। वह कहते थे कि यह जिंदगी एक उत्सव है और अपने रियलिटी शो ‘जीना इसी का नाम है’ में मैं जिंदगी का ही जश्न मना रहा हूं।

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